राजस्थानी भाषा एवं बोलियां

राजस्थान की भाषा व राजस्थान की बोलियाँ
👉राजस्थानी भाषा-
➯वक्ताओं की दृष्टि से भारतीय भाषाओं में राजस्थानी भाषा का 7वां स्थान तथा विश्व की भाषाओं में राजस्थानी भाषा का 16वां स्थान है।
➯उद्योतन सुरी ने 8वीं शताब्दी में अपने ग्रंथ कुवलयमाला में 18 देशी भाषाओं में मरु भाषा को भी सम्मिलित किया था।

👉उद्भव-
➯राजस्थानी भाषा का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। अर्थात् राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से मानी जाती है।
➯डाॅ. एल.पी. टेस्सीटोरी राजस्थानी भाषा का उद्भव (उत्पत्ति) शौरसेनी अपभ्रंश से मानते है।
➯डाॅ. जाॅर्ज अब्राहम ग्रियर्सन एवं डाॅ. पुरुषोत्तम मोनारिया राजस्थानी भाषा का उद्भव (उत्पत्ति) नागर अपभ्रंश से मानते है।
➯के.एम. मुंशी एवं मोतीलाल मेनारिया राजस्थानी भाषा का उद्भव (उत्पत्ति) गुर्जर अपभ्रंश से मानते है।
➯अधिकांश विद्वान राजस्थानी भाषा का उद्भव (उत्पत्ति) गुर्जर अपभ्रंश से मानते है।

👉उत्पत्ति काल-
➯राजस्थानी भाषा का उत्पत्ति काल 12वीं सदी का अन्तीम चरण माना जाता है।


👉स्वतंत्र अस्तीत्व-
➯16वीं सदी के बाद राजस्थानी भाषा अपने स्वतंत्र अस्तीत्व में आने लगी थी अर्थात् 16वीं सदी के बाद राजस्थानी भाषा का विकास एक स्वतंत्र भाषा के रूप में होने लगा था।
➯राजस्थानी एवं गुजराती भाषा का मिलाजुला रूप 16वीं सदी के अंत तक चलता रहा है।

👉जाॅर्ज अब्राहम ग्रियर्सन-
➯राजस्थानी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1912 में जाॅर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने अपने ग्रंथ लिंग्विस्टिक सर्वे आॅफ इण्डिया (Linguistic Survey of India) में किया था।
➯राजस्थानी भाषा या राजस्थानी बोलियों का पहली बार वैज्ञानिक अध्ययन जाॅर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने किया था।

👉राजस्थानी भाषा का वर्गीकरण-

1. सर जाॅर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का वर्गीकरण-
➯सर जाॅर्ज अब्राहम ग्रियर्सन अपनी पुस्तक या ग्रंथ लिंग्विस्टिक सर्वे आॅफ इण्डिया के 9वें खण्ड में सन् 1912 में राजस्थानी भाषा का स्वतंत्र भाषा के रूप में वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करने वाले प्रथम व्यक्ति है।
➯सर जाॅर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने राजस्थानी भाषा को 5 बोलियों में वर्गीकृत किया है जैसे-
1. पश्चिमी राजस्थानी बोली (मारवाड़ी)-
2. उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी बोली-
3. मध्यपूर्वी राजस्थानी बोली
4. दक्षिण-पूर्वी राजस्थानी बोली
5. दक्षिणी राजस्थानी बोली

1. पश्चिमी राजस्थानी बोली (मारवाड़ी)- बोलने वालों की संख्या वे क्षेत्रफल की दृष्टि से पश्चिमी राजस्थानी बोली सबसे महत्वपूर्ण है।
➯पश्चिमी राजस्थानी बोली में पूर्वी मारवाड़ी, उत्तरी मारवाड़ी, पश्चिमी मारवाड़ी, दक्षिणी मारवाड़ी बोली शामिल है।

2. उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी बोली-
➯उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी बोली में मेवाती व अहीरवाटी बोली शामिल है।

