राजस्थान में जनजातीय आंदोलन

राजस्थान में जनजाति आंदोलन
👉जनजातीय आंदोलन का उद्देश्य-
➯राजस्थान में जनजातीय आंदोलन का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों को सामाजिक रूप से उन्नत करना था।

👉दयानंद सरस्वती-
➯राजस्थान में सामाजिक सुधार आंदोलनों का जनक दयानंद सरस्वती को माना जाता है।
➯दयानंद सरस्वती नें सन् 1883 में परोपकारिणी सभा नामक संगठन बनाया।

1. भगत आंदोलन-
➯राजस्थान में जनजातियों के प्रभाव क्षेत्र दक्षिणी राजस्थान में आदिवासियों के सामाजिक सुधार के लिए सुरजी भगत ने आंदोलन प्रारम्भ किया जिसे भगत आंदोलन कहा जाता है।
➯भगत आंदोलन का वास्तविक जनक गोविंद गिरी था।
➯गोविंद गिरी दयानंद सरस्वती का आदिवासी शिष्य था।
➯भगत आंदोलन का नेतृत्व गोविंद गिरी ने किया था।
➯गोविंद गिरी का जन्म सन् 1858 में राजस्थान के डुंगरपुर जिले के बांसिया गांव में एक बंजारे के घर में हुआ था।
➯गोविंद गिरी ने दयानंद सरस्वती से आशीर्वाद लेकर दक्षिणी जनजातीय क्षेत्र में भगत आंदोलन को नई दिशा दी।
➯भगत आंदोलन को नई दिशा देने के लिए गोविंद गिरी ने सन् 1883 में राजस्थान के सिरोही जिले में सम्प सभा की स्थापना की।
➯भगत आंदोलन का वास्तविक जनक गोविंद गिरी को कहते है।
➯गोविंद गिरी को सामाजिक सुधार आंदोलन का नेतृत्व करने के कारण गुरू कहा जाने लगा था।
➯गुरू गोविंद गिरी ने भगत आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में मानगढ़ पहाड़ी पर कार्यस्थल या कार्यक्षेत्र बनाया था।
➯सम्प सभा का प्रथम वार्षिक अधिवेशन 7 दिसम्बर, 1908 को बांसवाड़ा जिले की मानगढ़ पहाड़ी पर आयोजित किया गया था।
➯सम्प सभा का दूसरा वार्षिक अधिवेशन 7 दिसम्बर 1913 को बांसवाड़ा जिले की मानगढ़ पहाड़ी पर आयोजित किया गया था।
➯सम्प सभा के दूसरे वार्षिक अधिवेशन में कर्नल शैटर्न के नेतृत्व में मेवाड़ भील कौर के सैनिकों ने गोलीबारी की जिसमें लगभग 1500 भील मारे गए तथा गुरू गोविंद गिरी को गिरफ्तार कर लिया गया था।
➯मानगढ़ पहाड़ी कि इस गोलिबारी घटना को मानगढ़ हत्याकांड कहते है।
➯गुरू गोविंद गिरी ने अपना अंतिम समय कम्बोई (गुजरात) में व्यतित किया था।
➯गुरू गोविंद गिरी का समाधि स्थल राजस्थान के बांसवाड़ा जिले की मानगढ़ पहाड़ी पर बना हुआ है।
➯राजस्थान सरकार का पर्यटन विभाग गुरू गोविंद गिरी समाधि स्थल को मानगढ़ धाम नाम से पर्यटन के लिए विकसित कर रहा है।
➯भगत आंदोलन का उद्देश्य भीलों को मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना तथा भील समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करना था।
➯गुरू गोविंद गिरी का गीत "भूरटिया नी मानू रे नी मानू" आज भी भील क्षेत्र में प्रचलित है।

2. एकी आंदोलन या भोमट भील आंदोलन (1921)-
➯एकी आंदोलन या भोमट भील आंदोलन का नेतृत्व मोतीलाल तेजावत द्वारा किया गया था।
➯एकी आंदोलन या भोमट भील आंदोलन का उद्देश्य भीलों में एकता स्थापित करना था।
➯एकी आंदोलन या भोमट भील आंदोलन की शुरुआत राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जले के मातृकुंडिया धाम में हुई थी।
➯एकी आंदोलन का कार्यस्थल चित्तौड़गढ़ जिले के मातृकुंडिया धाम को बनाया गया था।
➯एकी आंदोलन के तहत पहली आम सभा झाड़ोल (उदयपुर) में हुई थी।
➯एकी आंदोलन का प्रभाव क्षेत्र भोमट का पठारी भाग था इसी कारण एकी आंदोलन को भोमट आंदोलन भी कहा जाता है।
➯भीलों ने मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में 7 मार्च, 1922 को राजस्थान के अजमेर जिले के नीमड़ा गांव में भील सभा का आयोजन किया था।
➯7 मार्च, 1922 की नीमड़ा गांव की भील सभा पर मेवाड़ भील कौर के सैनिकों ने गोलीबारी की जिसमें लगभग 1200 भील मारे गए तथा इस गोलीबारी कांड को नीमड़ा हत्याकांड कहते है।
➯सन् 1929 में गांधी जी के कहने पर मोतीलाल तेजावत ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया तथा सन् 1945 तक जेल में रहे थे।
➯मोतीलाल तेजावत को आदिवासियों का मसीहा तथा भीलों का संत मावजी कहते है।
➯राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित मातृकुंडिया धाम को राजस्थान तथा मेवाड़ा का हरिद्वार कहते है।

3. मीणा आंदोलन या मीणा जनजाति आंदोलन-
➯मीणा आंदोलन जयपुर के आसपास रहने वाले मीणा जनजाति के द्वारा चलाया गया आंदोलन था।
➯मीणा जनजाति के दो भाग माने जाते है-
1. जमीदार मीणा
2. चौकीदार मीणा
➯सन् 1924 में ब्रिटिश सरकार ने क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट/अधिनियम/ कानून पारित किया।
➯क्रिमिनल ट्राइब्स अधिनियम के अन्तर्गत सन् 1930 में जयपुर राज्य जयराम पेशा कानून बनाया गया था।
➯जयराम पेशा कानून के अन्तर्गत 12 वर्ष से अधिक आयु के सभी मीणा युवकों को यह आदेश दिया गया की उन्हें प्रतिदिन थाने में उपस्थिति दर्ज करानी होगी।
➯जयराम पेशा कनून को समाप्त करने के लिए 1933 में मीणा क्षेत्रीय महासभा की स्थापना की गई।
➯सन् 1944 में नीम का थाना (सीकर) में मीणाओं की महासभा हुई इस सभा की अध्यक्षता जैन मुनि मगन सागर ने की थी।
➯इस सभा के दौरान सन् 1944 में मीणा समाज में जागृति के लिए मीणा राज्य सुधार समिति का गठन किया गया था।
➯मीणा राज्य सुधार समिति का अध्यक्ष पंडित बंशीधर शर्मा को बनाया गया था।
➯चौकीदार मीणाओं को एक टैक्स या हर्जाना देना पड़ता था चाहे चोरी कोई भी करे हर्जाना चौकीदार मीणाओं को ही देना पड़ता था इसी को दादरसी कानून कहा जाता था।
➯सन् 1945 में मीणाओं का राज्यव्यापी आंदोलन चला।
➯28 अक्टूबर 1946 को मीणाओं ने मुक्ति दिवस के रूप में मनाया था।
➯सन् 1952 में क्रिमिनल ट्राइब्स तथा जयराम पेशा कानून रद्द कर दिये गये और मीणाओं को अपने मूलभूत अधिकारों की प्राप्ति हुई।



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