गरीबी

गरीबी (Poverty)


गरीबी (Poverty)-

➠सामान्यतः गरीबी का अर्थ है एक ऐसी स्थिति जब व्यक्ति अपनी बुनियादी आवश्यकताओं या जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रयाप्त साधन नहीं जुटा पाता है ऐसी स्थिति को गरीबी कहा जाता है।

➠गरीबी के दो प्रकार होते है जैसे-

1. सापेक्ष गरीबी (Relative Poverty)

2. निरपेक्ष गरीबी (Absolute Poverty)


1. सापेक्ष गरीबी (Relative Poverty)-

➠सापेक्ष गरीबी में विभिन्न लोगों की आय के बीच तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।

➠सापेक्ष गरीबी में आय की असमानता की गणना की जाती है।

➠सापेक्ष गरीबी में आय की असमानता की गणना करने के लिए लाॅरेंज वक्र का प्रयोग किया जाता है। अर्थात् सापेक्ष गरीबी में आय की असमानता की गणना करने के लिए लाॅरेंज वक्र बनाया जाता है।

➠लाॅरेंज वक्र जनसंख्या के बीच आय के वितरण को दर्शाता है।

➠लाॅरेंज वक्र में 45° कोण (45 डिग्री कोण) पर खींची गई रेखा सापेक्ष गरीबी में आय की समानता की रेखा है।

➠लाॅरेंज वक्र में 45° कोण (45 डिग्री कोण) पर खींची गई रेखा को आदर्श रेखा भी कहा जाता है।

➠यदि किसी देश का लाॅरेंज वक्र आदर्श रेखा (45° रेखा) के निकट है तब इसका अर्थ है की उस देश में असमानता कम है।

➠यदि किसी देश का लाॅरेंज वक्र आदर्श रेखा (45° रेखा) से दूर है तब इसका अर्थ है की उस देश में असमानता अधिक है।


गिनी गुणांक (Gini Coefficient)-

➠गिनी गुणांक लाॅरेंज वक्र का गणितीय रूप है।

➠गिनी गुणांक का मूल्य 0 से 1 के बीच होता है जहाँ 0 का अर्थ है पूर्ण समानता तथा 1 का अर्थ है पूर्ण असमानता


2. निरपेक्ष गरीबी (Absolute Poverty)-

➠निरपेक्ष गरीबी के तहत यह देखा जाता है की व्यक्ति बुनियादी आवश्यकताओं या जरूरतों को पूरा कर पा रहा है या नहीं।

➠भारत में गरीबी की गणना व्यक्ति के आधार पर नहीं की जाती है।

➠भारत में गरीबी की गणना परिवार के आधार पर की जाती है।

➠भारत में गरीबी की गणना के दौरान एक परिवार में 5 सदस्य माने जाते है।

➠निरपेक्ष गरीबी में बुनियादी आवश्यकताओं या जरूरतों के आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया जाता है।

➠भारत में गरीबी रेखा का निर्धारण नीति आयोग के द्वारा किया जाता है।

➠भारत में नीति आयोग से पहले गरीबी रेखा का निर्धारण योजना आयोग के द्वारा किया जाता था।

➠निरपेक्ष गरीबी में गरीबी की गणना आय के आधार पर ना करके उपभोग पर किये गये व्यय (खर्च) के आधार पर की जाती है।


BPL परिवार (Below Poverty Line- BPL)-

➠जो परिवार गरीबी रेखा (Poverty LIne- PL) से कम व्यय (खर्च) उपभोग पर कर पाते है उन्हें BPL परिवार कहा जाता है।

➠BPL परिवारों की पहचान NSO के द्वारा की जाती है।

➠NSO के द्वारा BPL परिवारों की पहचान करने को सिर गिनने की विधि कहा जाता है।

➠BPL परिवारों की पहचान करने के लिए NSO के द्वारा परिवारों का उपभोग पर किया गया व्यय (खर्च) का सर्वे करवाया जाता है।


APL परिवार (Above Poverty Line)-

➠जो परिवार गरीबी रेखा (Poverty LIne- PL) से अधिक व्यय या खर्च उपभोग पर कर पाते है उन्हें APL परिवार कहा जाता है।


वैश्विक संस्थाओं के द्वारा गरीबी की गणना-

➠संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations Organisation- UNO) के द्वारा गरीबी की गणना के लिए बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index) जारी किया जाता है।

➠विश्व बैंक (World Bank) के अनुसार गरीबी रेखा 1.9 डाॅलर प्रति व्यक्ति प्रति दिन है। ($ 1.9 /Person/Day)

