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मारवाड़ का राठौड़ वंश

 मारवाड़ का राठौड़ वंश


मारवाड़-

➠मारवाड़ में राठौड़ वंश का शासन था।


मारवाड़ के राठौड़ वंश के प्रमुख राजा-

1. राव सीहा

2. राव घूहड़ (1291- 1309 ई.)

3. मल्लीनाथ जी

4. राव चून्डा (1394- 1423 ई.)

4. राव चूण्डा (1394- 1423 ई.)

5. राव रणमल (1427- 1438 ई.)

6. राव जोधा (1438- 1489 ई.)

7. राव मालदेव (1531- 1562 ई.)

8. राव चन्द्रसेन (1562- 1581 ई.)

9. उदयसिंह (1583- 1595 ई.)

10. महाराजा गजसिंह (1615- 1638 ई.)

11. महाराजा जसवंतसिंह या महाराजा जसवंतसिंह- I (1638- 1678 ई.)

12. महाराजा अजीत सिंह (1679- 1724 ई.)

13. महाराजा अभय सिंह (1724- 1749 ई.)

14. महाराजा मानसिंह (1803- 1843 ई.)


1. राव सीहा-

➠राव सीहा मारवाड़ में राठौड़ों का संस्थापक था।

➠1240 ई. में पाली के पालीवाल ब्राह्मणों की सहायता के लिए राव सीहा बदायूं से मारवाड़ आया था।

➠बदायूं नामक स्थान उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है।

➠राव सीहा ने अपनी राजधानी खेड़ को बनाया था।

➠खेड़ राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित है।

➠राव सीहा की छतरी राजस्थान के पाली जिले की बीठू नामक स्थान पर स्थित है।


2. राव घूहड़ (1291- 1309 ई.)-

➠राव घूहड़ कर्नाटक से अपनी कुल देवी नागणेची माता की मूर्ति लेकर आया था तथा बाड़मेर के  नागाणा नामक स्थान पर नागणेची माता की मूर्ति स्थापित करवायी थी। अर्थात् राव घूहड़ ने बाड़मेर के नागाणा नामक स्थान पर नागणेची माता का मंदिर बनवाया था।

➠नागणेची माता राठौड़ वंश की कुल देवी है।


3. मल्लीनाथ जी-

➠मल्लीनाथ जी ने बाड़मेर के मेवानगर को अपनी राजधानी बनाया था।

➠मल्लीनाथ जी ने मालवा के निजामुद्दीन को हराया था।

➠मल्लीनाथ जी पश्चिमी राजस्थान के लोक देवता है।

➠मल्लीनाथ जी के कारण बाड़मेर क्षेत्र का नाम मालाणी पड़ा था।

➠मालाणी घोड़े की नस्ल भी होती है।

➠मालाणी नस्ल के घोड़े राजस्थान में सर्वाधिक प्रसिद्ध है।


विशेष- गंणगौर पर गीन्दोली के गीत गाये जाते है।


4. राव चून्डा (1394- 1423 ई.)-

➠राव चून्डा के चाचा मल्लीनाथ जी थे

➠प्रतिहार वंश की ईन्दा शाखा ने अपनी राजकुमारी की शादी राव चून्डा से की थी।

➠प्रतिहारो ने राव चून्डा को दहेज में मंडोर (जोधपुर) दिया था।

➠राव चून्डा ने अपनी राजधानी मंडोर (जोधपुर) को बनाया था। अतः अब राठौड़ों की राजधानी मंडोर (जोधपुर) थी।

➠राव चून्डा की रानी चांद कंवर ने जोधपुर में चांद बावड़ी का निर्माण करवाया था।

➠राव चून्डा पूगल (बीकानेर) के भाटियों के खिलाफ लड़ता हुआ मारा गया था।

➠राव चून्डा ने अपने बड़े बेटे रणमल को राजा नहीं बनाया था बल्कि राव चून्डा ने अपने छोटे बेटे कान्हा को राजा बनाया था।


