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मौर्य वंश

 मौर्य वंश (322 ई.पू. - 185 ई.पू.)

(Maurya Dynasty- 322 - 185 BC)


मौर्य वंश-

➠बौद्ध साहित्य के अनुसार मौर्य क्षत्रिय थे।

➠जैन साहित्य के अनुसार मौर्य क्षत्रिय थे।

➠ब्राह्मण साहित्य के अनुसार मौर्य शूद्र थे।

➠विशाखदत्त की पुस्तक मुद्राराक्षस के अनुसार मौर्य वृषल थे।

➠वृषल का अर्थ है निम्नवर्गीय

➠इतिहासकार रोमिला थापर के अनुसार मौर्य वैश्य थे।

➠सर्वाधिक मान्य मत के अनुसार मौर्य क्षत्रिय थे।


मौर्य वंश के प्रमुख राजा-

1. चन्द्रगुप्त मौर्य (322 - 298 ई.पू.)

2. बिन्दुसार मौर्य (298 - 273 ई.पू.)

3. अशोक मौर्य (273 - 232 ई.पू.)


1. चन्द्रगुप्त मौर्य (322 - 298 ई.पू.)-

➠चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन काल 322 ई.पू. से लेकर 298 ई.पू. तक था।

➠चाणक्य (कौटिल्य) ने चन्द्रगुप्त मौर्य को 1000 कार्षापण में खरीदा था।

➠उस समय कार्षापण चाँदी के सिक्कों को कहा जाता था।

➠चन्द्रगुप्त मौर्य की शिक्षा तक्षशिला में हुई थी।

➠चाणक्य तक्षशिला में आचार्य थे।

➠यूनानी इतिहासकारों ने चन्द्रगुप्त मौर्य को सैंड्रोकोटस एवं एंड्रोकोटस कहा है।

➠कालांतर में विलियम जोन्स ने बताया की चन्द्रगुप्त मौर्य ही सैंड्रोकोटस है।

➠ग्रीक इतिहासकार जस्टिन के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य की सेना एक लुटेरी सेना थी।

➠298 ई.पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य भद्रबाहु के साथ चंद्रगिरि पहाड़ी गया था। तथा चन्द्रगुप्त मौर्य ने चंद्रगिरि पहाड़ी पर संथारा या सल्लेखना द्वारा अपने प्राण त्याग दिये थे। अर्थात् उपवास के माध्यम से अपने प्राण त्याग दिये थे।

➠चंद्रगिरि की पहाड़ीया भारत के कर्नाटक राज्य के श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर स्थित है।


सेल्यूकस निकेटर-

➠सेल्यूकस निकेटर मैसिडोनिया के शासक चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रमुख से

➠305 ई.पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य ने सिकंदर के प्रमुख सेनापति सेल्यूकस निकेटर को पराजित किया था।

➠सिकंदर यूनानी शासक था। (सिकंदर मैसिडोनिया का राजा था)

➠चन्द्रगुप्त मौर्य के द्वारा सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस निकेटर को पराजित करने तथा संधि की जानकारी यूनानी इतिहासकार स्ट्रेबो एवं एप्पियानस के द्वारा दी गई थी।

➠चन्द्रगुप्त मौर्य से पराजित होने के बाद सेल्यूकस निकेटर ने ऐरिया, अराकोसिया, जेड्रोसिया एवं परोपनीसडाई क्षेत्र चन्द्रगुप्त मौर्य को सौंप दिये थे।

➠ऐरिया क्षेत्र को वर्तमान में हैरात के नाम से जाना जाता है।

➠अराकोसिया क्षेत्र को वर्तमान में कंधार के नाम से जाना जाता है।

➠जेड्रोसिया क्षेत्र को वर्तमान में बलूचिस्तान या मकरन के नाम से जाना जाता है।

➠परोपनीसडाई क्षेत्र को वर्तमान में काबुल के नाम से जाना जाता है।

➠सेल्यूकस निकेटर ने अपनी बेटी हेलेना या हेलेन का विवाह चन्द्रगुप्त से करवाया था।

➠सेल्यूकस निकेटर ने अपना राजदूत मेगस्थनीज को चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा था।

➠चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस निकेटर को 500 हाथी उपहार में दिये थे।


2. बिन्दुसार (298 - 273 ई.पू.)-

➠बिन्दुसार का शासन काल 298 ई.पू. से लेकर 273 ई.पू. तक था।

➠बिन्दुसार चन्द्रगुप्त मौर्य का बेटा था।

➠यूनानी इतिहासकार ने बिन्दुसार को अमित्रोचेटस (अमित्रघात) कहा गया है। अर्थात् यूनानी ग्रंथों में बिन्दुसार को अमित्रोचेटस कहा गया है।

➠जैन साहित्य में बिन्दुसार को सिंहसेन कहा गया है।

➠तिब्बत के इतिहासकार तारानाथ के अनुसार बिन्दुसार एक महान शासक था।

➠इतिहासकार तारानाथ के अनुसार बिन्दुसार ने दक्षिण भारत पर आक्रमण किया था।

➠बिन्दुसार आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था।

➠बिन्दुसार के समय तक्षशिला में दो विद्रोह हुए जिसमें एक विद्रोह का दमन अशोक ने किया तथा दूसरे विद्रोह का दमन सुसीम या सुशीम ने किया था।

➠अशोक तथा सुशीम या सुसीम दोनों बिन्दुसार के बेटे थे। अर्थात् अशोक तथा सुसीम दोनों भाई थे।

➠बिन्दुसार के शासन काल में नेपाल में खस जनजाति ने विद्रोह किया था।

➠खस जनजाति के विद्रोह का दमन अशोक ने किया था अर्थात् अशोक ने खस जनजाति के विद्रोह को दबाया था।

➠यूनानी या ग्रीक इतिहासकार एथीनियस के अनुसार बिन्दुसार ने यूनान के शासक से तीन चीजें मंगवाई थी जैसे-

1. मीठी शराब

2. सूखे मेवे (अंजीर)

3. दार्शनिक सोफिस्ट

➠यूनानी शासक ने केवल मीठी शराब एवं सूखे मेवे (अंजीर) ही भेजे थे।


3. अशोक मौर्य (273 - 232 ई.पू.)-

➠बौद्ध साहित्य के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाईयों की हत्या करने के बाद राजगद्दी प्राप्त की थी।

➠अशोक का राज्याभिषेक 269 ई.पू. में हुआ था।

➠अशोक के राजा बनने से पहले 4 वर्ष तक उत्तराधिकारी संघर्ष चला था।

➠अशोक का मुख्य प्रतिद्वंदी उसका भाई सुशीम था।

➠अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी या भीमा था।

➠अशोक के पिता का नाम बिन्दुसार था।

➠राजा बनने से पहले अशोक अवन्ति का गवर्नर था।

➠अशोक ने अपने शासन काल के 8वें वर्ष में कलिंग पर आक्रमण किया था।

➠कलिंग की राजधानी तोसली थी।

➠खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार कलिंग का राजा नंदराज था।

