भारत की औद्योगिक नीतियां

भारत की औद्योगिक नीतियां

(Industrial Policy of India)


भारत की औद्योगिक नीतियां-

1. भारत की पहली औद्योगिक नीति (First Industrial Policy of India)- 1948

2. भारत की दूसरी औद्योगिक नीति (Second Industrial Policy of India)- 1956

3. भारत की तीसरी औद्योगिक नीति (Third Industrial Policy of India)- 1991


1. भारत की पहली औद्योगिक नीति (First Industrial Policy of India)-

भारत की पहली औद्योगिक नीति 6 अप्रैल 1948 को जारी की गई थी।

➠भारत की पहली औद्योगिक नीति डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के द्वारा जारी की गई थी।

➠भारत की पहली औद्योगिक नीति जारी की उस समय केंद्रीय उद्योग मंत्री डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे।

➠पहली औद्योगिक नीति के माध्यम से भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था के माॅडल को अपनाया गया था।

➠मिश्रित अर्थव्यवस्था में समाजवाद तथा पूंजीवाद का मिश्रण था। अर्थात् बाजार में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र अपनी भूमिका निभाएंगे।

➠पहली औद्योगिक नीति में उद्योगों को चार श्रेणियों में बाटा गया था। जैसे-

(I) सामरिक उद्योग (Strategic Industries)

(II) बुनियादी उद्योग (Basic Industries)

(III) महत्वपूर्ण उद्योग (Important Industries)

(IV) अन्य उद्योग (Others Industries)


(I) सामरिक उद्योग (Strategic Industries)-

➠सामरिक उद्योग में तीन उद्योगों को रखा गया था।

➠सामरिक उद्योग पूर्णतः सरकारी (सार्वजनिक) क्षेत्र के लिए आरक्षित था।


(II) बुनियादी उद्योग (Basic Industries)-

➠बुनियादी उद्योग में 6 उद्योगों को रखा गया था।

➠बुनियादी उद्योग में सरकारी (सार्वजनिक) क्षेत्र के साथ-साथ निजी क्षेत्र को भी अनुमती दी गई परन्तु नये निजी निवेश को अनुमती नहीं थी। अर्थात् पहले से चले आ रहे निजी व्यवसाय ही बुनियादी उद्योग में कार्य कर सकते है।


(III) महत्वपूर्ण उद्योग (Important Industries)-

➠महत्वपूर्ण उद्योग में कुल 18 उद्योगों को रखा गया था।

➠निजी और सरकारी (सार्वजनिक) दोनों क्षेत्रों को महत्वपूर्ण उद्योग में अनुमति थी।


(IV) अन्य उद्योग (Others Industries)-

➠शेष बचे उद्योगों को अन्य उद्योग में रखा गया था।

➠अन्य उद्योग निजी क्षेत्र के लिए खुला था।


2. भारत की दूसरी औद्योगिक नीति (Second Industrial Policy of India)-

भारत की दूसरी औद्योगिक नीति 30 अप्रैल 1956 को जारी की गई थी।

➠भारत की दूसरी औद्योगिक नीति पंडित जवाहरलाल नेहरू के द्वारा जारी की गई थी।

➠दूसरी औद्योगिक नीति पर प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस (पी.सी. महालनोबिस) का प्रभाव था।

➠दूसरी औद्योगिक नीति के माध्यम से भारत में दूसरी पंचवर्षिय योजना को लागू किया गया था।

➠दूसरी औद्योगिक नीति को भारत का आर्थिक संविधान भी कहा जाता है।


दूसरी औद्योगिक नीति में निम्नलिखित बातों पर जोर दिया गया था।-

(I) भारत में आर्थिक विकास के लिए सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

(II) भारत में तीव्र औद्योगीकरण के लिए भारी उद्योगों पर जोर दिया जाना चाहिए।

(III) भारत में निजी क्षेत्र को सरकारी नियंत्रण में रखा जाना चाहिए।

(IV) भारत में छोटे और कुटिर उद्योगों को सरकारी संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।


दूसरी औद्योगिक नीति में भारत में उद्योगों को तीन श्रेणियों में बाट दिया गया था। जैसे-

(I) श्रेणी 'अ'

(II) श्रेणी 'ब'

(III) श्रेणी 'स'


