सांभर या अजमेर का चौहान वंश

सांभर या अजमेर का इतिहास-


सांभार-

➠सांभर में चौहान वंश का शासन था।


सांभर या अजमेर के चौहान वंश के प्रमुख राजा-

1. वासुदेव

2. गूवक प्रथम

3. चन्दनराज

4. वाक्पतिराज

5. विग्रहराज द्वितीय

6. गोविन्द तृतीय

7. अजयराज

8. अर्णोराज (आनाजी)

9. विग्रहराज चतुर्थ

10. अपरगांग्य

11. पृथ्वीराज द्वितीय

12. सोमेश्वर

13. पृथ्वीराज तृतीय (पृथ्वीराज चौहान)

14. गोविंदराज

15. हरिराज


1. वासुदेव-

➠वासुदेव सांभर में चौहान वंश का संस्थापक था।

➠राजशेखर की पुस्तक प्रबंधकोष के अनुसार वासुदेव ने 551 ई. में चौहान राज्य की स्थापना की थी।

➠बिजौलिया अभिलेख के अनुसार वासुदेव ने सांभर झील (जयपुर) का निर्माण करवाया था।


2. गूवक प्रथम-

➠चौहान पहले प्रतिहारों के सामन्त थे।

➠प्रतिहार राजा नागभट्ट- द्वितीय ने गूवक प्रथम को वीर की उपाधी दी थी।

➠कालांतर में गूवक प्रथम ने प्रतिहारों की अधिनता स्वीकार करने से मना कर दिया था।

➠गूवक प्रथम पहला स्वतंत्र चौहान राजा था।

➠प्रतिहारों की राजधानी भीनमाल (जालौर) थी।


3. चन्दनराज-

➠चन्दनराज की रानी आत्मप्रभा (रूद्राणी) थी।

➠रानी आत्मप्रभा पुष्कर झील (अजमेर) में 1000 दीपक जलाकर शिव भगवान की पूजा करती थी।

➠रानी आत्मप्रभा योग क्रिया में निपुण थी।

➠रानी आत्मप्रभा को रूद्राणी नाम से जाना जाता था।


4. वाक्पतिराज-

➠वाक्पतिराज 108 युद्धों का विजेता था।

➠वाक्पतिराज के बेटे लक्ष्मणराज ने नाडोल में चौहान राज्य की स्थापना की थी।


5. विग्रहराज-द्वितीय-

➠विग्रहराज द्वितीय ने गुजरात के चालुक्य राजा मुलराज प्रथम को हराया था।

➠विग्रहराज द्वितीय ने भरूच (गुजरात) में अपनी कुल देवी आशापुरा माता का मंदिर बनवाया था।

➠चौहान वंश की कुल देवी आशापुरा माता है।


6. गोविन्द तृतीय-

➠मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार गोविन्द तृतीय ने गजनी के राजा को मारवाड़ पार नहीं करने दिया था।

➠पृथ्वीराज विजय (पुस्तक) के अनुसार गोविन्द तृतीय ने वैरीघट्ट की उपाधि दी गई थी।


7. अजयराज-

➠1113 ई. में अजयराज ने अजमेर की स्थापना की तथा यहाँ पर किले का निर्माण करवाया था।

➠अजमेर का मूल नाम अजयमेरू था।

➠अजयराज ने गर्जन मातंगो (गजनी की तरफ से किया गया आक्रमण) को हराया था।

➠अजयराज ने पार्श्वनाथ मंदिर में सुवर्ण कलश (सोने का कलश) भेंट किया था।

➠अजयराज ने दिगम्बर तथा श्वेताम्बर के बीच शास्त्रार्थ की अध्यक्षता की थी।

➠अजयराज ने अपनी रानी सोमलदेवी (सोमलेखा) के नाम से चाँदी व ताँबे के सिक्के चलाये थे।

➠अजयराज ने अपने बेटे अर्णोराज को राजा बनाया तथा अजयराज सन्नयासी बन गया था।

➠अपने अंतिम समय मे सन्नयासी बनने वाला एकमात्र चौहान राजा अजयराज था।


8. अर्णोराज (आनाजी)-

➠अर्णोराज ने तुर्को को हराया तथा युद्ध स्थल पर आनासागर झील (अजमेर) का निर्माण करवाया था।