➠एशियाई विकास बैंक (Asian Development Bank- ADB)  के अनुसार गरीबी रेखा 1.51 डाॅलर प्रति व्यक्ति प्रति दिन है। ($ 1.51/Person/Day)


NSSO-

➠भारत में बेरोजगारी और गरीबी के अनुमान NSSO के परिवारों के उपभोग व्यय के सर्वे पर आधारित है।

➠NSSO- राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (National Sample Survey Office- NSSO)

➠CSO- केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (Central Statistics Office- CSO)

➠NSO = NSSO + CSO


राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (National Statistical Office- NSO) के द्वारा गरीबी की गणना के सर्वे में दो प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता है। जैसे-

1. समान संदर्भ अवधि (Uniform Reference Period- URP)

2. मिश्रित संदर्भ अवधि (Mixed Reference Period- URP)


1. समान संदर्भ अवधि (Uniform Reference Period- URP)-

➠NSO के द्वारा गरीबी  की गणना के लिए समान संदर्भ अवधि (Uniform Reference Period- URP) विधि का प्रयोग किया जाता है।

➠गरीबी रेखा की गणना की समान संदर्भ अवधि विधि के तहत पिछले 30 दिनों में खाद्य उपभोग पर किये गये व्यय को देखा या मापा जाता है।


2. मिश्रित संदर्भ अवधि (Mixed Reference Period- MRP)-

➠NSO के द्वारा गरीबी की गणना के लिए मिश्रित संदर्भ अवधि (Mixed Reference Period- MRP) विधि का प्रयोग किया जाता है।

➠गरीबी रेखा की गणना की मिश्रित संदर्भ अवधि विधि के तहत खाद्य उपभोग के साथ-साथ पिछले 1 वर्ष में स्वास्थ्य, शिक्षा, कपड़े, जूते व अन्य टिकाऊ वस्तुओं पर किये गये खर्च या व्यय को भी देखा या मापा जाता है।


संशोधित मिश्रित संदर्भ अवधि (Modified Mixed Reference Period- MMRP)-

➠गरीबी की गणना की संशोधित मिश्रित संदर्भ अवधि (Modified Mixed Reference Period- MMRP) विधि के तहत 7 दिन, 30 दिन और 1 वर्ष के व्यय (खर्चों) को देखा या मापा जाता है।


भारत में गरीबी की गणना का संक्षिप्त इतिहास-

➠भारत में गरीबी की गणना पहली बार दादा भाई नौरोजी के द्वारा की गई थी।

➠दाद भाई नौरोजी की प्रसिद्ध पुस्तक Poverty and Un-British Rule In India है।

➠दादा भाई नौरोजी ने गरीबी की गणना 1867-1868 ई. में की गई थी।

➠दादा भाई नौरोजी के अनुसार 1867-68 ई. में गरीबी रेखा शहरी क्षेत्रों (Urban Area) में 35 रुपये प्रति व्यक्ति आय प्रति वर्ष है। (35 Rs/ Per Capita/ Per Year) अर्थात् दाद भाई नौरोजी के अनुसार 1867-68 ई. में शहरी क्षेत्रों में किसी व्यक्ति की आय 35 रुपये प्रति वर्ष है तो वह गरीबी रेखा से बाहर है।

➠दादा भाई नौरोजी के अनुसार 1867-68 ई. में गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों (Rural Area) में 16 रुपये प्रति व्यक्ति आय प्रति वर्ष है। (35 Rs/ Per Capita/ Per Year) अर्थात् दाद भाई नौरोजी के अनुसार 1867-68 ई. में ग्रामीण क्षेत्रों में किसी व्यक्ति की आय 35 रुपये प्रति वर्ष है तो वह गरीबी रेखा से बाहर है।


राष्ट्रीय योजना समिति (National Planning Committee- NPC) (1939)-

➠राष्ट्रीय योजना समिति (NPC) की स्थापना 1938 ई. में की गई थी।

➠राष्ट्रीय योजना समिति (NPC) का अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू था।

➠राष्ट्रीय योजना समिति (NPC) के अनुसार गरीबी की गणना में बुनियादी आवश्यकताओं में रोटी, कपड़ा और मकान शामिल किया जाना चाहिएं।

➠राष्ट्रीय योजना समिति (NPC) के अनुसार 1938 ई. में गरीबी रेखा शहरी क्षेत्रों में 20 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह है। (20 Rs/Person/Month) अर्थात् राष्ट्रीय योजना समिति के अनुसार 1938 ई. में शहरी क्षेत्रों में किसी व्यक्ति की आय 20 रुपये प्रति माह है तो वह गरीबी रेखा से बाहर है।