➠अशोक की मृत्यु के पश्चात मौर्य वंश दो भागों में विभाजित हो गया था जैसे-

1. पूर्वी भाग

2. पश्चिमी भाग


1. पूर्वी भाग-

➠मौर्य वंश के पूर्वी भाग का शासक दशरथ था।

➠दशरथ आजीवक पंथ या आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था।


2. पश्चिमी भाग-

➠मौर्य वंश के पश्चिमी भाग का शासक समप्रति था।

➠समप्रति जैन धर्म का अनुयायी था।


अशोक की पत्नियां-

1. देवी

2. कारुवकी या कोरुवकी (करुवकी)

3. पद्मावती

4. तिश्यारक्षा


1. देवी-

➠देवी मौर्य वंश के शासक अशोक की पत्नी थी।

➠देवी के पुत्र का नाम महेंद्र था।

➠देवी की पुत्री का नाम संघमित्रा था।

➠देवी के पुत्र महेंद्र व पुत्री संघमित्रा ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म फैलाया था। या बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया था।


2. कारुवकी या कोरुवकी (करुवरी)-

➠कारुवकी या कोरुवकी मौर्य वंश के शासक अशोक की पत्नी थी।

➠कारुवकी के पुत्र का नाम तीवर था।

➠रानी के अभिलेख में कारुवकी तथा कोरुवकी के पुत्र तीवर का उल्लेख मिलता है।


3. पद्मावती-

➠पद्मावती मौर्य वंश के शासक अशोक की पत्नी थी।

➠पद्मावती के पुत्र का नाम कुणाल था।


4. तिश्यारक्षा-

➠तिश्यारक्षा मौर्य वंश के शासक अशोक की पत्नी थी।

➠तिश्यारक्षा ने पद्मावती के पुत्र कुणाल की आँखे फुड़वा दी थी।

➠अशोक ने तिश्यारक्षा को जिन्दा जलवा दिया था।


कलिंग युद्ध-

➠कलिंग युद्ध मौर्य वंश के शासक अशोक तथा कलिंग के राजा नंदराज के मध्य लड़ा गया था।

➠कलिंग के युद्ध में अशोक की जीत हुई तथा नंदराज हार गया था।

➠कलिंग के युद्ध में 1 लाख लोग मारे गये थे तथा 1.50 लाख लोगों को युद्धबंदी बनाया गया था।

➠कलिंग युद्ध के पश्चात अशोक ने युद्ध नीति या युद्ध घोष के स्थान पर धम्म नीति या धम्म घोष को अपनाया था।


कल्हण-

➠कल्हण एक इतिहासकार था।

➠कल्हण कश्मीर का निवासी एवं ब्राह्मण था।

➠कल्हण ने राजतरंगिणी नामक पुस्तक की रचना की थी।


अशोक का धर्म-

➠कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार अशोक पहले भगवान शिव का भक्त था।

➠अशोक ने झेलम नदी के किनारे श्रीनगर शहर बसाया था।

➠अशोक ने श्रीनगर में शिव मंदिर का निर्माण करवाया था।

➠अशोक ने नेपाल में ललित पाटन शहर बसाया था।

➠अशोक की बेटी चारुमती मौर्य ने नेपाल में देवी पाटन शहर बसाया था।

➠दीपवंश एवं महावंश के अनुसार सुसीम या सुशीम के पुत्र निग्रोथ ने अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था।

➠दीपवंश एवं महावंश सिंहल (श्रीलंका) साहित्य है।

➠अशोक मोग्गलिपुत्त तिस्स के कारण बौद्ध धर्म से प्रभावित हुआ था।

➠दिव्यावदान पुस्तक एवं चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार उपगुप्त ने अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था।

➠दिव्यावदान पुस्तक की रचना दुर्गा भागवत ने की थी।

➠अशोक ने अपने शासक काल के 10वें वर्ष में बोधगया की यात्रा की थी।

➠अशोक ने अपने शासक काल के 20वें वर्ष में लुम्बिनी की यात्रा की थी।

➠भाब्रू अभिलेख से अशोक के बौद्ध होने की जानकारी मिलती है।

➠भाब्रू अभिलेख भारत के राजस्थान राज्य के जयपुर जिले के विराट नगर से प्राप्त हुआ है।


अशोक का धम्म-

➠धम्म अशोक की आचार संहिता थी।

➠धम्म का बौद्ध धर्म से कोई संबंध नहीं है।

➠धम्म पर थोड़ा बहुत बुद्ध धर्म का प्रभाव था।

➠द्वितीय वृहत स्तम्भ लेख में धम्म की परिभाषा का उल्लेख किया गया है।

➠धम्म में माता पिता की सेवा, अतिथि का सत्कार, सबका कल्याण जैसी शिक्षाएं है।

➠अशोक ने धम्म यात्राओं का आयोजन करवाया तथा प्रचार के लिए यात्राएं की थी।

➠धम्म में स्वर्ग की झाँकिया निकाली जाती थी।

➠अशोक ने अपने शासन काल के 13वें वर्ष में धम्म महामात्य की नियुक्ति की थी।

➠धम्म महामात्य लोगों को दान देने के लिए प्रोत्साहित करता था।

➠धम्म महामात्य मृत्यु की सजा प्राप्त व्यक्ति के परिवार के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करता था।

➠अशोक ने धम्म के प्रचार प्रसार के लिए अभिलेख लिखवाये थे।


अभिलेख (Inscription)-

➠अभिलेख तीन प्रकार के होते है। जैसे-

1. शिलालेख (Rock Edict)

2. स्तम्भ लेख (Pillar Edict)

3. गुहालेख (Cave Edict)


1. शिलालेख (Rock Edict)-

➠पत्थर पर लिखे गये लेखों को शिलालेख कहा जाता है।

➠शिलालेखों को दो भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(I) लघु शिलालेख

(II) वृहत शिलालेख


2. स्तम्भ लेख (Pillar Edict)-

➠स्तम्भ पर लिखे गये लेखों को स्तम्भ लेख कहा जाता है।

➠स्तम्भ लेखों को दो भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(I) लघु स्तम्भ लेख

(II) वृहत स्तम्भ लेख


3. गुहालेख (Cave Edict)-

➠गुफाओं पर लिखे गये लेखों को गुहालेख कहा जाता है।


अशोक के वृहत शिलालेख-

➠अशोक के वृहत शिलालेखों की संख्या 14 है एवं ये सभी 8 स्थानों से प्राप्त होते है। जैसे-

1. शाहबाजगढ़ी (पेशावर, पाकिस्तान)

2. मानसेरा या मानसेहरा (पेशावर, पाकिस्तान)

3. कालसी (उत्तराखंड)

4. जूनागढ़ (गुजरात)

5. सोपारा (महाराष्ट्र)

6. धौली  (ओडिशा)

7. जौगढ़ या जौगड़ (गंजम जिला, ओडिशा)

8. एर्रगुडी या येर्रागुडी या येर्रगुडी (आंध्र प्रदेश)


पृथक कलिंग प्रज्ञापन-

➠अशोक के 13वें वृहत शिलालेख में कलिंग आक्रमण की या युद्ध की जानकारी मिलती है। 

➠अशोक ने धौली व जौगढ़ से मिले अभिलेखों में समस्त प्रजा को अपनी संतान के समान बताया है।


