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बीकानेर का राठौड़ वंश

बीकानेर का राठौड़ वंश


बीकानेर-

➠बीकानेर में राठौड़ वंश का शासन था।


बीकानेर के राठौड़ वंश के प्रमुख राजा-

1. राव बीका (1465- 1504 ई.)

2. राव नरा

3. राव लूणकरण (1505- 1526 ई.)

4. राव जैतसी (1526- 1541 ई.)

5. महाराजा रायसिंह (1574- 1612 ई.)

6. महाराजा रायसिंह (1574- 1612 ई.)

7. महाराजा कर्णसिंह (1631- 1669 ई.)

8. महाराजा अनूप सिंह (1669- 1698 ई.)

9. महाराजा सूरत सिंह (1787- 1828 ई.)

10. महाराजा रतन सिंह (1828- 1851 ई.)

11. महाराजा गंगासिंह (1887- 1943 ई.)


1. राव बीका (1465- 1504 ई.)-

➠राव बीका मारवाड़ के राठौड़ वंश के राजा राव जोधा का पुत्र था।

➠1465 ई. में करणी माता के आशीर्वाद से राव बीका ने अपने काका काँधन तथा अपने छोटे भाई बीदा के साथ मिलकर बीकानेर क्षेत्र जीत लिया था।

➠1472 ई. राव बीका को कोडमदेसर में राजा घोषित किया गया था।

➠1472 ई. में रावा बीका राजा बनते ही कोडमदेसर (बीकानेर) को अपनी राजधानी बनाता है।

➠कोडमदेसर नामक स्थान राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित है।

➠राव बीका ने कोडमदेसर (बीकानेर) में भैरव मंदिर का निर्माण करवाया था।

➠1488 ई. में राव बीका के द्वारा बीकानेर की स्थापना की गई थी।

➠बीकानेर की स्थापना आखातीज (अक्षय तृतीया) के दिन की गई थी।

➠आखातीज के दिन बीकानेर के लोग पतंगे उडाते है।

➠कोडमदेसर के बाद राव बीका अपनी दूसरी राजधानी बीकानेर को बनाता है।

➠राव बीका ने जोधपुर के राजा राव सूजा पर आक्रमण किया तथा जोधपुर से राज चिह्न लेकर आया था।

➠राज सूजा मारवाड़ के राजा राव जोधा का पुत्र था।

➠राव बीका ने बीकानेर में अपनी कुल देवी नागणेची माता का मंदिर बनवाया था।

➠राव बीका ने देशनोक में करणी माता के मूल मंदिर का निर्माण करवाया था।

➠देशनोक राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित है।

➠देशनोक में करणी माता के मंदिर का वर्तमान स्वरूप या वर्तमान मंदिर बीकानेर के महाराजा सूरत सिंह के द्वारा बनवाया गया था।

➠बीकानेर के राठौड़ों की कुल देवी नागणेची माता है।

➠बीकानेर के राठौड़ों की ईष्ट देवी करणी माता है।


2. राव नरा-

➠राव बीका के बाद बीकानेर का राजा राव नरा बना था।

➠जनवरी 1505 ई. में बीकानेर के राजा राव नरा की मृत्यु हो जाने के कारण राव नरा के बाद बीकानेर का अगला राजा राव लूणकरण बना था।


3. राव लूणकरण (1505- 1526 ई.)-

➠राव लूणकरण राव बीका का छोटा बेटा था।

➠जसनाथ जी महाराज के आशीर्वाद से राव लूणकरण बीकानेर का राजा बना था।

➠राव लूणकरण ने बीकानेर के लूणकरणसर नामक स्थान पर लूणकरणसर झील का निर्माण करवाया था।

➠बीठू सूजा ने अपनी पुस्तक 'राव जैतसी रो छन्द' में राव लूणकरण को कलियुग का कर्ण कहा है।

➠जयसोम ने अपनी पुस्तक कर्मचन्द्रवंशोत्कीर्तनक काव्यम् (कर्मचन्दवंशोत्कीर्णकम् काव्यम्) में राव लूणकरण की दानवीरता की तुलना कर्ण से की गई है।