👉अहीरवाटी-
➯अहीरवाटी बोली राजस्थान में अलवर जिले के बहरोड़, मुण्डावर, किशनगढ़ के पश्चिमी भाग व कोटपूतली के उत्तरी भाग में बोली जाती है।
➯अहीरवाटी बोली बांगरु (हरियाणवी) तथा मेवाती बोली के बीच संधि स्थल की बोली है।
➯अहीरवाटी बोली के क्षेत्र को राठ कहा जाता है इसीलिए इसे राठी बोली भी कहते है।
➯जोधराज का हम्मीर रासो महाकाव्य अहीरवाटी बोली में ही लिखा गया है।

3. मध्यपूर्वी राजस्थानी बोली-
➯मध्यपूर्वी राजस्थानी बोली में ढूंढाड़ी व हाड़ौती बोली शामिल है।

4. दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी बोली-
➯दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी बोली में मालवी व रांगड़ी बोली शामिल है।

👉मालवी-
➯मालवी बोली राजस्थान के झालावाड़, कोटा और प्रतापगढ़ के मालवा से जुड़े भू-भाग में बोली जाती है।
➯मालवी बोली, मारवाड़ी बोली तथा ढूंढाड़ी बोली का मिश्रित प्रभाव है।
➯मालवी की उपबोलियां-
1. निमाड़ी
2. रांगड़ी

👉निमाड़ी-
➯निमाड़ी बोली राजस्थान के दक्षिणी भाग में बोली जाती है।

👉रांगड़ी-
➯रांगड़ी बोली राजपूतों में प्रचलित बोली है।
➯रांगड़ी कर्कश बोली है।
➯रांगड़ी बोली मारवाड़ी बोली व मालवी बोली के मिश्रण से उत्पन मालवा के राजपूतों की बोली है।
➯रांगड़ी बोली राजस्थान में मालव क्षेत्र (झालावाड़ व प्रतापगढ़) में बोली जाती है।

➯रांगड़ी बोली मालव क्षेत्र में राजपूतों के द्वारा बोले जाने वाली बोली है।

5. दक्षिणी राजस्थानी बोली-
➯दक्षिणी राजस्थानी बोली में नीमाड़ी व भीली बोली शामिल है।

2. डाॅ. एलपी टेस्सीटौरी का वर्गीकरण-
➯एल.पी.टेस्सीटोरी इटली के निवासी है।
➯एल.पी.टेस्सीटोरी की कार्यस्थली बीकानेर रही है।
➯एल.पी.टेस्सीटोरी की मृत्यु सन् 1919 में राजस्थान के बीकानेर जिलें में हुई थी।
➯एल.पी. टेस्सीटोरी की कब्र बीकानेर में ही है।
➯बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने डाॅ. एलपी टेस्सीटोरी को चारण साहित्य के सर्वेक्षण एवं सर्वे का कार्य सौंपा था।
➯डाॅ. एलपी टेस्सीटौरी ने निम्न ग्रंथ लिखे है।
1. राजस्थानी चारण साहित्य एवं ऐतिहासिक सर्वे
2. पश्चिमी राजस्थानी व्याकरण
➯डाॅ. एलपी टेस्सीटौरी ने मालवा व राजस्थान की भाषाओं को दो भागों में विभाजित किया है जैसे-
1. पश्चिमी राजस्थानी बोली या मारवाड़ी बोली
2. पूर्वी राजस्थानी बोली या ढूंढाड़ी बोली

1. पश्चिमी राजस्थानी भाषा-
➯पश्चिमी राजस्थानी भाषा का साहित्यिक रूप डिंगल है।
➯पश्चिमी राजस्थानी भाषा का उद्भव गुर्जर अपभ्रंश से हुआ है।
➯पश्चिमी राजस्थानी भाषा पर सर्वाधिक प्रभाव गुजराती भाषा का रहा है।

2. पूर्वी राजस्थानी भाषा-
➯पूर्वी राजस्थानी भाषा का साहित्यिक रूप पिंगल है।
➯पूर्वी राजस्थानी भाषा का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है।
➯पूर्वी राजस्थानी भाषा पर सर्वाधिक प्रभाव ब्रज भाषा का रहा है।