5. राव रणमल (1427- 1438 ई.)-

➠राव रणमल के पिता का नाम राव चून्डा था।

➠राव रणमल अपने छोटे भाई कान्हा को राजा बनाए जाने से नाराज था।

➠राव रणमल मेवाड़ की सेना की सहायता से मारवाड़ का राजा बना था।

➠राव रणमल ने अपनी बहन हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के महाराणा लाखा के साथा किया था।

➠1438 ई. में राव रणमल की प्रेमिका भारमली की सहायता से मेवाड़ के राणा चून्डा ने रणमल की हत्या कर दी थी।


6. राव जोधा (1438- 1489 ई.)-

➠राव जोधा ने 1459 ई. में जोधपुर की स्थापना की थी।

➠राव जोधा ने जोधपुर में मेहरानगढ़ किले का निर्माण करवाया था।

➠करणी माता ने जोधपुर के मेहरानगढ़ किले की नींव रखी थी।

➠1460 ई. में राव जोधा ने जोधपुर के मेहरानगढ़  किले में चामुंडा माता का मंदिर बनवाया था।

➠राव जोधा की रानी जसमादे ने जोधपुर में राणीसर तालाब का निर्माण करवाया था।

➠राव जोधा ने दिल्ली के शासक बहलोल लोदी को हराया था।

➠इतिहासकार गौरी शंकर हीराचन्द औझा के अनुसार "जोधा मारवाड़ का पहला प्रतापी राजा था।"


7. राव मालदेव (1531- 1562 ई.)-

➠राव मालदेव के पिता का नाम राव गांगा था।

➠राव मालदेव की माता का नाम पद्मा कुमारी था।

➠पद्मा कुमारी सिरोही के जगमाल देवड़ा की पुत्री थी।

➠राव मालदेव ने अपने पिता राव गांगा की हत्या की तथा मारवाड़ का राजा बना था।

➠राव मालदेव का राजतिलक सोजत (पाली) में हुआ था।

➠राजतिलक के समय राव मालदेव के पास केवल दो परगने थे जैसे-

1. सोजत (पाली)

2. जोधपुर

➠राजा बनने का बाद राव मालदेव ने 52 युद्ध तथा 58 परगने जीते थे जिसमे प्रमुख परगने निम्नलिखित है।-

1. फलौदी (जोधपुर) परगना

2. विलाड़ा (जोधपुर) परगना

3. सिवाणा (बाड़मेर) परगना

4. रायपुर (पाली) परगना

5. भाद्राजूण (जालोर) परगना

6. नागौर परगना

7. जालोर परगना

8. मेड़ता परगना (नागौर)