➠अर्णोराज ने मालवा (मध्य प्रेदश) के राजा नरवर्मन को हराया था।

➠अर्णोराज ने गुजरात के राजा जयसिंह सिद्धराज को हराया था।

➠जयसंहि सिद्धराज ने अपनी पुत्री राजकुमारी कांचन देवी (गुजरात) का विवाह अर्णोराज के साथ किया था।

➠गुजरात के कुमारपाल चालुक्य ने अर्णोराज को हराया था।

➠अर्णोराज ने पुष्कर (अजमेर) में वराह मंदिर का निर्माण करवाया था।

➠वराह मंदिर विष्णु भगवान का मंदिर था।

➠अर्णोराज ने खरतरगच्छ समुदाय (जैन धर्म) को भूमी दान दिया था।

➠अर्णोराज के दरबार में रहने वाले जैन विद्वान- (1) देव बोध (2) धर्मघोष

➠अर्णोराज की हत्या उसके बेटे जग्गदेव के द्वारा कर दी गई थी।


9. विग्रहराज चतुर्थ (1152-1163)-

➠इतिहासकार दशरथ शर्मा के अनुसार विग्रहराज- चतुर्थ का शासन काल अजमेर के चौहानों का स्वर्ण काल था।

➠विग्रहराज- चतुर्थ ने गजनी के राजा खुसरोशाह को हराया था।

➠बिजोलिया अभिलेख के अनुसार विग्रहराज- चतुर्थ ने दिल्ली (ढिल्लिका) पर विजय प्राप्त की तथा अब दिल्ली के तोमर चौहनों के सामन्त बन गये थे।

➠दिल्ली को पहले ढिल्लिका नाम से जाना जाता था।

➠विग्रहराज चतुर्थ ने दिल्ली शिवालिक स्तम्भ लेख लगवाया था।

➠दिल्ली शिवालिक स्तम्भ अशोक के दिल्ली टोपरा लेख के ठिक नीचे लिखा गया है।

➠विग्रहराज चतुर्थ ने अजमेर में सरस्वती कंठाभरण नामक संस्कृत पाठशाला की स्थापना करवाई थी।

➠कालांतर में कुतुबद्दीन ऐबक ने सरस्वती कंठाभरण नामक संस्कृत पाठशाला को तोड़ दिया तथा इसके स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया था तथा इसी मस्जिद को अढ़ाई दिन का झोंपड़ा कहा जाता है।

➠इसी मस्जिद के पास पीर पंजाबशाह का 2½ दिन (ढाई दिन) का उर्स (मेला) भरता है।

➠धर्मघोष सूरि के कहने पर विग्रहराज चतुर्थ ने हर महीने की एकादशी के दिन पशु हत्या पर रोक लगा दी थी।

➠विग्रहराज चतुर्थ ने हरकेली नामक पुस्तक की रचना की थी।

➠विग्रहराज चतुर्थ के द्वारा रचित हरकेली नामक पुस्तक लेखक भारवि की किरातार्जुनीयम् नामक पुस्तक पर आधारीत है।

➠विग्रहराज चतुर्थ ने बीसलपुर नगर की स्थापना की थी।

➠विग्रहराज चतुर्थ ने बीसलपुर नगर में तालाब तथा शिव मंदिर का निर्माण करवाया था।

विग्रहराज चतुर्थ का दरबारी विद्वान सोमदेव था।

➠सोमदेव के द्वारा ललित विग्रहराज नामक पुस्तक लिखी गई थी।

➠सोमदेव की ललित विग्रहराज पुस्तक में विग्रहराज चतुर्थ तथा देसल देवी की प्रेम कहानी का वर्णन किया गया है।

➠ललित विग्रहराज पुस्तक के अनुसार विग्रहराज चतुर्थ ने गजनी के राजा खुसरोशाह को हराया था।


विग्रहराज चतुर्थ की उपाधियां-

1. बीसलदेव

2. कवि बन्धु

➠पृथ्वीराज विजय (पुस्तक) के अनुसार विग्रहराज चतुर्थ को कवि बन्धु की उपाधि दी गई थी।