(I) श्रेणी 'अ'-

➠दूसरी औद्योगिक नीति की श्रेणी 'अ' में कुल 17 उद्योगों को रखा गया था।

श्रेणी 'अ' में रखे गये उद्योग पूर्णतः सरकारी क्षेत्र के लिए आरक्षित थे।


(II) श्रेणी 'ब'-

➠दूसरी औद्योगिक नीति की श्रेणी 'ब' में कुल 12 उद्योगों को रखा गया था।

श्रेणी 'ब' में रखे गये उद्योगों में सरकारी (सार्वजनिक) क्षेत्र के साथ-साथ निजी क्षेत्र को भी अनुमती दी गई थी।

श्रेणी 'ब' के उद्योगों में निजी क्षेत्र सरकार के नियंत्रण में था। अर्थात् श्रेणी 'ब' के उद्योगों के  लिए निजी क्षेत्र को सरकार से लाइसेंस की आवश्यकता थी।


(III) श्रेणी 'स'-

➠दूसरी औद्योगिक नीति की श्रेणी 'अ' तथा श्रेणी 'ब' के अलावा शेष बचे उद्योगों को श्रेणी 'स' में रखा गया था।

श्रेणी 'स' निजी क्षेत्र के लिए खुली थी। परन्तु निजी क्षेत्र को सरकार के द्वारा नियंत्रित किया जाता था।


भारत में दूसरी औद्योगिक नीति के सकारात्मक प्रभाव-

(I) भारत में दूसरी औद्योगिक नीति के लागू होने के शुरुआती काल में सकारात्मक प्रभाव देखे गये थे।

(II) भारत में दूसरी औद्योगिक नीति लागू होने के बाद सरकारी निवेश के कारण उत्पादन का स्तर बढ़ने लगा था।

(III) भारत में दूसरी औद्योगिक नीति लागू होने के बाद सरकार के द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (Public Sector Undertaking- PSU) की स्थापना की गई।

(IV) सरकार के द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) की स्थापना से रोजगार के नये अवसर सर्जित हुए।


भारत की दूसरी औद्योगिक नीति के नकारात्मक प्रभाव-

दीर्घकाल में भारत की दूसरी औद्योगिक नीति के नकारात्मक प्रभाव भी देखे गये थे। जैसे-

(I) भारत में दूसरी औद्योगिक नीति लागू होने के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) ही रोजगार प्रदान करने के मुख्य स्त्रोत बन गये थे। इसीलिए भारत में पर्याप्त मात्रा में रोजगार सर्जित नहीं किये जा सके।

(II) भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ने लगा था जिसके कारण सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की दक्षता प्रभावित हुई तथा लागत बढ़ने लगी थी।

(III) भारत में दूसरी औद्योगिक नीति लागू होने के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) घाटे में थे।

(IV) सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) के घाटे की भरपाई बजटीय सहायता से की जाने लगी जिसके कारण विस्तार और तकनीक में निवेश नहीं हो सका।

(V) भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) में प्रतिस्पर्धा का अभाव होने लगा था जिसके कारण उत्पादों की गुणवत्ता अच्छी नहीं थी।

(VI) भारत में दूसरी औद्योगिक नीति लागू होने के बाद निजी क्षेत्र अत्यधिक सीमित था इसके कारण भारत में औद्योगिक विकास कम हुआ।

(VII) दूसरी औद्योगिक नीति लागू होने से भारत में लाइसेंस कोटाराज स्थापित होने लगा था। जिसके कारण भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और भाई भतीजावाद को बढ़ावा मिलने लगा था।

(VIII) दूसरी औद्योगिक नीति लागू होने के बाद भारत में निर्यात अत्यधिक कम थे जिसके कारण विदेशी मुद्रा अर्जित नहीं की जा सकी।

(IX) भारत में दूसरी औद्योगिक नीति लागू होने का बाद 70 के दशक में लोक कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च बढ़ने लगा था जिसके कारण सरकार का बजटीय घाटा बढ़ गया था।


MRTP Act, 1969-

➠MRTP Act (English)- Monopolistic And Restrictive Trade Practices Act,1969

➠MRTP Act (Hindi)- एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1969

➠एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापार व्यवहार अधिनियम सन् 1969 में पारित किया गया था।

➠दूसरी औद्योगिक नीति में कोटा निर्धारित करने के लिए एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापार व्यवहार अधिनियम 1969 पारित किया गया था।


भारत में 1991 का संकट-

➠भारत में 1991 का संकट मूल रूप से भुगतान संतुलन का संकट था क्योंकि 1991 में भारत में विदेशी मुद्रा भंडार कम होकर 1 बिलियम अमेरिकी डाॅलर रह गया था।