➠राव लूणकरण ने नागौर के शासक मुहम्मद खाँ को हराया था।

➠राव लूणकरण ने जैसलमेर के राजा रावल जैतसी को हराया था।


ढोसी का युद्ध (1526 ई.)-

➠ढोसी नामक स्थान हरियाणा के नारनौल क्षेत्र में स्थित है।

➠ढोसी का युद्ध बीकानेर के राजा राव लूणकरण तथा नारनौल (हरियाणा) के राजा अबीमीरा के मध्य लड़ा गया था।

➠ढोसी के युद्ध में राव लूणकरण नारनौल के राजा अबीमीरा के साथ लड़ा हुआ मारा गया था।


4. राव जैतसी (1526- 1541 ई.)-

➠राव जैतसी राव लूणकरण का बेटा था।


राती घाटी का युद्ध (1534 ई.)

➠राती घाटी नामक स्थान बीकानेर जिले में स्थित है।

➠राती घाटी का युद्ध राव जैतसी तथा कामरान के मध्य लड़ा गया था।

➠राती घाटी का युद्ध 1534 ई. में बीकानेर के राती घाटी नामक स्थान पर लड़ा गया था।

➠कामरान हुमायँ का भाई था।

➠राती घाटी के युद्ध में बीकानेर के राजा राव जैतसी की जीत हुई थी।

➠राती घाटी के युद्ध से पहले कामरान ने भटनेर किले पर अधिकार कर लिया था।

➠भटनेर का नया नाम हनुमानगढ़ है अर्थात् हनुमानगढ़ को ही पहले भटनेर के नाम से जाना जाता था।

➠बीठू सूजा की पुस्तक 'राव जैतसी रो छन्द' में राती घाटी युद्ध की जानकारी मिलती है।


5. राव कल्याणमल (1541- 1574 ई.)-

➠राव कल्याणमल ने खानवा के युद्ध (1527 ई.) में मेवाड़ के राणा सांगा की ओर से भाग लिया था।

➠राव कल्याणमल ने गिरी सुमेल के युद्ध (1544 ई.) में मालदेव के विरुद्ध शेरशाह सूरी की ओर से भाग लिया था।


राव कल्याणमल के दरबारी विद्वान-

1. सदाशिव भट्ट


1. सदाशिव भट्ट-

➠सदाशिव भट्ट बीकानेर के राजा राव कल्याणमल का दरबारी विद्वान था।

➠सदाशिव भट्ट के द्वारा राज विनोद नामक पुस्तक लिखी गई थी।


6. महाराजा रायसिंह (1574- 1612 ई.)-

➠महाराजा रायसिंह बीकानेर के राजा राव कल्याणमल का बेटा था।

➠महाराजा रायसिंह 1574 ई. में बीकानेर का राजा बना था।

➠राजा बनने के बाद महाराजा रायसिंह ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी।

➠महाराजा रायसिंह मुगल बादशाह अकबर तथा जहाँगीर का मनसबदार था।

➠मुगल बादशाह अकबर ने महाराजा रायसिंह को 4000 का मनसब दिया था। अर्थात् अकबर ने महाराजा रायसिंह को 4000 का मनसबदार बनाया था।

➠महाराजा रायसिंह सिरोही के राजा सुरताण तथा जालौर के राजा ताज खाँ को अकबर के पक्ष में लाया था।

➠कठौली के युद्ध में महाराजा रायसिंह ने गुजरात के राजा इब्राहिम मिर्जा को हराया था।

➠1577 ई. में अकबर ने महाराजा रायसिंह को 51 परगने दिये थे।

➠मुगल बादशाह जहाँगीर ने महाराजा रायसिंह को 5000 का मनसब दिया था। अर्थात् जहाँगीर ने महाराजा रायसिंह को 5000 का मनसबदार बनाया था।

➠जहाँगीर के बेटे खुसरों के विद्रोह के समय जहाँगीर ने महाराजा रायसिंह को राजधानी आगरा की जिमेदारी सौंप दी थी।

➠कर्मचन्द की देखरेख में बीकानेर में जूनागढ़ किले का निर्माण करवाया गया था।

➠बीकानेर में जूनागढ़ किले का निर्माण 1589 ई. में शुरू हुआ था तथा 1594 ई. जूनागढ़ किले का निर्माण पूरा हुआ था।