➠राष्ट्रीय योजना समिति (NPC) के अनुसार 1938 ई. में गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों में 15 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह है। (15 Rs/Person/Month) अर्थात् राष्ट्रीय योजना समिति के अनुसार 1938 ई. में ग्रामीण क्षेत्रों में किसी व्यक्ति की आय 15 रुपये प्रति माह है तो वह गरीबी रेखा से बाहर है।


बाॅम्बे योजना (Bombay Plan) 1944-

➠बाॅम्बे योजना उद्योगपतियों के द्वारा बनायी गई थी।

➠बाॅम्बे योजना को टाटा बिरला योजना (Tata Birla Plan) भी कहा जाता है।

➠बाॅम्बे योजना के अनुसार 1944 ई. में गरीबी रेखा 75 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष है। (75 Rs/Person/Year) अर्थात्  बाॅम्बे योजना के अनुसार 1944 ई. में किसी व्यक्ति की आय 75 रुपये प्रति वर्ष है तो वह गरीबी रेखा से बाहर है।


विशेषज्ञ समुह (Expert Group)- (1962 ई.)

➠योजना आयोग ने 1962 ई. में गरीबी की गणना के लिए एक विशेषज्ञ समुह बनाया था।

➠योजना आयोग के विशेषज्ञ समुह के अनुसार 1962 ई. में गरीबी रेखा शहरी क्षेत्रों में 25 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष है। (25 Rs/Person/Year) अर्थात् योजना आयोग के विशेषज्ञ समुह के अनुसार 1962 ई. में शहरी क्षेत्रों में किसी व्यक्ति की आय 25 रुपये प्रति वर्ष है तो वह गरीबी रेखा से बाहर है।

➠योजना आयोग के विशेषज्ञ समुह के अनुसार 1962 ई. में गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों में 20 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष है। (20 Rs/Person/Year) अर्थात् योजना आयोग के विशेषज्ञ समुह के अनुसार 1962 ई. में ग्रामीण क्षेत्रों में किसी व्यक्ति की आय 20 रुपये प्रति वर्ष है तो वह गरीबी रेखा से बाहर है।


वी एम दांडेकर और एन रथ समिति (V.M. Dandekar and Neelkanth Rath Committee) (1971 ई.)-

➠वी एम दांडेकर और एन रथ समिति  की स्थापना 1971 ई. में की गई थी।

➠वी एम दांडेकर और एन रथ समिति की सिफारिश पर भारत में पहली बार गरीबी रेखा के लिए कैलोरी उपभोग का प्रयोग किया गया था।

➠वी एम दांडेकर और एन रथ समिति के अनुसार गरीबी रेखा 2250 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रति दिन है। (2250 Calorie/Person/Day) अर्थात् वी एम दांडेकर और एन रथ समिति के अनुसार 1971 ई. में यदि कोई व्यक्ति 2250 कैलोरी भोजन प्रति दिन प्राप्त कर पा रहा है तो वह गरीबी रेखा से बाहर है।


अलघ समिति (Alagh Committee)- 1979 ई.

➠अलघ समिति की स्थापना 1979 ई. में की गई थी।

➠अलघ समिति का अध्यक्ष योगेंद्र कुमार अलघ (Yoginder Kumar Alagh) को बनाया गया था।

➠अलघ समिति के अनुसार गरीबी की गणना में कैलोरी उपभोग के साथ-साथ पोषण की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

➠अलघ समिति के अनुसार 1979 ई. में गरीबी रेखा शहरी क्षेत्रों में 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रति दिन है। (2400 Calorie/Person/Day) अर्थात् अलघ समिति के अनुसार 1979 ई. में शहरी क्षेत्रों में यदि कोई व्यक्ति 2400 कैलोरी भोजन प्रति दिन प्राप्त कर पा रहा है तो वह गरीबी रेखा से बाहर है।

➠अलघ समिति के अनुसार 1979 ई. में गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रति दिन है। (2100 Calorie/Person/Day) अर्थात् अलघ समिति के अनुसार 1979 ई. में ग्रामीण क्षेत्रों यदि कोई व्यक्ति 2100 कैलोरी भोजन प्रति दिन प्राप्त कर पा रहा है तो वह गरीबी रेखा से बाहर है।


डी.टी. लकड़ावाला समिति (D.T. Lakdawala Committee)- 1933 ई.