➠1991 के संकट के समय भारत के अलावा अन्य देशों में भी संकट की स्थिति थी।

➠1991 के संकट के समय भारत में बजट घाटा लगभग 8%  था।

➠1991 के संकट के समय भारत की क्रेडिट रेटिंग को कम कर दिया गया था।

➠भारत पर विदेशी ऋण अधिक था जिसकों चुकाने के लिए विदेशी मुद्रा का प्रयोग किया जाता था।

➠1991 में भारत में राजनीतिक अस्थिरता थी।

➠1991 में चन्द्रशेखर सरकार बिना बजट पारित किये ही गिर गई थी।

➠1991 में खाड़ी युद्ध के कारण अंतर्राष्ट्रिय बाजार में कच्चे तेल की कीमते बढ़ गयी थी।

➠सोवियत संघ (USSR) का विघटन 1991 में हुआ था जिसके कारण वैश्विक परिदृश्य भी परिवर्तित हो गया था।


3. भारत की तीसरी औद्योगिक नीति (Third Industrial Policy of India)-

➠भारत में तीसरी औद्योगिक नीति 24 जुलाई 1991 को लागू की गई थी।

➠भारत में तीसरी औद्योगिक नीति लागू करने में पी.वी. नरसिम्हा राव तथा मनमोहन सिंह का योगदान रहा था।

➠भारत में तीसरी औद्योगिक नीति जारी की गई उस समय भारत का वित्त मंत्री मनमोहन सिंह था।

➠भारत में तीसरी औद्योगिक नीति जारी की गई उस समय भारत का प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव था।

➠तीसरी औद्योगिक नीति के माध्यम से 1991 में भारत में आर्थिक सुधारों को लागू किया गया था।

➠1991 में भारत में लागू किये गये आर्थिक सुधारों को LPG भी कहा जाता है। जैसे-

(I) L = Liberalisation (उदारीकरण)

(II) P = Privatization (निजीकरण)

(III) G = Globalization (वैश्वीकरण)


(I) उदारीकरण-

(A) औद्योगिक विनियमन-

(B) वित्तीय क्षेत्र में सुधार

(C) कर सुधार

(D) विदेशी व्यापार


(A) औद्योगिक विनियमन-

➠तीसरी औद्योगिक नीति में औद्योगिक प्रतिबंधों को समाप्त करने तथा अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को खोलने के लिए उदारीकरण का प्रयोग किया गया।

➠तीसरी औद्योगिक नीति में औद्योगिक श्रेणियों को समाप्त कर दिया गया था। परन्तु अपवाद के स्वरूप तीन क्षेत्रों के सरकार के लिए आरक्षित रखा गया था। जैसे-

(1) रेलवे

(2) परमाणु ऊर्जा

(3) परमाणु खनिज।

➠तीसरी औद्योगिक नीति में लाइसेंस राज को समाप्त कर दिया गया था परन्तु 5 क्षेत्रों को अपवाद के रूप में लाइसेंस आवश्यक था। जैसे-

(1) शराब तथा तम्बाकू उत्पाद

(2) खतरनाक रसायन

(3) औद्योगिक विस्फोटक

(4) इलेक्ट्राॅनिक तथा वायुयान के उपकरण

(5) दवाइयां और औषधि

➠तीसरी औद्योगिक नीति लागू होने के बाद कीमतों का निर्धारण बाजार के द्वारा किया जायेगा अतः कीमतों के निर्धारण में सरकार के द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा।

➠तीसरी औद्योगिक नीति में कोटाराज को समाप्त करने के लिए एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1969 (MRTP Act, 1969) को संसोधित किया गया।

➠वर्ष 2002 में एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1969 (MRTP Act, 1969) को प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 (Competition Act, 2002) से प्रतिस्थापित कर दिया गया था। अर्थात् एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1969 (MRTP Act, 1969) को प्रतिस्पर्धा अधिनियम (Competition Act, 2002) से बदल दिया गया था।


(B) वित्तीय क्षेत्र में सुधार-

➠तीसरी औद्योगिक नीति में वित्तीय क्षेत्र में सुधार के लिए नरसिम्हन समिति का गठन किया गया था।

➠भारतीय अर्थव्यवस्था में 1991 के आर्थिक संकट के दौरान वित्तीय क्षेत्र (बैंकिंग क्षेत्र) में सुधार के लिए जून 1991 में नरसिंहम की अध्यक्षता में नरसिंहम समिति का गठन किया गया था।