➠इतिहासकार मुंशी देवी प्रसाद ने महाराजा रायसिंह को राजपूताने का कर्ण कहा था।


महाराजा रायसिंह की पुस्तके-

1. रायसिंह महोत्सव

2. ज्योतिष रत्नमाला

3. बाल बोधिनी

4. वैद्यक वंशावली


1. रायसिंह महोत्सव-

➠रायसिंह महोत्सव नामक पुस्तक महाराजा रायसिंह के द्वारा लिखी गई थी।

➠रायसिंह महोत्सव नामक पुस्तक ज्योतिष विद्या से संबंधित थी।


2. ज्योतिष रत्नमाला-

➠ज्योतिष रत्नामाला नामक पुस्तक महाराजा रायसिंह के द्वारा लिखी गई थी।

➠ज्योतिष रत्नमाला नामक पुस्तक ज्योतिष विद्या से संबंधित थी।


3. बाल बोधिनी-

➠महाराजा रायसिंह ने ज्योतिष रत्नमाला नामक पुस्तक पर बाल बोधिनी नामक टीका लिखी थी।

➠बाल बोधिनी नामक टीका ज्योतिष विद्या से संबंधित थी।


4. वैद्यक वंशावली-

➠वैद्यक वंशावली नामक पुस्तक महाराजा रायसिंह के द्वारा लिखी गई थी।

➠वैद्यक वंशावली नामक पुस्तक वैद्य (चिकित्सा) से संबंधित थी।


महाराजा रायसिंह के दरबारी विद्वान-

1. जइता

2. जयसोम


1. जइता-

➠जइता महाराजा रायसिंह का दरबारी विद्वान था।

➠जइता ने रायसिंह प्रशस्ति लिखी थी।

➠रायसिंह प्रशस्ति बीकानेर के जूनागढ़ किले में लगी हुई है।


2. जयसोम-

➠जयसोम महाराजा रायसिंह का दरबारी विद्वान था।

➠जयसोम ने कर्मचन्द्रवंशोत्कीर्तनक काव्यम् (कर्मचन्दवंशोत्कीर्णकम् काव्यम्) नामक पुस्तक लिखी थी।

➠जयसोम की कर्मचन्द्रवंशोत्कीर्तनक काव्यम् (कर्मचन्दवंशोत्कीर्णकम् काव्यम्) नामक पुस्तक में महाराजा रायसिंह को राजेन्द्र कहा गया है।


पृथ्वीराज राठौड़-

➠पृथ्वीराज राठौड़ महाराजा रायसिंह का छोटा भाई था।

➠मुगल बादशाह अकबर ने पृथ्वीराज राठौड़ को गागरोण का किला दिया था।

➠गागरोण का किला राजस्थान के झालावाड़ जिले में स्थित है।

➠लुइगी पिओ तेस्सितोरी (Luigi Pio Tessitori/ L.P. Tessitori) ने पृथ्वीराज राठौड़ को डिंगल का होरेस कहा था।

➠लुइगी पिओ तेस्सितोरी (Luigi Pio Tessitori/ L.P. Tessitori) इटली के उदीन नगर का निवासी था।


वेलि क्रिसण रुकमणी री-

➠वेलि क्रिसण रुकमणी री पुस्तक गागरोन के किले में पृथ्वीराज राठौड़ के द्वारा लिखी गई थी।

➠वेलि क्रिसण रुकमणी री पुस्तक की काव्य शैली डिंगल है।

➠वेलि क्रिसण रुकमणी री पुस्तक की भाषा उत्तरी मारवाड़ी है।

➠दुरसा आढ़ा ने वेलि क्रिसण रुकमणी री नामक पुस्तक को 5वां वेद तथा 19वां पुराण बताया था।

➠कर्नल जेम्स टाॅड के अनुसार वेलि क्रिसण रुकमणी री नामक पुस्तक में 10,000 घोड़ों का बल है।


7. महाराजा कर्णसिंह (1631- 1669 ई.)-

➠महाराजा कर्णसिंह को जांगलधर बादशाह की उपाधि दी गई थी।

➠शुक सप्तति नामक पुस्तक के राजस्थानी अनुवाद में महाराजा कर्णसिंह की जांगलधर बादशाह की उपाधि का वर्णन किया गया है।