👉पश्चिमी राजस्थान की प्रमुख बोलियां-
👉मारवाड़ी बोली-
➯मारवाड़ी बोली का प्राचीन नाम मरुभाषा है।
➯मारवाड़ी बोली के साहित्यिक रूप को डिंगल कहते है।
➯मारवाड़ी बोली का उद्भव (उत्पत्ति) गुर्जर अपभ्रंश से हुआ है।
➯मारवाड़ी बोली का उत्पत्ति काल 8वीं सदी है।
➯मारवाड़ी बोली पर सर्वाधिक प्रभाव गुजराती भाषा का रहा है।
➯मारवाड़ी बोली राजस्थान की प्राचीनतम बोली मानी जाती है।
➯मारवाड़ी बोली पश्चिमी राजस्थान की प्रधान या प्रमुख बोली है।
➯मारवाड़ी बोली राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्रों में बाले जाने वाली बोली है।
➯जैन साहित्य एवं मीरा की अधिकांश रचनायें मारवाड़ी में है।
➯राजिया रा सोरठा, वेलि क्रिसन रुकमणी री, ढोला-मरवण, मूमल आदि लोकप्रिय काव्य मारवाड़ी भाषा में ही रचित है।
➯विशुद्ध मारवाड़ा (पुरी शुद्ध मारवाड़ी) बोली राजस्थान में जैसलमेर, बीकानेर, पाली, नागौर, जालोर, सिरोही, शेखावाटी, जोधपुर, व जोधपुर के आस-पास के क्षेत्रों में बोली जाती है।
➯मारवाड़ी की उपबोलियां-
1. गोडवाड़ी
2. देवड़ावाटी
3. थली
4. शेखावटी

👉गौड़वाड़ी-
➯गौड़वाड़ी बोली राजस्थान में पाली एवं जालोर जिले के उत्तरी भाग में बोली जाती है।

👉देवड़ावाटी-
➯देवड़ावाटी बोली राजस्थान में सिरोही जिले में बोली जाती है।

👉थली-
➯थली बोली राजस्थान में बाड़मेर व जैसलमेर जिलों में बोली जाती है।

👉शेखावाटी-
➯शेखावाटी बोली राजस्थान में झुन्झुनू, सिकर तथा चूरू जिलों में बोली जाती है।

👉मेवाड़ी-
➯मेवाड़ी बोली राजस्थान में भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, राजसमंद उदयपुर एवं उदयपुर के अास-पास के क्षेत्रों में बोली जाती है।
➯मेवाड़ी, मारवाड़ी के बाद दूसरी महत्वपूर्ण बोली है।
➯महाराणा कुंभा द्वारा रचित नाटकों में मेवाड़ी बोली का ही प्रयोग है।
➯मेवाड़ी भाषा के विकसित रूप 12-13वीं शताब्दी में देखने को मिलते है। 

👉बागड़ी-
➯बागड़ी बोली राजस्थान में डूंगरपुर व बांसवाड़ा व दक्षिणी-पश्चिमी उदयपुर के पहाड़ी भाग में बोली जाती है।
➯गुजरात के समीप होने के कारण बागड़ी बोली पर गुजराती भाषा का प्रभाव अधिक है।
➯भील बोली बागड़ी की ही सहायक बोली है।

👉बीकानेरी-
➯बीकानेरी बोली राजस्थान के बीकानेर जिले में बोली जाती है।

👉पूर्वी राजस्थान की प्रमुख बोलियां-
👉ढूंढाड़ी-
➯ढूंढाड़ी, पूर्वी राजस्थान की बोली है।
➯ढूंढाड़ी बोली राजस्थान के जयपुर, किशनगढ़ (अजमेर), टोंक तथा लावा (टोंक) तथा अजमेर मेरवाड़ा के पूर्वी अंचलों में बोली जाती है।
➯ढूंढाड़ी में गद्य एवं पद्य दोनों में प्रचूर साहित्य रचा गया है।
➯दादू दयाल एवं उनके शिष्यों ने ढूंढाड़ी भाषा में रचना की।
➯ढूंढाड़ी बोली सर्वाधिक जनसंख्या के द्वारा बोली जाती है।
➯ढूंढ़ाड़ी बोली के उपनाम जयपुरी बोली तथा झाड़साही बोली है।
➯ढूंढाड़ी बोली की उपबोलियां-
1. हाड़ौती
2. किशनगढ़ी
3. तोरावाटी
4. राजावाटी
5. नागरचोल