(C) कर सुधार-

➠तीसरी औद्योगिक नीति में कर सुधार के लिए राजा चेलैया समिति का गठन किया गया था।

➠भारतीय अर्थव्यवस्था में 1991 के आर्थिक संकट के दौरान कर क्षेत्र में सुधार के लिए 1991 में राजा चेलैया की अध्यक्षता में राजा चेलैया समिति का गठन किया गया था।


(D) विदेशी व्यापार-

➠तीसरी औद्योगिक नीति में आयात लाइसेंस की नीति को समाप्त कर दिया गया था।

➠आयात प्रतिस्थापन की बजाय निर्यातों को बढ़ाने पर जोर दिया गया था।

➠विनिमय दर को बाजार आधारित बनाया गया था।

➠1991 से पहले विनिमय दर का निर्धारण सरकार के द्वारा किया जाता था।

➠1991 में दो बार रुपये का अवमूल्यन किया गया।

➠1993 में बाजार आधारित विनिमय दर को अपनाया गया था परन्तु बाजार आधारित विनिमय दर को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के द्वारा प्रबंधित किया जाता है। RBI के द्वारा इस प्रबंधन को Floating But Managed कहते है।


(II) निजीकरण-

➠निजीकरण का अर्थ है सरकारी कंपनियों का स्वामित्व निजी क्षेत्र को हस्तांतरित करना।

➠निजीकरण के लिए विनिवेश का प्रयोग किया जाता है।

➠निजीकरण दो प्रकार से किया जाता है। जैसे-

(अ) सरकारी कंपनी में सरकार की हिस्सेदारी को 51% से कम करना।

(ब) सरकारी कंपनी की पूर्ण बिक्री करना।


(III) वैश्वीकरण-

➠वैश्वीकरण का अर्थ है घरेलू अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ना।

➠वैश्वीकरण में पूरे विश्व को एक गाँव के स्वरूप में देखा गया।

➠वैश्वीकरण में वस्तु, सेवा और निवेश का मुक्त प्रवाह होता है।

➠वैश्वीकरण के लिए निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया गया-

(A) आउटसोर्सिंग (Outsourcing)

(B) वैश्विक पदचिह्न (Global Footprint)

(C) विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization- WTO)


(A) आउटसोर्सिंग (Outsourcing)-

➠आउटसोर्सिंग के तहत देश में रहते हुए विदेशों में सेवाएं उपलब्ध करवायी जाती है। जैसे- Business Process Outsourcing (BPO), IT Company आदि।


(B) वैश्विक पदचिह्न (Global Footprint)-

➠वैश्विक पदचिह्न के तहत घरेलू कंपनियों के द्वारा विदेशी निवेश किया जाता है। जैसे- Oil and Natural Gas Corporation (ONGC) Videsh Limited, Infosys, Tata Motors आदि।


(C) विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization- WTO)-

➠तीसरी औद्योगिक नीति में भारत विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य बना।


1991 के आर्थिक सुधारों का मूल्यांकन-

1. सफलताएं

2. सीमाएं

3. सुझाव


1. सफलताएं-

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद औद्योगिक विकास एवं सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में वृद्धि हुई।

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद विदेशी पूंजी के निवेश में वृद्धि हुआ। अर्थात् FDI एवं FII भी बढ़ी है।

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद विदेशी प्रौद्योगिकी को बढ़ावा दिया गया।

➠विदेशी प्रौद्योगिकी को बढ़ावा दिये जाने से कारण उत्पादकता बढ़ती है।

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि हुई है।

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद सार्वजनिक (सरकारी) क्षेत्र के उपक्रमों की प्रतिस्पर्धा में वृद्धि हुई है।

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में बुनियादी ढांचे का विकास हुआ है।

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में गरीबी कम हुई है।

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है।


2. सीमाएं-

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में जनसंख्या के अनुरूप रोजगार के अवसरों में वृद्धि नहीं हुई है।

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में छोटे उद्योग प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर पाये।

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत के आधारभूत ढांचे का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया।

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत की GDP की वृद्धि में मुख्यतः योगदान सेवा क्षेत्र का है।

➠कुछ विशेषज्ञों ने 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद GDP की वृद्धि को Jobless Growth की संज्ञा दी है।

➠1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में आर्थिक असमानता में वृद्धि हुई है।


3. सुझाव-

➠आर्थिक सुधारों की सफलताओं को बढ़ाने तथा सीमाओं को कम करने के लिए सरकार को ओर अधिक सुधार करने चाहिए तथा बाजार का बेहतर नियमन किया जाना चाहिए।

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