➠शुक सप्तति चिन्तामणि भट्ट के द्वारा लिखी गई पुस्तक है।


महाराजा कर्णसिंह की पुस्तके-

1. साहित्य कल्पद्रुम


1. साहित्य कल्पद्रुम-

➠साहित्य कल्पद्रुम नामक पुस्तक महाराजा कर्णसिंह के द्वारा लिखी गई थी।


महाराजा कर्णसिंह के दरबारी विद्वान-

1. गंगाधर मैथिल

2. होसिक भट्ट


1. गंगाधर मैथिल-

➠गंगाधर मैथिल महाराजा कर्णसिंह का दरबारी विद्वान था।

➠गंगाधर मैथिल के द्वारा दो पुस्तके लिखी गई थी। जैसे-

(I) कर्णपूषण

(II) काव्य डाकिनी


2. होसिक भट्ट-

➠होसिक भट्ट महाराजा कर्णसिंह का दरबारी विद्वान था।

➠होसिक भट्ट के द्वारा कर्णवंतस नामक पुस्तक लिखी गई थी।


8. महाराजा अनूप सिंह (1669- 1698 ई.)-

➠दक्षिण भारत में जीत के कारण मुगल बादशाह औरंगजेब ने महाराजा अनूप सिंह को माही मरातिब की उपाधि दी थी।

➠मुगल बादशाह औरंगजेब ने महाराजा अनूप सिंह को औरंगाबाद तथा आदूणी का प्रशासक बनाया था।

➠औरंगाबाद महाराष्ट्र राज्य में स्थित है।

➠आदूणी महाराष्ट्र राज्य में स्थित है।

➠महाराजा अनूप सिंह को जब आदूणी का प्रशासक बनाया गया था तब आदूणी को दूसरा बीकानेर कहा जाता था।

➠महाराजा अनूप सिंह दक्षिण भारत से संस्कृत की पुस्तके बीकानेर लेकर आया था।

➠महारजा अनूप सिंह ने मेवाड़ के महाराणा कुम्भा के संगीत ग्रंथों का संकलन करवाया था। अर्थात् महाराणा कुम्भा के संगीत ग्रंथों को एक जगह करवाया था।

➠महाराजा अनूप सिंह ने बीकानेर में सरस्वती भंडार नामक पुस्तकालय की स्थापना करवायी थी।

➠सरस्वती भंडार नामक पुस्तकालय को वर्तमान में अनूप संस्कृत पुस्तकालय कहा जाता है।

➠महाराजा अनूप सिंह दक्षिण भारत से हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियां बीकानेर लेकर आया था।

➠दक्षिण भारत से लायी गई हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों को रखवाने के लिए महाराजा अनूपसिंह ने बीकानेर में मंदिर का निर्माण करवाया था। जिसे 33 करोड़ देवी देवताओं का मंदिर भी कहा जाता है।

➠बीकानेर के 33 करोड़ देवी देवताओं के मंदिर में हेरम्ब गणपति (शेर पर सवार भगवान गणेशजी) की मूर्ति भी है।


33 करोड़ देवी देवताओं का मंदिर-

➠बीकानेर में 33 करोड़ देवी देवताओं के मंदिर का निर्माण महाराजा अनूप सिंह ने करवाया था।

➠राजस्थान के जोधपुर जिले के मंडोर क्षेत्र में 33 करोड़ देवी देवताओं के मंदिर का निर्माण मारवाड़ के महाराजा अभय सिंह ने करवाया था।

➠जोधपुर के 33 करोड़ देवी देवताओं के मंदिर को 33 करोड़ देवी देवताओं की साल कहा जाता है।