अशोक के लघु शिलालेख-

➠अशोक के लघु शिलालेखों में अशोक की व्यक्तिगत जानकारियां मिलती है।

➠अशोक के लघु शिलालेख जैसे-

1. मास्की अभिलेख (कर्नाटक)

2. गुर्जरा अभिलेख (मध्य प्रदेश)

3. उदेगोलम अभिलेख (कर्नाटक)

4. नेट्टूर अभिलेख (कर्नाटक)

5. ब्रह्मगिरी अभिलेख (कर्नाटक)

6. सिद्धपुर अभिलेख (कर्नाटक)

7. जतिंग रामेश्वर अभिलेख (कर्नाटक)


1. मास्की अभिलेख (कर्नाटक)-

➠मास्की अभिलेख मौर्य वंश के शासक अशोक का लघु शिलालेख है।

➠मास्की अभिलेख में अशोक के नाम का उल्लेख मिलता है।

➠मास्की अभिलेख भारत के कर्नाटक राज्य से प्राप्त हुआ है।


2. गुर्जरा अभिलेख (मध्य प्रदेश)-

➠गुर्जरा अभिलेख मौर्य वंश के शासक अशोक का लघु शिलालेख है।

➠गुर्जरा अभिलेख में अशोक के नाम का उल्लेख मिलता है।

➠गुर्जरा अभिलेख भारत के मध्य प्रदेश राज्य के गुर्जरा नामक स्थान से प्राप्त हुआ है।


3. उदेगोलम अभिलेख (कर्नाटक)-

➠उदेगोलम अभिलेख मौर्य वंश के शासक अशोक का लघु शिलालेख है।

➠उदेगोलम अभिलेख में अशोक के नाम का उल्लेख मिलता है।

➠उदेगोलम अभिलेख भारत के कर्नाटक राज्य के बेल्लारी जिले के उदेगोलम नामस स्थान से प्राप्त हुआ है।


4. नेट्टूर अभिलेख (कर्नाटक)-

➠नेट्टूर अभिलेख मौर्य वंश के शासक अशोक का लघु शिलालेख है।

➠नेट्टूर अभिलेख में अशोक के नाम का उल्लेख मिलता है।

➠नेट्टूर अभिलेख भारत के कर्नाटक राज्य से प्राप्त हुआ है।


5. ब्रह्मगिरी अभिलेख (कर्नाटक)-

➠ब्रह्मगिरी अभिलेख मौर्य वंश के शासक अशोक का द्वितीय लघु शिलालेख है।

➠ब्रह्मगिरी अभिलेख भारत के कर्नाटक राज्य से प्राप्त हुआ है।

➠ब्रह्मगिरी अभिलेख में धम्म का सार मिलता है।


6. सिद्धपुर अभिलेख (कर्नाटक)-

➠सिद्धपुर अभिलेख मौर्य वंश के शासक अशोक का द्वितीय लघु शिलालेख है।

➠सिद्धपुर अभिलेख भारत के कर्नाटक राज्य के चित्रदुर्ग जिले के सिद्धपुर नामक स्थान से प्राप्त हुआ है।

➠सिद्धपुर अभिलेख में धम्म का सार मिलता है।


7. जतिंग रामेश्वर अभिलेख (कर्नाटक)-

➠जतिंग रामेश्वर अभिलेख मौर्य वंश के शासक अशोक का द्वितीय लघु शिलालेख है।

➠जतिंग रामेश्वर अभिलेख भारत के कर्नाटक राज्य के चितलदुर्ग जिले के जतिंग रामेश्वर नामक स्थान से प्राप्त हुआ है।

➠जतिंग रामेश्वर अभिलेख में धम्म का सार मिलता है।


अशोक के वृहत स्तम्भ लेख-

➠अशोक के वृहत स्तम्भ लेखों के संख्या 7 है।

➠अशोक के वृहत स्तम्भ 6 स्थानों से प्राप्त होते है।

➠अशोक के वृहत स्तम्भ लेख निम्नलिखित है।-

1. प्रयाग प्रशस्ति (प्रयाग, उत्तर प्रदेश)

2. दिल्ली टोपरा स्तम्भ लेख (दिल्ली)

3. दिल्ली मेरठ स्तम्भ लेख (दिल्ली)

4. लौरिया अरराज (बिहार)

5. लौरिया नंदनगढ़ (बिहार)

6. रामपुरवा (बिहार)


1. प्रयाग प्रशस्ति-

➠प्रयाग प्रशस्ति स्तम्भ मूल रूप से कौशाम्बी में था।

➠अकबर ने प्रयाग प्रशस्ति को प्रयाग में स्थापित करवाया था।

➠प्रयाग भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयाग जिले में स्थित है।

➠प्रयाग का वर्तमान नाम या आधुनिक नाम इलाहाबाद है।

➠प्रयाग प्रशस्ति में क्रमशः निम्नलिखित अभिलेख लिखे हुए है। जैसे-

(I) अशोक का अभिलेख

(II) रानी का अभिलेख

(III) हरिषेण का अभिलेख (समुद्रगुप्त)

(IV) बीरबर का अभिलेख

(V) जहाँगीर का अभिलेख


2. दिल्ली टोपरा स्तम्भ लेख-

➠दिल्ली टोपरा स्तम्भ लेख पहले हरियाणा राज्य के अंबाला जिले के टोपरा नामक स्थान पर स्थित था।

➠मध्यकालीन शासक फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली टोपरा स्तम्भ लेख को दिल्ली में स्थापित करवाया था।

➠दिल्ली टोपरा स्तम्भ लेख पर मौर्य शासक अशोक के पूरे 7 अभिलेख मिलते है।

➠दिल्ली टोपरा स्तम्भ लेख एकमात्र स्तम्भ लेख है जिस पर अशोक के 7 अभिलेख मिलते है।

➠दिल्ली टोपरा स्तम्भ लेख के 7वें अभिलेख में जैन धर्म तथा आजीवक धर्म की जानकारी मिलती है।


3. दिल्ली मेरठ स्तम्भ लेख-

➠दिल्ली मेरठ स्तम्भ लेख पहले या मूल रूप से भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ जिले के मेरठ नामक स्थान पर स्थित था।

➠मध्यकालीन शासक फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली मेरठ स्तम्भ लेख को दिल्ली में स्थापित करवाया था।


अशोक के लघु स्तम्भ लेख-

➠अशोक के लघु स्तम्भ लेखों में अशोक की राजनीतिक घोषणाओं की जानकारी मिलती है।

➠अशोक के लघु स्तम्भ लेख निम्नलिखित है। जैसे-

1. रुम्मिनदेई स्तम्भ लेख

2. सारनाथ स्तम्भ लेख

3. साँची स्तम्भ लेख


1. रुम्मिनदेई स्तम्भ लेख-

➠रुम्मिनदेई स्तम्भ लेख अशोक का लघु स्तम्भ लेख है।

➠रुम्मिनदेई स्तम्भ लेख नेपाल के लुम्बिनी में स्थित है।

➠रुम्मिनदेई स्तम्भ लेख से मौर्य काल की आर्थिक नीति की जानकारी मिलती है। अर्थात् रुम्मिनदेई स्तम्भ लेख से मौर्य काल की राजस्व नीति की जानकारी मिलती है।