➠नरपति नाल्ह ने बीसलदेव रासौ नामक पुस्तक लिखी थी।

➠बीसलदेव रासौ नामक पुस्तक गौडवाडी भाषा में लिखी गई है।

➠गौडवाडी बोली मारवाड़ी बोली की उपबोली है।

➠गौडवाडी बोली बाली (पाली) से आहोर (जालौर) की बीच बोली जाती है।


10. अपरगांग्य-

➠अपरगांग्य विग्रहराज चतुर्थ का बेटा था।

➠अपरगांग्य को जग्गदेव के बेटे पृथ्वीराज द्वितीय ने राजा के पद से हटा दिया था तथा पृथ्वीराज द्वितीय राजा बन गया था।


11. पृथ्वीराज द्वितीय-

➠1167 ई. के हाँसी (हरियाण) अभिलेख के अनुसार पृथ्वीराज द्वितीय ने हाँसी (हरियाण) में एक किले का निर्माण करवाया तथा वहाँ पर अपने मामा गुहिल किल्हण को नियुक्त कर दिया था।

➠1168 ई. के रूठी रानी मंदिर (शिव मंदिर) के धोड़ अभिलेख (भीलवाड़ा) के अनुसार पृथ्वीराज द्वितीय ने अपना राज्य बाहुबल से प्राप्त किया था।

➠रूठी रानी का मंदिर (शिव मंदिर) भीलवाड़ा में स्थित है।

➠भीलवाड़ा के धोड़ अभिलेख में पृथ्वीराज द्वितीय की एक रानी सुहाव देवी का नाम मिलता है।

➠रूठी रानी का ही वास्तविक नाम सुहाव देवी था।

➠पृथ्वीराज द्वितीय ने मेनाल (भीलवाड़ा) में सुहेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था।

➠सुहेश्वर मंदिर भगवान शिव का मंदिर है जो की भीलवाड़ा में स्थित है।


12. सोमेश्वर-

➠सोमेश्वर का बचपन गुजरात में बीता था।

➠सोमेश्वर ने कोंकण के राजा मल्लिकार्जुन को हराया था।

➠कोंकण का राजा मल्लिकार्जुन गुजरात के राजा कुमारपाल चालुक्य का शत्रु था।

➠सोमेश्वर का विवाह चेदि (मध्य प्रदेश) के राजा अचलराज कलचूरी की पुत्री राजकुमारी कर्पूरी देवी के साथ हुआ था।

➠सोमेश्वर ने अजमेर में अपनी तथा अपने पिता अर्णोराज की मूर्तियां लगवायी थी।

➠सोमेश्वर ने अजमेर में वैद्यनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था।

➠वैद्यनाथ मंदिर में भगवान ब्रह्मा, विष्णु व महेश की मूर्तियां लगी हुई है।

➠सोमेश्वर के शासन काल में बिजौलिया अभिलेख (1170 ई.) लगवाया गया था।

➠बिजौलिया अभिलेख के अनुसार सोमेश्वर ने पार्श्वनाथ मंदिर (जैन मंदिर) को रेवणा नामक गाँव दान मे दिया था।

➠बिजौलिया अभिलेख में सोमेश्वर को प्रताप लंकेश्वर नामक उपाधि दी गई है।


बिजौलिया अभिलेख (1170 ई.)- भीलवाड़ा

➠बिजौलिया अभिलेख दिगम्बर जैन लोलाक के द्वारा पार्श्वनाथ मंदिर में लगवाया गया था।

➠बिजौलिया अभिलेख की रचना गुणभद्र के द्वारा की गई थी।

➠बिजौलिया अभिलेख केशव के द्वारा लिखा गया था।

➠बिजौलिया अभिलेख गोविंद के द्वारा उत्कीर्ण करवाया गया था।

➠बिजौलिया अभिलेख प्रशासनिक विभाजन की जानकारी देता है जैसे- (देश > पत्तन > पुर > पल्लि > ग्राम)


बिजौलिया अभिलेख के अनुसार-

1. चौहान वत्स गौत्रीय ब्राह्मण है।

2. वासुदेव ने सांभर झील का निर्माण करवाया था।

3. विग्रहराज चतुर्थ ने दिल्ली पर विजय प्राप्त की थी।

4. सोमेश्वर ने पार्श्वनाथ मंदिर को रेवणा नामक गाँव दान में दिया था।

5. शैव तथा जैन तीर्थों की जानकारी मिलती है जैसे-

➠विजयावल्ली (बिजौलिया)