👉हाड़ौती-
➯हाड़ौती राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र कोटा, बारा, बूंदी तथा झालावाड़ जिलों में बोली जाती है।
➯हाड़ौती का भाषा के रूप में सर्वप्रथम प्रयोग केलाॅग कृत हिन्दी व्याकरण में 1815 ई. में हुआ।
➯सूर्यमल्ल मिश्रण की रचनायें हाड़ौती बोली में ही है।
➯वर्तनी की दृष्टि से हाड़ौती बोली राजस्थान की सभी बोलियों में सबसे कठिन समझी जाती है।

👉तोरावाटी-
➯तोरावाटी बोली राजस्थान के जयपुर के उत्तरी भाग तथा झुन्झुनू व सीकर के काटली नदी के अाप-पास के क्षेत्रों में बोली जाती है। अर्थात् तोरावाटी झुन्झुनू जिले के दक्षिणी भाग, सीकर जिले के पूर्वी एवं दक्षिणी भाग तथा जयपुर जिले के उत्तरी भाग में बोली जाती है।

👉राजावाटी-
➯राजावाटी बोली राजस्थान में जयपुर के पूर्वी भाग में बोली जाती है।

👉नागरचोल-
➯नागरचोल राजस्थान में सवाईमाधोपुर जिले के पश्चिमी भाग एवं टोंक जिले के दक्षिणी-पूर्वी भाग में बोली जाती है।

👉चौरासी-
➯चौरासी बोली राजस्थान में जयपुर जिले के पश्चिमी-पश्चिमी भाग एवं टोंक जिले के पश्चिमी भाग में बोली जाती है।

👉काठेड़ी-
➯काठेड़ी बोली राजस्थान में जयपुर के दक्षिणी भाग में बोली जाती है।

👉खैराड़ी-
➯खैराड़ी बोली राजस्थान में शाहपुरा (भीलवाड़ा), बूंदी के कुछ भागों में बोली जाती है।
➯खैराड़ी बोली मेबाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती का मिश्रित रूप है।

👉मेवाती-
➯मेवाती, पूर्वी राजस्थान की बोली है।
➯मेवाती बोली राजस्थान में अलवर, भरतपुर, धोलपुर तथा करौली के पूर्वी भाग में बोली जाती है।
➯मेवाती बोली ब्रजभाषा से प्रभावित है।
➯संत लालदास एवं चरणदास ने मेवाती भाषा में साहित्य की रचना की थी।
➯चरणदास की शिष्याएं दयाबाई व सहजोबाई की रचनायें भी मेवाती भाषा में है।
➯मेवाती बोली की उपबोली राठी, मेहण, कठेर है।
➯मेवाती बोली पश्चिमी हिन्दी व राजस्थानी भाषा के मध्य सेतु (पुल) का कार्य करने वाली बोली है।

👉राजस्थानी ब्रज-
➯राजस्थानी ब्रज बोली दिल्ली, उत्तर प्रदेश की सीमा से लगने वाले अलवर , भरतपुर, करौली व धौलपुर जिलों में बोली जाती है।

👉पंजाबी-
➯पंजाबी बोली राजस्थान के श्री गंगानगर व हनुमानगढ़ जिलों में बोली जाती है।

👉सीतारामलालस-
➯पद्म श्री सीतारामलालास ने राजस्थानी भाषा का शब्दकोश बनाया इस शब्दकोश में 2 लाख से अधिक शब्द है।
➯मारवाड़ी भाषा का प्रथम व्याकरण रामकरण आसोपा है।

No comments:

Post a Comment

कृपया कमेंट में कोई भी लिंक ना डालें