➠लुम्बिनी (नेपाल) यात्रा के दौरान अशोक ने भू-राजस्व घटाकर 1/6 से 1/8 कर दिया था।


2. सारनाथ स्तम्भ लेख-

➠सारनाथ स्तम्भ लेख भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के सारनाथ में स्थित है।

➠सारनाथ स्तम्भ लेख में अशोक बौद्ध भिक्षुओं को चेतावनी देता है और कहता है की यदि किसी ने बौद्ध संघ में फूट डालने का प्रयास किया तो उसे दंडित किया जाएगा और जेल रहने लायक स्थान नहीं है। और कैदी सफेद या श्वेत रंग के वस्त्र धारण करते है।


3. साँची स्तम्भ लेख-

➠साँची स्तम्भ लेख भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन जिले में साँची नामक स्थान पर स्थित है।

➠साँची स्तम्भ लेख में अशोक बौद्ध भिक्षुओं को चेतावनी देता है और कहता है की यदि किसी ने बौद्ध संघ में फूट डालने का प्रयास किया तो उसे दंडित किया जाएगा और जेल रहने लायक स्थान नहीं है। और कैदी सफेद या श्वेत रंग के वस्त्र धारण करते है।


अशोक के गुहालेख-

1. कर्ण चौपड़ गुफा

2. सुदामा गुफा

3. विश्व झोपड़ी गुफा

➠अशोक ने उपर्युक्त सभी गुफाओं का निर्माण आजीवक साधुओं के लिए करवाया था।

➠अशोक ने उपर्युक्त सभी गुफाओं पर लेख लिखवाये थे जिन्हें गुहालेख कहा जाता है।


अशोक के अभिलेखों की भाषा-

➠अशोक के अभिलेख प्राकृत भाषा (स्थानीय भाषा या प्रादेशिक भाषा) में लिखे गए है।


अशोक के अभिलेखों की लिपियाँ-

➠अशोक के अभिलेख चार लिपियों में लिखे गये थे जैसे-

1. ब्राह्मी लिपि

2. खरोष्टी लिपि

3. आरमेइक लिपि

4. ग्रीक लिपि या यूनानी लिपि

➠अशोक के सर्वाधिक अभिलेख ब्राह्मी लिपि में लिखे गये है।


अशोक के अभिलेखों की खोज-

➠1750 ई. में टेफेन्थैलर ने अशोक के अभिलेखों की खोज की थी।


अशोक के अभिलेखों को पढ़ा-

➠1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने अशोक के अभिलेखों को पढ़ा था। अर्थात् अशोक के अभिलेखों के सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था।


कंधार अभिलेख या शर कुना अभिलेख या शर-ए-कुना अभिलेख-

➠कंधार अभिलेख को ही शर कुना या शर-ए-कुना अभिलेख कहा जाता है।

➠कंधार अभिलेख अशोक का द्विभाषीय अभिलेख है।

➠कंधार अभिलेख ग्रीक व आरामेइक दो लिपियों में लिखा गया है।

➠D.R. भण्डारकर (D.R. Bhandarkar) ने अशोक के अभिलेखों के आधार पर अशोक का इतिहास लिखा है।


मौर्यकालीन कला-

➠मौर्यकालीन कला को दो भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

1. संरक्षित कला या राजकीय कला

2. लोक कला


1. संरक्षित कला या राजकीय कला-

➠मौर्यकालीन कला में संरक्षित कला या राजकीय कला को 4 भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(I) महल

(II) स्तूप

(III) स्तम्भ

(IV) गुफा (चैत्य)


(I) महल-

➠बुलंदी बाग से लकड़ी के महलों के साक्ष्य मिलते है।

➠बुलंदी बाग भारत के बिहार राज्य के पाटलिपुत्र (पटना) में स्थित एक स्थान है।

➠कुम्रहार से राजप्रसाद के साक्ष्य मिलते है।

➠कुम्रहार नामक स्थान भारत के बिहार राज्य के पटना में स्थित है।

➠यूनानी इतिहासकार मेगस्थनीज एवं स्ट्रेबो ने पाटलिपुत्र के महलों व नगर नियोजन की प्रशंसा की है।

➠यूनानी इतिहासकार ऐरियन ने पाटलिपुत्र के महलों को सूसा एवं एकवेतना के महलों से अधिक सुंदर बताया है।

➠चीनी यात्री फाह्यान के अनुसार ऐसे (पाटलिपुत्र के महलों) महलों का निर्माण केवल देवता व दानव ही कर सकते है।


(II) स्तूप-

➠बौद्ध साहित्य के अनुसार अशोक ने 84000 स्तूपों का निर्माण करवाया था।

➠अशोक के प्रमुख स्तूप निम्नलिखित है। जैसे-

(A) धर्मराजिका स्तूप (सारनाथ, उत्तर प्रदेश)

(B) धर्मराजिका स्तूप (तक्षशिला, उत्तर प्रदेश)

(C) साँची स्तूप (साँची, भोपाल, मध्य प्रदेश)


(A) धर्मराजिका स्तूप (सारनाथ, उत्तर प्रदेश)-

➠धर्मराजिका स्तूप भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी जिले के सारनाथ में स्थित है।


(B) धर्मराजिका स्तूप (तक्षशिला, उत्तर प्रदेश)-

➠धर्मराजिका स्तूप भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के तक्षशिला क्षेत्र में स्थित है।


(C) साँची स्तूप (साँची, भोपाल, मध्य प्रदेश)-

➠साँची स्तूप भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन जिसे में साँची नाम नगर के पास एक पहाड़ी पर स्थित है।

➠साँची स्तूप शारीरिक स्तूप है।

➠साँची से भगवान बुद्ध से अवशेष प्राप्त होते है।

➠साँची स्तूप का निर्माण मौर्य काल में हुआ था।

➠शुंग वंश के शासन काल में साँची स्तूप का विस्तार किया गया था।

➠साँची का स्तूप अपने सुंदर तोरण द्वार के लिए लोकप्रिय है।

➠साँची स्तूप के तोरण द्वार पर भगवान बुद्ध की शिक्षाएं तथा प्रतीक का चित्रांकन है।

➠साँची स्तूप के तोरण द्वार पर भगवान बुद्ध की दैनिक जीवन की घटनाएं भी अंकित की गई है।


स्तूप-

➠स्तूप का अर्थ ढ़ेर होता है।

➠स्तूप का पहला उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

➠स्तूप चार प्रकार के होते है। जैसे-

1. शारीरिक स्तूप (Relic Stupa)

2. पारिभोगिक स्तूप (Object Stupa)

3. उद्देशिका स्तूप (Commemorative Stupa)

4. पूर्जार्थक स्तूप (Symbolic Stupa)


1. शारीरिक स्तूप (Relic Stupa)-

➠शारीरिक स्तूपों की संख्या 8+1 है।

➠शारीरिक स्तूप में भगवान बुद्ध के अवशेषों को रखा गया है जैसे- दाँत, हड्डी आदि।

➠जिन स्तूपों को भगवान गोतम बुद्ध के अवशेषों पर बनाया गया था उन स्तूपों को शारीरिक स्तूप कहते है।