➠उत्तमाद्रि (ऊपरमाल)

➠मंडलकर (मांडलगढ़)

➠नागहृद (नागदा)

➠शाकम्भरी (सांभर)

➠अहिच्छत्रपुर (नागौर)

➠नड्डुल (नाडौल)

➠जाबालिपुर (जालौर)

➠श्रीमाल (भीनमाल)


13. पृथ्वीराज तृतीय (पृथ्वीराज चौहान) (1177-1192)-

➠पृथ्वीराज तृतीय को ही पृथ्वीराज चौहान कहा जाता है।

➠पृथ्वीराज चौहान के पिता का नाम सोमेश्वर था।

➠पृथ्वीराज चौहान की माता का नाम कर्पूरी देवी था।

➠पृथ्वीराज चौहान 11 वर्ष की अल्प आयु में ही राजा बन गया था।

➠पृथ्वीराज चौहान की संरक्षिका उसकी माता कर्पूरी देवी थी।

➠पृथ्वीराज चौहान ने अपने चचेरे भाईयों (नागार्जुन तथा अपरगांग्य) के विद्रोह को दबाया था।

➠नागार्जुन ने गुरुग्राम (हरियाणा) को अपना मुख्य केन्द्र बनाया था।

➠1182 ई. में मथुरा, अलवर तथा भरतपुर क्षेत्रों में पृथ्वीराज चौहान ने भंडानक जनजाति के विद्रोह को दबाया था। इस बात की जानकारी जिनपति सूरि (जैन) की पुस्तको से मिलती है।


पृथ्वीराज चौहान की उपाधियां-

1. राय पिथौरा

2. दलपुंगल


महोबा का युद्ध (1182 ई.)-

➠महोबा का युद्ध 1182 ई. में पृथ्वीराज चौहान तथा महोबा के राजा परमार्दिदेव चन्देल की बीच हुआ था।

➠महोबा के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की जीत होती है तथा परमार्दिदेव चन्देल हार जाता है।

➠पृथ्वीराज चौहान ने पंजवनराय को महोबा का प्रशासक बना दिया था।

➠महोबा के युद्ध में परमार्दिदेव चन्देल के सैनापति आल्हा तथा उदल थे।


महोबा युद्ध का कारण-

1. महोबा के राजा परमार्दिदेव चन्देल ने पृथ्वीराज चौहान के घायल सैनिकों को मरवा दिया था।


नागौर का युद्ध (1184 ई.)-

➠नागौर का युद्ध 1184 ई. में पृथ्वीराज चौहान तथा गुजरात के राजा भीम द्वितीय चालुक्य के मध्य होता है।

➠जगदेव प्रतिहार ने पृथ्वीराज चौहान तथा भीम द्वितीय चालुक्य के बीच संधि करवा दी थी।


नागौर युद्ध के कारण-

1. पृथ्वीराज चौहान तथा भीम द्वितीय चालुक्य दोनों अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहते थे।

2. चौहानों तथा चालुक्यों बीच लम्बे समय से दुश्मनी चली आ रही थी।

3. पृथ्वीराज चौहान तथा भीम द्वितीय चालुक्य दोनों आबू (सिरोही) की परमार वंश की राजकुमारी इच्छिनी देवी से विवाह करना चाहते थे लेकिन पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी इच्छिनी देवी से विवाह कर लिया था।


चौहान- गहडवाल विवाद-

➠पृथ्वीराज चौहान तथा कन्नौज (उत्तर प्रदेश) के राजा जयचन्द के मध्य विवाद था जिसे चौहान गहडवाल विवाद नाम दिया था।


चौहान- गहडवाल विवाद के कारण-

1. दिल्ली का उतराधिकारी बनने हेतु पृथ्वीराज चौहान तथा जयचन्द के मध्य तनावपूर्ण संबंध थे।

2. जयचन्द पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ परमार्दिदेव चन्देल की सहायता कर रहा था।