9. बीकानेर परगना


1. फलौदी (जोधपुर) परगना-

➠फलौदी राजस्थान के जोधपुर जिले में स्थित है।

➠फलोदी परगना जैसलमेर के भाटी वंश के पास था।

➠राव मालदेव ने जैसलमेर के भाटियों से फलौदी परगना छिन लिया था।


2. बिलाड़ा (जोधपुर) परगना-

➠बिलाड़ा राजस्थान के जोधपुर जिले में स्थित है।

➠बिलाड़ा परगना सिरवी जाति के पास था।

➠राव मालदेव ने सिरवी जाति से बिलाड़ा परगना छिन लिया था।


3. सिवाणा (बाड़मेर) परगना-

➠सिवाणा राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित है।

➠सिवाणा परगना डूंगरसिंह के पास था।

➠राव मालदेव ने डूंगरसिंह से सिवाणा परगना छिन लिया था।


4. रायपुर (पाली) परगना-

➠रायपुर राजस्थान के पाली जिले में स्थित है।

➠रायपुर परगना वीरा सींधल के पास था।

➠राव मालदेव ने वीरा सींधल से रायपुर परगना छिन लिया था।


5. भाद्राजूण (जालोर) परगना-

➠भाद्राजूण राजस्थान के जालोर जिले में स्थित है।

➠भाद्राजूण परगना वीरा सींधल के पास था।

➠राव मालदेव ने वीरा सींधल से भाद्राजूण परगना छिन लिया था।


6. नागौर परगना-

➠नागौर परगना दोलत खाँ के पास था।

➠राव मालदेव ने दोलत खाँ से नागौर परगना छिन लिया था।


7. जालोर परगना-

➠जालोर परगना सिकन्दर खाँ के पास था।

➠राव मालदेव ने सिकन्दर खाँ से जालोर परगना छिन लिया था।


8. मेड़ता परगना (नागौर)-

➠मेड़ता परगना वीरमदेव के पास था।

➠मेड़ता राजस्थान के नागौर जिले में स्थित है।

➠राव मालदेव ने वीरमदेव से मेड़ता परगना छिन लिया था।


9. बीकानेर परगना-

➠बीकानेर परगना जैतसी के पास था।

➠राव मालदेव ने जैतसी से बीकानेर परगना छिन लिया था।


पाहेबा का युद्ध या साहेबा का युद्ध (1541 ई.)- 

➠पाहेबा के युद्ध को ही साहेबा का युद्ध कहा जाता है।

➠पाहेबा का युद्ध 1541 ई. में लड़ा गया था।

➠पाहेबा का युद्ध मारवाड़ के राजा राव मालदेव तथा बीकानेर के राजा जैतसी के मध्य लड़ा गया था।

➠बीकानेर का राजा जैतसी पाहेबा के युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया था।

➠पाहेबा के युद्ध में राव मालदेव जीत गया था।

➠राव मालदेव ने बीकानेर पर अधिकार कर लिया तथा राव मालदेव ने कूम्पा राठौड़ को बीकानेर सौंप दिया था।

➠बीकानेर के राजा जैतसी का बेटा कल्याणमल सहायता के लिए शेरशाह सूरी के पास चला गया था।


वीरमदेव (मेड़ता, नागौर)-

➠दरियाजोश नामक हाथी को लेकर राव मालदेव तथा मेड़ता (नागौर) के राजा वीरमदेव के बीच विवाद था तथा राव मालदेव ने मेड़ता (नागौर) पर अधिकार कर लिया था।

➠मेड़ता (नागौर) का राजा वीरमदेव भी सहायता के लिए शेरशाह सूरी के पास चला गया था।


राव मालदेव हुमायूं संबंध-

➠शेरशाह सूरी से हारने के बाद हुमायूं मारवाड़ से होकर जा रहा था।

➠जोगीतीर्थ नामक स्थान से हुमायूं ने राव मालदेव के पास तीन दूत भेजे तथा शेरशाह के खिलाफ सहायता की मांग की थी।

➠हुमायूं के द्वारा राव मालदेव के पास भेजे गये तीन दूत निम्नलिखित है-

1. मीर समंद

2. रायमल सोनी

3. अतखा खाँ

➠राव मालदेव ने हुमायूं के सहायता मांगने पर सकारात्मक उत्तर दिया तथा राव मालदेव ने हुमायूं को बीकानेर तथा सेनिक सहायता देने का वादा किया था। लेकिन हुमायूं राव मालदेव पर विश्वास नहीं करता है। और अपने पुस्तकालय अध्यक्ष मुल्ला सुर्ख के कहने पर हुमायूं सिन्ध की तरफ चला गया था।

➠यदि राव मालदेव तथा हुमायूं थोड़ी समझदारी दिखाते तो शेरशाह सूरी के खिलाफ गठबंधन बना सकते थे तथा अफगानों का राज भारत से समाप्त कर सकते थे।