2. पारिभोगिक स्तूप (Object Stupa)-

➠पारिभोगिक स्तूपों में भगवान गोतम बुद्ध से संबंधित वस्तुएं रखी गयी है जैसे बुद्ध का भिक्षापात्र, बुद्ध के कपड़े आदि।


3. उद्देशिका स्तूप (Commemorative Stupa)-

➠उद्देशिका स्तूपों का निर्माण भगवान गोतम बुद्ध से संबंधित स्थानों या घटनाओं पर किया गया है। जैसे- जन्म, सम्बोधि, धर्मचक्र प्रवर्तन एवं निर्वाण आदि। अर्थात् भगवान गोतम बुद्ध से संबंधित स्थानों या घटनाओं पर बनाये गये स्तूपों को उद्देशिका स्तूप कहा जाता है।


4. पूर्जार्थक स्तूप (Symbolic Stupa)-

➠पूर्जार्थक स्तूप आस्था के केन्द्र के रूप में विकसित हुए थे।


कुछ महत्वपूर्ण स्तूप-

1. पिपरहवा स्तूप (उत्तर प्रदेश)

2. भरहूत स्तूप (मध्य प्रदेश)

3. धमेख स्तूप (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)

4. अमरावती स्तूप (आंध्र प्रदेश)


1. पिपरहवा स्तूप (उत्तर प्रदेश)-

➠पिपरहवा स्तूप भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के सिद्धार्थनगर जिले के पिपरहवा गाँव में स्थित है।

➠पिपरहवा स्तूप सबसे प्राचीन स्तूप है। अर्थात् पिपरहवा स्तूप प्राचीनतम स्तूप है।

➠पिपरहवा स्तूप से भगवान गोतम बुद्ध के अवशेष प्राप्त हुए है।


2. भरहुत स्तूप (मध्य प्रदेश)-

➠भरहुत स्तूप भारत के मध्य प्रदेश राज्य के सतना जिले के भरहुत गाँव में स्थित है।

➠भरहुत स्तूप दूसरा सबसे प्राचीन स्तूप है। अर्थात् भरहुत दूसरा प्राचीनतम स्तूप है।


3. धमेख स्तूप (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)-

➠धमेख स्तूप भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी जिले में वाराणसी के निकट सारनाथ में स्थित है।

➠धमेख स्तूप गुप्तकालीन स्तूप है।

➠धमेख स्तूप ईंटो से निर्मित स्तूप है।

➠धमेख स्तूप एक साधारण स्तूप है।

➠धमेख स्तूप एक मेधी (Platform) रहित स्तूप है।

➠धमेख स्तूप को धर्म चक्र प्रवर्तन स्तूप भी कहा जाता है।


4. अमरावती स्तूप (आंध्र प्रदेश)-

➠अमरावती स्तूप भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के गुंटुर जिले के अमरावती गाँव में स्थित है।

➠अमरावती स्तूप मार्बल पत्थर से निर्मित स्तूप है।

➠अमरावती स्तूप तीसरी शताब्दी ई.पू. का स्तूप है।

➠अमरावती स्तूप का निर्माण व्यापार संघ या श्रेणियों के प्रमुखों ने करवाया था।


(III). स्तम्भ (मौर्यकालीन स्तम्भ)-

(A) सारनाथ स्तम्भ (उत्तर प्रदेश)

(B) साँची स्तम्भ (साँची, मध्य प्रदेश)

(C) रामपुरवा स्तम्भ (बिहार)

(D) लौरिया नंदनगढ़ स्तम्भ (बिहार)

(E) संकिसा स्तम्भ (उत्तर प्रदेश)

(F) वैशाली स्तम्भ (बिहार)

(G) रुम्मिनदेई स्तम्भ (लुम्बिनी, नेपाल)


(A) सारनाथ स्तम्भ (उत्तर प्रदेश)-

➠सारनाथ स्तम्भ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी जिले के सारनाथ में स्थित है।

➠सारनाथ स्तम्भ पर स्थित फलक के ऊपर चार शेर बने हुए है।

➠सारनाथ स्तम्भ के फलक पर भगवान बुद्ध के प्रतीक मिलते है। जैसे-

(I) हाथी

(II) साँड

(III) घोड़ा

(IV) शेर- शेर भगवान बुद्ध का प्रसिद्धि का प्रतीक है।

➠सारनाथ स्तम्भ के फलक पर अशोक चक्र मिलता है।

➠फलक पर स्थित अशोक चक्र में 32 तीलियां है।

➠अशोक चक्र को 26 जनवरी 1950 को भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया था।

➠सारनाथ स्तम्भ अशोक स्तम्भ के रूप में लोकप्रिय है। अर्थात् सारनाथ स्तम्भ को ही अशोक स्तम्भ कहा जाता है।

➠सारनाथ स्तम्भ को वर्तमान में उत्तर प्रदेश के सारनाथ संग्रहालय में रखा गया है।


(B) साँची स्तम्भ (साँची, मध्य प्रदेश)-

➠साँची स्तम्भ सबसे प्राचीन स्तम्भ है।

➠साँची स्तम्भ से शेर की प्रतीमा प्राप्त हुई है।

➠साँची स्तम्भ भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन जिले की पंचायत साँची में स्थित है।


(C) रामपुरवा स्तम्भ (बिहार)-

➠रामपुरवा स्तम्भ भारत के बिहार राज्य के चम्पारन जिले में रामपुरवा गाँव में स्थित है।

➠रामपुरवा से दो मौर्यकालीन स्तम्भ प्राप्त हुए है। जिनमें से एक पर बैल की प्रतीमा है तथा दूसरे पर एक शेर की प्रतीमा है।


(D) लौरिया नंदनगढ़ स्तम्भ (बिहार)-

➠लौरिया नंदनगढ़ स्तम्भ के ऊपर एक शेर की प्रतीमा स्थित है।

➠लौरिया नंदनगढ़ स्तम्भ भारत के बिहार राज्य के पश्चिमी चम्पारन जिले में लौरिया नंदनगढ़ नामक नगर में स्थित है।


(E) संकिसा स्तम्भ (उत्तर प्रदेश)-

➠संकिसा स्तम्भ के ऊपर एक हाथी का प्रतीमा स्थित है।

➠संकिसा स्तम्भ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के फर्रुखाबाद जिले में संकिसा नामक स्थान पर स्थित है।


(F) वैशाली स्तम्भ (बिहार)-

➠वैशाली स्तम्भ भारत के बिहार राज्य के वैशाली जिले में वैशाली नामक स्थान पर स्थित है।

➠वैशाली स्तम्भ के ऊपर एक शेर की प्रतीमा स्थित है।


(G) रुम्मिनदेई स्तम्भ (लुम्बिनी, नेपाल)-

➠रुम्मिनदेई स्तम्भ के ऊपर एक घोड़े की प्रतीमा स्थित है।

➠रुम्मिनदेई स्तम्भ नेपाल के लुम्बिनी में स्थित है।


➠कुछ इतिहासकार अशोक के स्तम्भों को डेरियस के स्तम्भों की नकल मानते है। क्योंकि डेरियस की उपाधि भी देवनामप्रिय थी और अशोक व डेरियस के स्तम्भ पोलिस युक्त है।