3. पृथ्वीराज चौहान ने जयचन्द की बेटी संयोगिता का अपहरण कर उससे विवाह कर लिया था।


➠दशरथ शर्मा ने पृथ्वीराज चौहान तथा संयोगिता की प्रेम कहानी को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार किया है।

➠दशरथ शर्मा की पुस्तक "The early Chauhan dynasty" में पृथ्वीराज चौहान तथा संयोगिता की प्रेम कहानी का वर्णन मिलता है।


तराईन का प्रथम युद्ध (1191 ई.)-

➠तराईन का प्रथम युद्ध पृथ्वीराज चौहान तथा गजनी के शासक मोहम्मद गौरी के बीच हुआ था।

➠तराईन का प्रथम युद्ध 1191 ई. में हरियाण की तराईन नामक जगह पर लड़ा गया था।

➠तराईन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की जीत हुई थी तथा मोहम्मद गौरी हार गया था।

➠दिल्ली के गोविंदराज तोमर ने मोहम्मद गौरी को घायल कर दिया था।

➠गोविंदराज तोमर पृथ्वीराज चौहान का सैनापति था।


तराईन के प्रथम युद्ध के कारण-

1. मोहम्मद गौरी अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था।

2. गजनी के राजाओं तथा चौहानों के बीच लम्बे समय से दुश्मनी चली आ रही थी।

3. तात्कालिक कारण- मोहम्मद गौरी ने तबर हिन्द (बठिंडा) पर अधिकार कर लिया था।


➠तबर हिन्द वर्तमान में बठिंडा या भटिंडा को कहता है।

➠बठिंडा भारत के पंजाब राज्य के बठिंडा जिले में स्थित एक शहर है।


तराईन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.)-

➠तराईन का दुसरा युद्ध पृथ्वीराज चौहान तथा गजनी के राजा मोहम्मद गौरी के बीच हुआ था।

➠तराईन के दुसरे युद्ध में मोहम्मद गौरी की जीत हुई तथा पृथ्वीराज चौहान हार गया था।

➠पृथ्वीराज चौहान को सिरसा (हरियाणा) के पास सरस्वती नामक स्थान से गिरफ्तार किया गया तथा पृथ्वीराज चौहान की हत्या कर दी गई थी।

➠इतिहासकार हसन निजामी के अनुसार पृथ्वीराज चौहान ने कुछ दिनों तक मोहम्मद गौरी के अधिन शासन किया था इस बात का वर्णन हसन निजामी की पुस्तक ताज-उल-मासिर में मिलती है।


तराईन के दुसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के हार के कारण-

1. पृथ्वीराज चौहान के अपने पड़ोसी राज्यों के साथ मतभेद थे अतः किसी भी राजा ने मोहम्मद गौरी के खिलाफ पृथ्वीराज चौहान की सहायता नहीं की थी।

2. तराईन के दुसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की सेना मोहम्मद गौरी की सेना की तुलना में कम थी क्योंकि पृथ्वीराज चौहान के सेनापति अन्य सीमाओं पर व्यस्थ थे।

3. तराईन के पहले युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को युद्ध की तैयारी का प्रयाप्त समय दे दिया था।

4. मोहम्मद गौरी एक अच्छा सेनापति था तथा मोहम्मद गौरी ने अपनी कूटनीति से पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया था।

5. तुर्को ने घोड़ों का प्रयोग किया था जबकि राजपूतों ने हाथियों का प्रयोग किया था।

6. तुर्को ने राजपूतों की अपेक्षा हल्के हथियारों का प्रयोग किया था।


तराईन के दुसरे युद्ध के राजनीतिक प्रभाव (परिणाम या महत्व)-

1. पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद मोहम्मद गौरी के उत्तराधिकारियों के लिए भारत में राज करना आसान हो गया था।

2. राजपूतों की उभरती हुई राजनीतिक महत्वाकांक्षा समाप्त हो गई थी तथा पृथ्वीराज चौहान के बाद कोई भी राजपूत या हिन्दू राजा दुबारा दिल्ली पर अधिकार नहीं कर पाया था।

