सहरिया जनजाति

सहरिया जनजाति राजस्थान की चौथी सबसे बड़ी जनजाति मानी जाती है। कतिपय मानवशास्त्री के अनुसार सहरिया शब्द की उत्पत्ती फारसी भाषा के सहर शब्द से हुई है सहर शब्द का शाब्दिक अर्थ जंगल होता है।

फाग- सहरिया जनजाति के लोग होली के अवसर पर घर-घर जाकर नृत्य करते है और गीत गाते है जिसे फाग कहा जाता है।

ब्रज भाषा- सहरिया जनजाति के लोग होली के अवसर पर प्रमुख रूप से ब्रज भाषा  के शब्दों का प्रयोग करते है।

सहराना- सहरिया लोगों की बस्ती को सहराना के नाम से जाना जाता है।
फला- सहरिया जनजाति के गाँव के सबसे छोटी इकाई को फला कहा जाता है।
सहरोली- सहरिया जनजाति के गाँवों को सहरोली के नाम से जाना जाता है।

हथाई या बंगला- सहरिया जनजाति की बस्ती के बीच एक छतरीनुमा चौकोर या गोल झोपड़ी या ढालिया बनाया जाता जिसे बंगला या हथाई कहा जाता है।

टापरी- सहरिया जनजाति के घरों को टापरी कहते है। सहरिया जनजाति के घर मुख्यतः  मिट्टी, पत्थर, लकड़ी, घासफूस तथा बाँस के बने होते है।

कुसिला- सहरिया जनजाति में अनाज तथा घरेलू सामान रखने के लिए बनी छोटी कोठी को कुसिला कहते है। सहरिया जनजाति के लोग मिट्टी तथा गोबर से कोठी का निर्माण करते है।

भडेर- सहरिया जनजाति में आटा रखने की कोठी को भडेर कहते है।

गोपना (कोरुआ या टोपा)- सहरिया जनजाति के द्वारा वनों में निवास करने के लिए पेड़ों या बल्लियों पर बनी मचाननुमा झोपड़ी को गोपना या कोरुआ या टोपा कहा जाता है।

कोतवाल- सहरिया जनजाति के मुखिया को कोतवाल कहा जाता है।

पंचायत- सहरिया जनजाति में पंचायत को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया है जैसे- चौरासिया पंचायत, पंचताई पंचायत तथा एकदसिया पंचायत होती है। तीनों पंचायतों में से चौरासिया पंचायत को सबसे बड़ी पंचायत माना जाता है। चौरासिया पंचायत की बैठक सीताबाड़ी (बारा) नामक स्थान पर वाल्मिकी मंदिर में की जाती है।

दहेज प्रथा- सहरिया जनजाति में दहेज प्रथा का प्रचलन नहीं माना जाता है।

नाता प्रथा- सहरिया जनजाति में यदि कोई विवाहित स्त्री अपनी इच्छा से किसी अन्य पुरुष से नाता कर सकती है परन्तु विवाहित से नाता करने के मामले में नया पति पूर्व पति को झगड़ा राशि अदा करता है जिसे नाता प्रथा कहा जाता है।

विधवा विवाह- सहरिया जनजाति में विधवा विवाह का प्रचलन माना जाता है। सहरिया जनजाति में विधवा स्त्री को सामान्यतः अपने देवर से विवाह कर सकती है लेकीन यदि देवर विवाह के लिए योग नहीं हुआ है तो समुदाय के अन्य किसी पुरुष से भी विवाह कर सकती है।

कोड़िया देवी- सहरिया जनजाति की कुल देवी कोड़िया देवी है।
तेजाजी- सहरिया जनजाति के लोकप्रिय देवता तेजाजी है।
भैरव- भैरव को भी सहरिया जनजाति को महत्वपूर्ण लोकदेवता माना जाता है।

लट्ठमार होली- सहरिया जनजाति में लट्ठमार होली का प्रचलन माना जाता है।

लेंगी- सहरिया जनजाति में मकर संक्रांति पर लकड़ी के डंडों से खेला जाने वाला खेल लेंगी कहलाता है।

हीड़ या हिड़ा- सहरिया जनजाति में दीपावली के अवसर पर हीड़ या हिड़ा नामक गीत गाया जाता है।

लहँगी एवं आल्हा- सहरिया जनजाति में वर्षा ऋतु में लहँगी एवं आल्हा नामक गीत गाया जाता है।

आदिम जनजाति- भारत सरकार द्वारा राजस्थान की सहरिया जनजाति को आदिम जनजाति की सूची में सम्मिलित किया गया है।

धारी संस्कार- सहरिया जनजाति में व्यक्ति की मृत्यु के तीसरे दिन मृतक की अस्थियाँ एवं राख एकत्रित कर रात के समय साफ आंगन में बिछाकर ढक देते है। यह माना जाता है की इस राख पर जिस भी आकृति के पदचिन्ह बनते है मृतक उसी योनी में पुनर्जन्म लेता है। राख में आकृति देखने के बाद अस्थियों व राख को एकत्रित कर सीताबाड़ी में स्थित बाणगंगा या कपिलधारा में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसी परंपरा को धारी संस्कार कहा जाता है।

सीताबाड़ी का मेला (बारा जिला, राजस्थान)- सीताबाड़ी का मेला राजस्थान राज्य के बारा जिले की सीताबाड़ी नामक स्थान पर भरता है। सीताबाड़ी का मेला सहरिया जनजाति का कुंभ माना जाता है। सीताबाड़ी का मेला बैसाख अमावस्या के दिन भरत है।

वाल्मिकी आश्रम तथा वाल्मिकी मंदिर- वाल्मिकी आश्रम तथा वाल्मिकी मंदिर राजस्थान के बारा जिले की सीताबाड़ी नामक स्थान पर स्थित है। वाल्मिकी आश्रम तथा वाल्मिकी मंदिर को सहरिया जनजाति का सबसे बड़ा तीर्थस्थल माना जाता है। सहरिया जनजाति के लोग वाल्मिकी को अपना आदिगरु मानते है।

सहरिया जनजाति की वेशभूषा-
1. पुरुषों की वेशभूषा- सहरिया जनजाति के पुरुष अंगरखी या सलुका, घुटनों तक धोती या पंछा, कुर्ता, कमीज, साफा या खपटा, कंधे पर तौलिया, कानों में बालियाँ, गले में ताबीज और चेन तथा हाथों की कलाई में कड़ा पहनते है।

2. स्त्री की वेशभूषा- सहरिया जनजाति की स्त्रियां साड़ी या लूगड़ा, कब्जा (सलूका), घागरा, विवाहित महिलाएं रेजा वस्त्र पहनती है। माथे पर रखड़ी (बोर) तथा गुटीजेला, नाक में लोंग, कानों में झेला (कर्णफूल), गले में खुगाली, मूंगो का हार, कुड़ला, हाथों में चूड़िया (मंगली), हथेली के पीछे हथफूल, पावों के कड़ा, नेवरिया, तोड़ा, पावों की अंगुली में बिछिया या गारिया पहनती है विधवा स्त्री के द्वारा बिधिया नहीं पहना जाता है।

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