➠डी.टी. लकड़ावाला समिति की स्थापना 1933 ई. में की गई थी।

➠डी.टी. लकड़ावाला समिति का मुख्य उद्देश्य भारत में गरीबी की गणना की विधि की समिक्षा करना था।

➠डी.टी. लकड़ावाला समिति के अनुसार गरीबी की गणना के लिए कैलोरी खपत या उपभोग की विधि को जारी रखना चाहिए।

➠डी.टी. लकड़ावाला समिति के अनुसार मुद्रास्फीति का समावेशन करने के लिए शहरी क्षेत्रों में CPI उद्योगिक कामगार तथा ग्रामीण क्षेत्रों में CPI मजदूर का प्रयोग किया जाना चाहिए।

➠डी.टी. लकड़ावाला समिति के अनुसार राज्य आधारित गरीबी रेखा होनी चाहिए।


सुरेश तेंदुलकर समिति (Suresh Tendulkar Committee)- 2005 ई.

➠सुरेश तेंदुलकर समिति की स्थापना 2005 ई. में की गई थी।

➠सुरेश तेंदुलकर समिति ने अपनी रिपोर्ट 2009 में प्रस्तुत की थी।

➠सुरेश तेंदुलकर समिति के द्वारा कैलोरी खपत या कैलोरी उपभोग की विधि की आलोचना की गई थी। क्योंकि वर्तमान में उपभोग के तरीके बदल दिये गये है।

➠पहले माना जाता था की स्वास्थ्य एवं शिक्षा सरकार की जिमेदारी है परन्तु वर्तमान में स्वास्थ्य एवं शिक्षा की व्यवस्था निजी स्तर पर की जाती है।

➠सुरेश तेंदुलकर समिति के द्वारा मिश्रित संदर्भ अवधि (MRP) का प्रयोग किया गया था।

➠सुरेश तेंदुलकर समिति के अनुसार गरीबी रेखा शहरी क्षेत्रों में 5000 रुपये प्रति परिवार प्रति माह है। (5000 Rs/Family/Month) अर्थात् सुरेश तेंदुलकर समिति के अनुसार 2009 ई. में शहरी क्षेत्रों में यदि किसी परिवार का आय 5000 रुपये प्रति माह है तो वह परिवार गरीबी रेखा से बाहर है।

➠सुरेश तेंदुलकर समिति के अनुसार गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों में 4080 रुपये प्रति परिवार प्रति माह है। (4080 Rs/Family/Month) अर्थात् अलघ समिति के अनुसार 2009 ई. में ग्रामीण क्षेत्रों में यदि किसी परिवार की आय 4080 रुपये प्रति माह है तो वह परिवार गरीबी रेखा से बाहर है।

➠सुरेश तेंदुलकर समिति के अनुसार भारत में गरीबों का प्रतिशत वर्ष 2004-05 में 37.2% था।

➠सुरेश तेंदुलकर समिति के अनुसार भारत में गरीबों का प्रतिशत वर्ष 2011-12 में 21.9% था।

➠सुरेश तेंदुलकर समिति के द्वारा वर्ष 2011-12 में दिये गये गरीबी के आंकड़े भारत में गरीबी के अंतिम अधिकारिक आंकड़े थे। क्योंकि वर्ष 2011-12 के बाद वर्तमान तक अधिकारिक रूप से गरीबी की गणना नहीं की गई है।


रंगराजन समिति (Rangarajan Committee) - 2012

➠रंगराजन समिति की स्थापना वर्ष 2012 में की गई थी।

➠रंगराजन समिति ने अपनी रिपोर्ट वर्ष 2014 में प्रस्तुत की थी।

➠रंगराजन समिति के द्वारा संशोधित मिश्रित संदर्भ अवधि (Modified Mixed Reference Period- MMRP) का प्रयोग किया गया था।

➠रंगराजन समिति के अनुसार गरीबी रेखा शहरी क्षेत्रों में 7035 रुपये प्रति परिवार प्रति माह है। (7035 Rs/Family/Month) अर्थात् रंगराजन समिति के अनुसार 2014 ई. में शहरी क्षेत्रों में यदि किसी परिवार का आय 7035 रुपये प्रति माह है तो वह परिवार गरीबी रेखा से बाहर है।

➠रंगराजन समिति के अनुसार गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों में 4860 रुपये प्रति परिवार प्रति माह है। (4860 RS/Family/Month) अर्थात् रंगराजन समिति के अनुसार 2014 ई. में शहरी क्षेत्रों में यदि किसी परिवार का आय 4860 रुपये प्रति माह है तो वह परिवार गरीबी रेखा से बाहर है।