3. भारत में विदेशी शासन का सिलसिला प्रारम्भ हुआ जो की 1947 तक चलता रहा था।


तराईन के दुसरे युद्ध के सांस्कृतिक प्रभाव (परिणाम या महत्व)-

➠तुर्क शासन की स्थापना के कारण भारतीय कला एवं संस्कृति पर सकारात्मक तथा नकारात्मक प्रभाव दिखायी दिये। जैसे-


1. सकारात्मक प्रभाव-

(अ) भारत में इंडो इस्लामिक नामक एक साझी संस्कृति का उदय हुआ जिसके प्रभाव स्थापत्य कला, साहित्य कला, संगीत कला तथा चित्रकला पर देखे गये।

(ब) भारत में सूफी तथा भक्ति आंदोलन प्रारम्भ हो गये थे।


2. नकारात्मक प्रभाव-

(अ) तर्को ने हिन्दू मंदिरों तथा बौद्ध मठों को तोड़ा जिससे भारतीय संस्कृति का नुकसान हुआ।

(ब) 1200 ई. के बाद बौद्ध संस्कृति भारत से लगभग समाप्त हो गयी थी।

(स) तुर्क आक्रमणकारियों ने विद्या केंद्रों को नष्ट किया जिससे शिक्षा का पतन हुआ।


पृथ्वीराज चौहान की सांस्कृतिक उपलब्धियां-

➠पृथ्वीराज चौहान ने कला एवं संस्कृति विभाग की स्थापना की तथा इस विभाग का मंत्री पद्मनाभ को बनाया था।

➠पृथ्वीराज चौहान ने दिल्ली के समीप पिथौरागढ़ किले का निर्माण करवाया था।


पृथ्वीराज चौहान के दरबारी विद्वान-

1. चन्दबरदाई (चन्दबरदाई की पुस्तक पृथ्वीराज रासौ)

2. जयानक (जयानक की पुस्तक का नाम पृथ्वीराज विजय)

3. वागीश्वर जनार्दन

4. विद्यापति गौड

5. विश्वरूप

6. आशाधर


पृथ्वीराज चौहान का मूल्यांकन-

➠पृथ्वीराज चौहान पर अपरिपक्व सेनापति तथा अदूरदर्शी राजा होने का अरोप लगाया जाता है। लेकिन यह आरोप सही नहीं है क्योंकि तराईन के दुसरे युद्ध से पहले पृथ्वीराज चौहान को किसी भी युद्ध में हार का सामना नहीं करना पड़ा था अतः पृथ्वीराज चौहान को अपरिपक्व सेनापति नहीं कहा जा सकता है।

➠दुश्मन (मोहम्मद गौरी) की भागती हुई सेना पर पृथ्वीराज चौहान के द्वारा आक्रमण नहीं करना तथा माफी मांगने पर दुश्मन (मोहम्मद गौरी) को छोड़ देना उस समय की भारतीय संस्कृति के आदर्श थे तथा पृथ्वीराज चौहान भी इन्ही आदर्शों का पालन कर रहा था।

हालाकी पृथ्वीराज चौहान की हार ने भारत की गुलामी का मार्ग प्रशस्त कर दिया था लेकिन फिर भी मध्यकालीन भारत के इतिहास में पृथ्वीराज चौहान के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।


पृथ्वीराज चौहान के प्रमुख मंत्री-

1. कदम्बवास

2. भुवनमल्ल

3. स्कन्द

4. वामन

5. सोढ


13. गोविंदराज-

➠गोविंदराज ने तुर्को की अधिनता स्वीकार कर ली थी तथा अजमेर का राजा बना।

➠गोविंदराज के चाचा हरिराज ने गोविंदराज को राजा के पद से हटा दिया था तथा हरिराज अजमेर का राजा बन गया था।

➠राजा के पद से हटाने के बाद गोविंदराज रणथम्भौर चला गया था।


14. हरिराज-

➠हरिराज ने अपने सेनापति चतरराज को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए भेजा था लेकिन चतरराज को हार का सामना करना पड़ा था।

➠कुतुबुद्दीन ऐबक (दिल्ली) ने हरिराज (अजमेर) पर आक्रमण किया तथा कुतुबुद्दीन ऐबक ने हरिराज को हरा दिया था।

➠युद्ध में हारने के बाद हरिराज ने आत्महत्या कर ली थी। अतः अब अजमेर पर तुर्कों का राज हो गया था।


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