महाराजा अनूप सिंह की पुस्तके-

1. अनूप विवेक

2. काम प्रबोध

3. श्राद्ध प्रयोग चिन्तामणि

4. अनूपोदय


1. अनूप विवेक-

➠महाराजा अनूप सिंह के द्वारा अनूप विवेक नामक पुस्तक लिखी गई थी।


2. काम प्रबोध

➠महाराजा अनूप सिंह के द्वारा काम प्रबोध नामक पुस्तक लिखी गई थी।


3. श्राद्ध प्रयोग चिन्तामणि-

➠महाराजा अनूप सिंह के द्वारा श्राद्ध प्रयोग चिन्तामणि नामक पुस्तक लिखी गई थी।


4. अनूपोदय-

➠महाराजा अनूप सिंह के द्वारा गीत गोविन्द नामक पुस्तक पर लिखी गई टीका अनूपोदय है।


महाराज अनूप सिंह के दरबारी विद्वान-

1. भाव भट्ट

2. अनन्त भट्ट

3. उदय चन्द्र


1. भाव भट्ट-

➠भाव भट्ट महाराजा अनूप सिंह का दरबारी विद्वान था।

➠भाव भट्ट के द्वारा संगीत पर तीन पुस्तके लिखी गई थी जैसे-

(I) संगीत अनूप अंकुश

(II) अनूप संगीत विलास

(III) अनूप संगीत रत्नाकर


2. अनन्त भट्ट-

➠अनन्त भट्ट महाराजा अनूप सिंह का दरबारी विद्वान था।

➠अनन्त भट्ट के द्वारा तीर्थ रत्नाकर नामक पुस्तक लिखी गई थी।


3. उदय चन्द्र-

➠उदय चन्द्र महाराजा अनूप सिंह का दरबारी विद्वान था।

➠उदय चन्द्र के द्वारा पांडित्य दर्पण नामक पुस्तक लिखी गई थी।


9. महाराजा सूरत सिंह (1787- 1828 ई.)-

➠1805 ई. में महाराजा सूरत सिंह ने भटनेर पर अधिकार कर लिया था।

➠महाराजा सूरत सिंह ने जिस दिन भटनेर पर अधिकार किया था उस दिन मंगलवार था इसीलिए भटनेर का नाम बदलकर हनुमानगढ़ कर दिया था।

➠महाराजा सूरत सिंह के शासन काल में जाॅर्ज थाॅमस ने बीकानेर पर दो बार आक्रमण किया था।

➠1818 ई. में महाराजा सूरत सिंह ने अंग्रेजों के साथ संधि कर ली थी।


चूरू का किला (चूरू, राजस्थान)-

➠1814 ई. में महाराजा सूरत सिंह ने चूरू के किले पर आक्रमण किया था।

➠1814 ई. में चूरू के किले पर आक्रमण के दौरान चूरू का सामंत स्योती सिंह था।

➠1814 ई. के महाराजा सूरत सिंह के चूरू आक्रमण के दौरान चूरू के सामंत स्योजी सिंह ने चाँदी के गोले चलाए थे।


10. महाराजा रतन सिंह (1828- 1851 ई.)-

➠1837 ई. में महाराजा रतन सिंह ने गया (बिहार) में कन्या वध पर रोक लगा दी थी।


बासणपीर का युद्ध (1829 ई.)-

➠बासणपीर का युद्ध 1829 ई. में बीकानेर में हुआ था।

➠बासणपीर का युद्ध बीकानेर के राजा महाराजा रतन सिंह तथा जैसलमेर के राजा गजसिंह के मध्य लड़ा गया था।

➠बासणपीर के युद्ध में जैसलमेर के राजा गजसिंह की जीत हुई थी।

➠बासणपीर का युद्ध राजस्थान के राजाओं के बीच अंतिम युद्ध था।


महाराजा रतन सिंह के दरबारी विद्वान-

1. दयालदास


1. दयालदास-

➠दयालदास महाराजा रतन सिंह का दरबारी विद्वान था।

➠दयालदास के द्वारा 'बीकानेर रा राठौड़ा री ख्यात' लिखी गई थी।


बीकानेर रा राठौड़ों री ख्यात-

➠बीकानेर रा राठौड़ों री ख्यात राजस्थान की अंतिम ख्यात है।

➠बीकानेर रा राठौड़ों री ख्यात में राव बीका से लेकर सरदार सिंह तक बीकानेर के राजाओं की जानकारी दी गई है।


11. महाराजा गंगासिंह (1887- 1943 ई.)-

1899 ई. में महाराजा गंगासिंह ने चीन में बाॅक्सर विद्रोह को दबाया था।

चीन में बाॅक्सर विद्रोह को दबाने के कारण अंग्रेजों में महाराजा गंगासिंह को चीन युद्ध पदक दिया था।