➠लेकिन वास्तव में अशोक के स्तम्भ डेरियस के स्तम्भों की नकल नहीं है क्योंकि दोनों के स्तम्भों में कई असमानताएं है।

➠अशोक तथा डेरियस के स्तम्भों के मध्य असमानताएं-

1. अशोक के स्तम्भ

2. डेरियस के स्तम्भ


1. अशोक के स्तम्भ-

➠अशोक के स्तम्भ एकाश्म स्तम्भ है।

➠अशोक के स्तम्भ स्वतंत्र रूप से स्थापित है।

➠अशोक के स्तम्भ में अवांगमुखी कमल (उल्टा कमल) है।

➠अशोक के स्तम्भ लेखयुक्त है।

➠अशोक के स्तम्भ सपाट है।

➠अशोक के स्तम्भों पर पशु आकृतियां बनी हुई है।


2. डेरियस के स्तम्भ-

➠डेरियस के स्तम्भों का निर्माण अगल-अलग पत्थरों को जोड़कर किया गया है।

➠डेरियस के स्तम्भ महल के भाग या हिस्से के रूप में स्थापित है।

➠डेरियस के स्तम्भों में सीधा कमल है।

➠डेरियस के स्तम्भ लेखविहिन है।

➠डेरियस के स्तम्भ नालीदार है।

➠डेरियस के स्तम्भों पर मानव की आकृतियां बनी हुई है।


(IV) गुफा (चैत्य) या मौर्यकालीन गुफाएं-

➠अशोक ने आजीवक साधुओं के लिए तीन गुफाओं का निर्माण करवाया था। जैसे-

1. कर्ण चौपड़ गुफा या करण चौपर गुफा

2. सुदामा गुफा

3. विश्व झोपड़ी गुफा या विश्व जोपरी गुफा

➠दशरथ ने आजीवक साधुओं के लिए बराबर की पहाड़ी (बिहार) में लोमहर्ष ऋषि गुफा या लोमस ऋषि गुफा का निर्माण करवाया था।

➠दशरथ ने बिहार की नागार्जुन पहाड़ी में गोपिका गुफा का निर्माण करवाया था।


1. कर्ण चौपड़ गुफा या करण चौपर गुफा-

➠कर्ण चौपर गुफा भारत के बिहार राज्य की बराबर की पहाड़ीयों में स्थित है।

➠कर्ण चौपर गुफा का निर्माण मौर्य वंश के शासक अशोक ने करवाया था।

➠अशोक ने कर्ण चौपर गुफा का निर्माण आजीवक साधुओं के लिए करवाया था।


2. सुदामा गुफा-

➠सुदामा गुफा भारत के बिहार राज्य की बराबर की पहाड़ियों में स्थित है।

➠सुदामा गुफा का निर्माण मौर्य वंश के शासक अशोक ने करवाया था।

➠अशोक ने सुदामा गुफा का निर्माण आजीवक साधुओं के लिए करवाया था।


3. विश्व झोपड़ी गुफा या विश्व जोपरी गुफा-

➠विश्व झोपड़ी गुफा या विश्व जोपरी गुफा भारत के बिहार राज्य की बराबर की पहाड़ियों में स्थित है।

➠विश्व जोपरी गुफा का निर्माण मौर्य वंश के शासक अशोक ने करवाया था।

➠अशोक ने विश्व जोपरी गुफा का निर्माण आजीवक साधुओं के लिए करवाया था।


2. लोक कला या मौर्यकालीन लोक कला-

➠मौर्य काल में यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियां बनना आरम्भ हो गयी थी।

➠मथुरा (उत्तर प्रदेश) के पास परखम गाँव से एक यक्ष की मूर्ति मिलती है।

➠परखम गाँव से मिली यक्ष की मूर्ति को मणिभद्र कहा जाता है।

➠परखम गाँव भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिसे में स्थित है।

➠मथुरा के निकट बड़ौदा या बरोड़ा से एक यक्ष की मूर्ति मिली है।

➠पटना के पास दीदारगंज से एक यक्षिणी की मूर्ति मिलती है।

➠दीदारगंज से मिली यक्षिणी की मूर्ति को चामारगृहिणी या चंवरगृहिणी या दीदारगंज यक्षी कहा जाता है।

➠दीदारगंज भारत के बिहार राज्य की राजधानी पटना में स्थित है।

➠बुलंदी बाग से एक पहिया मिलता है।

➠बुलंदी बाग भारत के बिहार राज्य की राजधानी पटना में स्थित है।

➠धौली से पत्थर को काटकर बनाया हुआ हाथी मिलता है।

➠धौली भारत के ओडिशा राज्य की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित है।


मौर्यकालीन प्रशासन-


सम्राट-

➠मौर्य काल में राजतंत्रात्मक, निरंकुश, केंद्रीकृत तथा वंशानुगत शासन व्यवस्था थी।

➠मौर्य काल में चाणक्य का सप्तांग सिद्धांत प्रसिद्ध था। जैसे-

1. राजा

2. राज्य या क्षेत्र

3. अमात्य

4. किला या दुर्ग

5. सेना

6. कोष

7. मित्र

➠मित्र के पास उपर्युक्त 6 चीजें होनी चाहिए।

➠मौर्य काल में शासक राजत्व के दैवीय सिद्धांत में विश्वास करते थे। इसलिए मौर्य काल में शासक देवनामप्रिय की उपाधि धारण करते थे।

➠मौर्य काल में राजा की सहायता हेतु 18 मंत्री होते थे।

➠मौर्य काल में राजा की सहायता के लिए जो मंत्री होते थे उन्हें तीर्थ कहा जाता था।


उपधा परीक्षण-

➠मौर्य काल में तीर्थ या मंत्रियों के लिए परीक्षा आयोजित की जाती थी जिसे उपधा परीक्षण कहा जाता था।


मंत्रिण-

➠मौर्य काल में 3 या 4 प्रमुख मंत्रियों को मंत्रिण कहा जाता था। जैसे- पुरोहित, युवराज एवं सेनानी।


मौर्य काल के मुख्य तीर्थ (मंत्री)-

1. समाहर्ता- मौर्य काल में राजस्व अधिकारी को समाहर्ता कहा जाता था।

2. सन्निधाता- मौर्य काल में कोषाध्यक्ष को सन्निधाता कहा जाता था।

3. कर्मांतिक- मौर्य काल में कल-कारखानों के प्रमुख को कर्मांतिक कहा जाता था।

4. आंतर्वशिक- मौर्य काल में अंगरक्षक सेना के प्रमुख को आंतर्वशिक कहा जाता था।

5. आटविक- मौर्य काल में वन विभाग के प्रमुख को आटविक कहा जाता था।

6. प्रशास्ता- मौर्य काल में पत्राचार विभाग के प्रमुख को प्रशास्ता कहा जाता था।

7. दौवारिक- मौर्य काल में राजमहल की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले को दौवारिक कहा जाता था।