➠रंगराजन समिति की सिफारिश को सरकार के द्वारा स्वीकार नहीं किया गया था। अर्थात् भारत सरकार ने रंगराजन संमिति के द्वारा दिये गये गरीबी के आंकड़ों का स्वीकार नहीं किया था।


नीति आयोग का बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index Released By Niti Aayog)-

➠नीति आयोग के द्वारा बहुआयामी गरीबी सूचकांक वर्ष 2021 में जारी किया गया था।

➠नीति आयोग के द्वारा बहुआयामी गरीबी सूचकांक जारी करने के लिए तीन आयामों तथा 12 संकेतकों का प्रयोग किया गया था। जैसे तीन आयाम-

1. स्वास्थ्य

2. शिक्षा

3. जीवन स्तर

नीति आयोग के द्वारा बहुआयामी गरीबी सूचकांक जारी करने के लिए निम्नलिखित 12 संकेतकों का प्रयोग किया गया था।

1. स्वास्थ्य-

(I) पोषण

(II) बाल मृत्यु दर

(III) जन्म के समय चिकित्सिय देखभाल

2. शिक्षा-

(IV) स्कूली शिक्षा के वर्ष

(V) स्कूल उपस्थिति

3. जीवन स्तर-

(VI) भोजन पकाने का ईंधन

(VII) स्वच्छता

(VIII) स्वच्छ पेयजल

(IX) विद्युत कनेक्शन

(X) पका घर

(XI) परिसंपत्तियां

(XII) बैंक खाता

➠नीति आयोग के द्वारा जारी किये गये बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार भारत का सर्वाधिक गरीब राज्य बिहार है।

➠नीति आयोग के द्वारा जारी किये गये बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार बिहार में कुल 51% जनसंख्या गरीब है।

➠नीति आयोग के द्वारा जारी किये गये बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार भारत का सबसे कम गरीब राज्य केरल है।

➠नीति आयोग के द्वारा जारी किये गये बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार केरल में कुल 0.7% जनसंख्या गरीब है।

➠नीति आयोग के द्वारा जारी किये गये बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार राजस्थान गरीबी में भारत में 8वें स्थान पर है।

➠नीति आयोग के द्वारा जारी किये गये बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार राजस्थान में कुल 29.46% जनसंख्या गरीब है।


भारत में गरीबी निवारण के उपाय-

➠भारत में गरीबी निवारण के लिए दो प्रकार की अवधारणाये (सिद्धान्त) प्रचलित है।

1. ट्रिकल डाउन थ्योरी (trickle-down theory)

2. प्रत्यक्ष निवारण सिद्धान्त


1. ट्रिकल डाउन थ्योरी (trickle-down theory)-

➠ट्रिकल डाउन थ्योरी के तहत यह सुझाव दिया जाता है की सरकार को भौतिक आधारभूत ढांचे पर अधिक खर्च करना चाहिए।

➠ट्रिकल डाउन थ्योरी के अनुसार आर्थिक सुधारों को लागू करना चाहिए जिससे की अधिक से अधिक निवेश को आकर्षित किया जा सके जिससे उत्पादन गतिविधियों को बढ़ाया जा सके जिससे की रोजगार के नये अवसर सर्जित किये जा सकें जिससे नियमित आय होगी तथा बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है।

➠ट्रिकल डाउन थ्योरी के सिद्धान्त के समर्थक जगदीश भगवती एवं अरविंद पंगडिया है।

➠जगदीश भगवती तथा अरविंद पंगडिया दोनों के द्वारा Why Growth Matters नामक पुस्तक लिखी गई थी।


2. प्रत्यक्ष निवारण सिद्धान्त-

➠प्रत्यक्ष निवारण के तहत सरकार को गरीबों को प्रत्यक्ष सहायता पहुचानी चाहिए जैसे- खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम, मनरेगा, मुफ्त चिकित्सा, मुफ्त शिक्षा आदि।

➠सरकार को सामाजिक आधारभूत ढांचे पर अधिक खर्च करना चाहिए।

➠गरीबी निवारण के प्रत्यक्ष निवारण सिद्धान्त का समर्थन अमर्त्य सेन तथा उनके सहयोगी ज्यां द्रेज ने किया था।

➠अमर्त्य सेन तथा ज्यां द्रेज दोनों के द्वारा An Uncertain Glory India and Its Contradictions नामक पुस्तक लिखी गई है।

➠भारत सरकार के द्वारा ट्रिकल डाउन थ्योरी तथा प्रत्यक्ष निवारण सिद्धान्त दोनों सिद्धान्तों का मिश्रिण प्रयोग में लेना चाहिए।

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