1913 ई. में महाराजा गंगासिंह के द्वारा बीकानेर में प्रजा प्रतिनिधि सभा की स्थापना की गई थी।

1916 ई. में महाराजा गंगासिंह ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (Banaras Hindu University- B.H.U.) की स्थापना के लिए मदन मोहन मालवीय को आर्थिक सहायता दी थी।

महाराजा गंगासिंह ने बीकानेर में ऊँटों की सेना बनायी थी।

महाराजा गंगासिंह के द्वारा बनायी गई ऊँटों की सेना को गंगा रिसाला कहा जाता था।

महाराजा गंगासिंह तथा महाराजा गंगासिंह की ऊँटों की सेना 'गंगा रिसाला' ने प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया था।

1919 ई. में महाराजा गंगासिंह ने पेरिस शांति सम्मेलन में भाग लिया था।

पेरिस शांति सम्मेलन में विश्व से कुल 32 लोग शामिल हुए थे।

पेरिस शांति सम्मेलन से लोटते समय महाराजा गंगासिंह ने अंग्रेजों को अपना सुप्रसिद्ध Rome Note भेजा था। तथा भारत के लिए स्वशासन की मांग की थी।

1921 ई. में गवर्नर जनरल चेम्सफोर्ड (Chelmsford) ने Chamber of Princes की स्थापना की थी तथा महाराजा गंगासिंह को Chamber of Princes का चांसलर बनाया था।


छप्पनियां अकाल-

➠महाराजा गंगासिंह के शासन काल में 1899 ई. (विक्रम संवत 1956) में छप्पनियां अकाल पड़ा था।

➠1899 ई. में महाराजा गंगासिंह ने छप्पनियां अकाल का सफलतापूर्वक प्रबंधन किया था इसीलिए अंग्रेजों ने महाराजा गंगासिंह को कैसर-ए-हिन्द की उपाधि दी थी।


गंग नहर-

1927 ई. में महाराजा गंगासिंह ने गंग नहर का निर्माण करवाया था।

गंग नहर का निर्माण करवाने के कारण महाराजा गंगासिंह को राजस्थान का भागीरथ कहा जाता है।

गंग नहर का इंजिनियर कंवरसेन था।

गंग नहर का उद्घाटन गवर्नल जनरल लार्ड इरविन के द्वारा किया गया था।

गंग नहर का उद्घाटन राजस्थान के श्री गंगानगर जिले के शिवपुरी हैड नामक स्थान पर किया गया था।

गंग नहर के उद्घाटन में पुरोहित मदन मोहन मालवीय था।


विशेष- राजस्थान नहर-

राजस्थान नहर का इंजिनियर कंवरसेन था।

राजस्थान नहर का ही बाद में नाम बदलकर इंदिरा गांधी नहर कर दिया था।


गोलमेज सम्मेलन-

महाराजा गंगासिंह ने तीन गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया था जैसे-

1. गोलमेज सम्मेलन 1930

2. गोलमेज सम्मेलन 1931

3. गोलमेज सम्मेलन 1932

गोलमेज सम्मेलन का उद्देश्य था की भारत में शासन व्यवस्था कैसी हो।


रामदेवरा मंदिर (बीकानेर)-

बीकानेर के रामदेवरा मंदिर का वर्तमान स्वरूप महाराजा गंगासिंह ने बनवाया था। अर्थात् वर्तमान में बीकानेर का रामदेवरा मंदिर महाराजा गंगासिंह ने बनवाया था।


देशनोक मंदिर (बीकानेर)-

बीकानेर के देशनोक मंदिर का वर्तमान स्वरूप महाराजा गंगासिंह ने बनवाया था।


गोगामेड़ी मंदिर (बीकानेर)-

बीकानेर के गोगामेड़ी मंदिर का वर्तमान स्वरूप महाराजा गंगासिंह ने बनवाया था।


सिक्के-

बीकानेर रियासत में चलने वाले सिक्कों को गजशाही कहा जाता था।

महाराजा गंगासिंह ने बीकानेर रियासत के सिक्कों पर Victoria Empress लिखवाया था।

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