8. दुर्गपाल- मौर्य काल में दुर्ग के प्रमुख को दुर्गपाल कहा जाता था।

9. अंतपाल- मौर्य काल में सीमांत रक्षा प्रमुख को अंतपाल कहा जाता था।

10. प्रदेष्टा- मौर्य काल में फौजदारी मामलों के न्यायाधीश को प्रदेष्टा कहा जाता था।

11. व्यावहारिक- मौर्य काल में दिवानी मामलों के न्यायाधीश को व्यावहारिक कहा जाता था।

➠मौर्य काल में उपर्युक्त सभी तीर्थों के नियंत्रण में 26 विभाग होते थे विभाग के प्रमुख को अध्यक्ष कहा जाता था। जैसे-


मौर्य काल के महत्वपूर्ण अध्यक्ष-

1. मुद्राध्यक्ष- मौर्य काल में पासपोर्ट विभाग के प्रमुख को मुद्राध्यक्ष कहा जाता था।

2. लक्षणाध्यक्ष- मौर्य काल में मुद्रा विभाग के प्रमुख को लक्षणाध्यक्ष कहा जाता था।

3. लवणाध्यक्ष- मौर्य काल में नमक विभाग के प्रमुख को लवणाध्यक्ष कहा जाता था।

4. गणिकाध्यक्ष- मौर्य काल में वेश्यावृति विभाग के प्रमुख को गणिकाध्यक्ष कहा जाता था।

5. आखराध्यक्ष- मौर्य काल में खनिज विभाग के प्रमुख को आखराध्यक्ष कहा जाता था।

6. सुराध्यक्ष- मौर्य काल में आबकारी विभाग के प्रमुख को सुराध्यक्ष कहा जाता था।

7. सुनाध्यक्ष- मौर्य काल में बूचड़खाने के प्रमुख को सुनाध्यक्ष कहा जाता था।

8. पौत्वाध्यक्ष- मौर्य काल में नाप तौल विभाग के प्रमुख को पौत्वाध्यक्ष कहा जाता था।

9. पण्याध्यक्ष- मौर्य काल में व्यापार वाणिज्य के प्रमुख को पण्याध्यक्ष कहा जाता था।

10. कुप्याध्यक्ष- मौर्य काल में वन निरीक्षकों के प्रमुख को कुप्याध्यक्ष कहा जाता था।


मौर्य काल में प्रांतीय प्रशासन-

➠मौर्य साम्राज्य 5 प्रांतों में विभाजीत थी। जैसे-

1. उत्तर दिशा में उत्तरपथ प्रांत था उत्तरपथ प्रांत की राजधानी तक्षशिला थी।

2. दक्षिण दिशा में दक्षिणापथ प्रांत था दक्षिणापथ प्रांत की राजधानी सुवर्णगिरी थी।

3. पूर्व दिशा में कलिंगपथ प्रांत था कलिंगपंथ प्रांत की राजधानी तोसली थी।

4. पश्चिम दिशा में अवंतिपथ प्रांत था अवंतिपथ प्रांत की राजधानी उज्जैन थी।

5. मध्य में प्राच्य प्रांत था प्राच्य प्रांत की राजधानी पाटलिपुत्र थी।

➠मौर्य काल में प्रांत को चक्र कहा जाता था।


मौर्य काल में सैन्य प्रशासन-

➠इतिहासकार मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य सेना को 6 भागों में विभाजित किया गया था तथा मौर्य सेना के 6 भागों को नियंत्रिक करने के लिए 6 समितियां थी।

➠सेना के नियंत्र हेतु बनायी गई प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।

➠मौर्य काल में सेना के 6 प्रकार निम्नलिखित है।-

1. पैदल सेना

2. घुड़सवार सेना

3. हाथी सेना

4. रथ सेना

5. जल सेना

6. रसद आपूर्ति हेतु सेना


मौर्य काल में नगर प्रशासन-

➠मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य काल में नगर प्रशासन के लिए 6 समितियां थी।

➠मौर्य काल में नगर प्रशासन की प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।

➠मौर्य काल में नगर प्रशासक को एस्टिनोमोई (एस्ट्रोनोमाई) कहा जाता था।

➠मौर्य काल में राज्यमार्ग प्रशासक को अग्रोनोमोई (एग्रोनोमाई) कहा जाता था।


मौर्य काल में न्यायिक प्रशासन-

➠मौर्य काल में न्यायिक प्रशासन को दो भागों में विभाजित किया गया था। जैसे-

1. दीवानी

2. फौजदारी


1. दीवानी-

➠मौर्य काल में दीवानी मामलों के लिए बने न्यायालयों को धर्मस्थील न्यायालय कहा जाता था।

➠मौर्य काल में दीवानी मामलों के न्यायाधीश को व्यावहारिक न्यायाधीश कहा जाता था।


2. फौजदारी-

➠मौर्य काल में फौजदारी मामलों के लिए बने न्यायालयों को कंटकशोधन न्यायालय कहा जाता था।

➠मौर्य काल में फौजदारी मामलों के न्यायाधीश को प्रदेष्टा कहा जाता था।


राजुक-

➠मौर्य काल में क्षेत्रीय न्यायाधीश को राजुक कहा जाता था।


➠इतिहासकार मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य काल में अपराध बहुत कम होते थे।

➠मौर्य काल में लोग घरों के ताले नहीं लगाते थे।

➠मौर्य काल में भारत में दंड बहुत सरल होते थे।

➠मौर्य काल में केवल 3 मामलों में मृत्युदंड होता था। जैसे-

1. राजद्रोह या रस्सी कुदना या पार करना

2. कारीगर को नुकसान पहुँचाना

3. टैक्स चोरी


मौर्य काल में गुप्तचर व्यवस्था-

➠मौर्य काल में गुप्तचर विभाग के प्रमुख को महामात्य सर्प कहा जाता था।

➠मौर्य काल में गुप्तचर को गूढ़पुरुष कहा जाता था।

➠मौर्य काल में गुप्तचर या गूढ़पुरुष दो भागों में विभाजित था। जैसे-

1. संस्था- मौर्य काल में एक जगह रहकर गुप्तचरी करने वाला संस्था का भाग होता था।

2. संचार- मौर्य काल में धूम धूम कर जासूसी करने वाला संचार का भाग होता था।


मौर्य काल में सामाजिक स्थिति-

➠मौर्य काल में पितृसत्तात्मक संयुक्त परिवार थे।

➠मौर्य काल में समाज 4 भागों में विभाजित था जैसे-

1. ब्राह्मण

2. क्षत्रिय

3. वैश्य

4. शूद्र

➠मौर्य काल में वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित थी।

➠मौर्य काल में जाति व्यवस्था आरम्भ हो चुकी थी।

➠इतिहासकार मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य काल में भारतीय समाज 7 वर्गों में विभाजित था।

➠मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य काल में भारतीय अपनी जाति नहीं बदल सकते थे।

➠मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य काल में वर्णसंकर जातियों को नगरों के बाहर रहना पड़ता था।

➠मौर्य काल में वर्णसंकर जातियां जैसे- अम्बष्ठ जाति, निषाद जाति, पार्शव जाति, स्वपाक जाति, उग्र जाति आदि।

➠मौर्य काल में महिलाओं की स्थिति संतोषजनक थी।

➠चाणक्य के अर्थशास्त्र में कुलीन महिलाओं को अनिष्कासिनी कहा गया है।

➠ग्रीक इतिहासकारों के अनुसार मौर्य काल में भारतीय बिना दहेज शादी नहीं करते थे।

➠मौर्य काल में वैश्यवृति राज्य के नियंत्रण में होती थी।

➠मौर्य काल में वैश्याओं को गणिका कहा जाता था।

➠मौर्य काल में स्वतंत्र वैश्यावृति करने वाली महिलाओं को रूपाजीवा कहा जाता था।

➠मौर्य काल में पुरुष कलाकारों को रंगोपजीवी कहा जाता था।

➠मौर्य काल में महिला कलाकारों को रंगोपजीविनी कहा जाता था।

➠मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य काल में भारत में सूखे की समस्या नहीं थी।

➠शाहगोरा अभिलेख तथा महास्थान नामक अभिलेखों से मौर्या काल में अकाल राहत कार्यों की जानकारी मिलती है।

➠मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य काल में भारत में दास प्रथा का प्रचलन नहीं था।

➠चाणक्य के अर्थशास्त्र में 9 प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है।

➠अशोक ने युद्धबंदियों को दास बनाया एवं युद्धबंदियों को उत्पादन कार्य (खेती) में लगाया था।

➠मेगस्थनीज ने भगवान शिव को डायोनिसस तथा भगवान श्री कृष्ण को हेराक्लीज कहा है।

➠मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य काल में भारतीय लोग देवताओं की मूर्तियां बनाते थे और उन्हें लिखना नहीं आता था।

➠मौर्य काल में तलाक को मोक्ष कहते थे।

➠मौर्य काल में विधवा विवाह प्रचलन था लेकिन विधवा विवाह का प्रचलन कम हुआ था।

➠मौर्य काल में जो विधवा महिलाएं पुनः विवाह नहीं करती थी उन विधवा महिलाओं को छंदवासिनी कहा जाता था।


मौर्य काल में आर्थिक स्थिति-

➠मौर्य काल में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था थी।

➠मौर्य काल में उपजाऊ भूमि को अदेवमातृक भूमि कहा जाता था। अर्थात् जिस भूमि पर बिना सिंचाई के साधनों के अच्छी फसल पैदा होती थी उस भूमि को अदेवमातृक भूमि कहा जाता था।

➠सीता भूमि मौर्य काल में राजकीय भूमि थी।

➠मौर्य काल में सीता भूमि से ½ भू-राजस्व कर वसूला जाता था।

➠मौर्य काल में भू-राजस्व कर को भाग कहा जाता था।

➠मौर्य काल में ⅙ भाग या भू-राजस्व कर लगता था।

➠यूनानी इतिहासकारों के अनुसार मौर्य काल में भू-राजस्व कर ¼ था।

➠मौर्य काल में सिंचाई व्यवस्था को सेतुबंध कहा जाता था।

➠मौर्य काल में सिंचाई कर को उदकभाग या उदेवभाग कहा जाता था।

➠यूनानी इतिहासकारों के अनुसार मौर्य काल में सिंचाई कर उदकभाग ⅕ से ⅓ था।

➠मौर्य काल में बेगार प्रथा को विष्टी कहा जाता था।

➠बेगार प्रथा में बिना किसी मूल्य या मजबूरी के श्रम करवाया जाता था जिसे बेगार प्रथा कहा जाता था।

➠मौर्य काल में उद्योग धंधे विकसित अवस्था में थे।

➠मौर्य काल में मुख्य उद्योग राज्य के नियंत्रण में थे। जैसे- शराब उद्योग, नमक उद्योग, खनिज उद्योग, वन संसाधन उद्योग आदि।

➠मौर्य काल में उद्योग श्रेणी व्यवस्था में विभाजित थे।

➠मौर्य काल में घरेलू एवं विदेशी दोनों प्रकार का व्यापार होता था।

➠मौर्य काल में घरेलू वस्तु पर कर 4 प्रतिशत था।

➠मौर्य काल में विदेशी वस्तु पर कर 10 प्रतिशत था।

➠मौर्य काल में मुद्रा प्रणाली का आरम्भ हो चुका था।

➠सोने के सिक्के को मौर्य काल में सुवर्ण कहा जाता था।

➠चाँदी के सिक्के को मौर्य काल में काषार्षण, धरण तथा पण कहा जाता था।

➠ताँबे के सिक्के को मौर्य काल में भाषक तथा काकनी कहा जाता था।

➠मौर्य काल सबसे छोटा सिक्का ताँबे का सिक्का काकनी था।

➠मौर्य काल के सिक्के आहत या पंचमार्क सिक्के थे।

➠सिक्कों की गुणवत्ता का निरीक्षण करने वाले अधिकारी को मौर्य काल में रुपक कहा जाता था।

➠मौर्य काल में किसी को भी 13½ प्रतिशत कर देकर मुद्रा जारी करने का अधिकार था। अर्थात् मौर्य काल में कोई भी व्यक्ति 13½ प्रतिशत कर देकर मुद्रा जारी कर सकता था।

➠मौर्य काल में सामान्य ब्याज दर 15% थी।

➠मौर्य काल में ताम्रलिप्ति बंदरगाह प्रमुख बंदरगाह था।

➠प्रतिष्ठान मौर्य काल में प्रमुख शहर था।

➠अर्थशास्त्र में कुम्हार का उल्लेख नहीं मिलता है।


अर्थशास्त्र-

➠अर्थशास्त्र चाणक्य की पुस्तक है। अर्थात् चाणक्य के द्वारा लिखी गई पुस्तक अर्थशास्त्र है।

➠चाणक्य की पुस्तक अर्थशास्त्र राजनीति विज्ञान की सबसे प्राचीन पुस्तक है।

➠चाणक्य की पुस्तक अर्थशास्त्र का विषय राजनीति विज्ञान है।

➠अर्थशास्त्र पुस्तक गद्य एवं पद्य दोनों शैली में लिखी गई है।

➠अर्थशास्त्र पुस्तक को प्रश्न उत्तर प्रारूप में लिखा गया है।

➠अर्थशास्त्र पुस्तक में चंद्रगुप्त मौर्य तथा बिंदुसार की जानकारी मिलती है।

➠अर्थशास्त्र पुस्तक को 15 भागों में विभाजित किया गया था।


इंडिका-

➠इंडिका पुस्तक यूनानी इतिहासकार मेगस्थनीज की पुस्तक है।


इंडिका-

➠इंडिका नामक पुस्तक एरियन के द्वारा भी लिखी गई थी।


ज्योग्राफी-

➠ज्योग्राफी नामक पुस्तक टाॅलमी के द्वारा लिखी गई थी।


नेचुरल हिस्ट्री या नेचुरल हिस्टोरिका-

➠नेचुरल हिस्ट्री नामक पुस्तक पिल्नी के द्वारा लिखी गई थी।


पेरिप्लस ऑफ दी एरिथ्रियन सी (Periplus of The Erythraean Sea)-

➠पेरिप्लस ऑफ दी एरिथ्रियन सी नामक पुस्तक में मौर्य काल की भारतीय बंदगाहों एवं व्यापार की जानकारी मिलती है।

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