गिरी सुमेल का युद्ध या जैतारण का युद्ध (5 जनवरी, 1544 ई. - पाली)-

➠गिरी सुमेल के युद्ध को ही जैतारण का युद्ध कहा जाता है।

➠गिरी सुमेल का युद्ध 5 जनवरी, 1544 ई. को पाली में लड़ा गया था।

➠गिरी सुमेल का युद्ध मारवाड़ के राजा राव मालदेव तथा दिल्ली के शासक शेरशाह सूरी के मध्य लड़ा गया था।

➠गिरी सुमेल के युद्ध में राव मालदेव का साथ जैता तथा कूम्पा ने दिया था।

➠गिरी सुमेल के युद्ध में शेरशाह सूरी का साथ बीकानेर के राजा कल्याणमल तथा मेड़ता (नागौर) के राजा वीरमदेव ने दिया था।

➠शेरशाह सूरी की चालाकी के कारण राव मालदेव वापस जोधपुर चला गया था।

➠गिरी सुमेल के युद्ध में जैता तथा कूम्पा ने शेरशाह सूरी का सामना किया था।

➠जलाल खाँ जलवानी की सहायता से शेरशाह सूरी गिरी सुमेल के युद्ध में जीत गया था।

➠गिरी सुमेल के युद्ध में जीतने के बाद शेरशाह सूरी ने कहा था की "मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता"

➠गिरी सुमेल युद्ध जितने के बाद शेरशाह सूरी ने जोधपुर पर अधिकार कर लिया तथा खवास खाँ को जोधपुर सौंप दिया था।

➠राव मालदेव सिवाणा (बाड़मेर) चला गया था।

➠सिवाणा राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित है।

➠सिवाणा को मारवाड़ के राठौड़ों की शरण स्थली माना जाता है। अर्थात् मारवाड़ की संकटकालीन राजधानी सिवाणा है।


➠शेरशाह सूरी की मृत्यु (1545 ई.) के बाद राव मालदेव ने जोधपुर पर पुनः अधिकार कर लिया था।

➠शेरशाह सूरी के साथ संबंधों में राव मालदेव ने कूटनीतिक गलतियां की थी।

➠राव मालदेव ने बीकानेर के राजा कल्याणमल तथा मेड़ता (नागौर) के राजा वीरमदेव को शेरशाह सूरी के पास जाने का मोका दे दिया था अन्यथा राव मालदेव कल्याणमल तथा वीरमदेव के साथ मिलकर राठौड़ों का गठबंधन बना सकता था।

➠यदि राव मालदेव शेरशाह सूरी की चालाकी में नहीं फसता तो गिरी सुमेल का युद्ध जीत सकता था।

➠राव मालदेव ने जोधपुर का परकोटा बनवाया था।

➠राव मालदेव ने राजस्थान के कई किलों का निर्माण भी करवाया था। जैसे-

(I) सोजत (पाली)

(II) पोकरण (जैसलमेर)

(III) रीयां (नागौर)

(IV) मेड़ता (नागौर)

➠राव मालदेव ने अपने बड़े बेटों राम तथा उदयसिंह को राजा नहीं बनाया था बल्कि अपने छोटे बेटे चन्द्रसेन को मारवाड़ का अगला राजा बनाया था।


उमादे भटियाणी-

➠उमादे भटियाणी जैसलमेर के लुणकरण भाटी की राजकुमारी थी।

➠उमादे भटियाणी राव मालदेव की रानी थी।

➠भारमली नामक दासी के कारण उमादे भटियाणी राव मालदेव से नाराज हो गयी थी अतः इसी कारण से उमादे भटियाणी को रूठी रानी भी कहा जाता है।

➠उमादे भटियाणी ने अपनी कुछ समय अजमेर के तारागढ़ किले में बिताया था लेकिन बाद में केलवा (राजसमंद) में चली गयी थी।


विशेष- जला- महिलाएं बारात का डेरा देखने जाते समय जला गीत गाती है।


स्वरूप दे झाली-

➠स्वरूप दे झाली राव मालदेव की रानी थी।

➠रानी स्वरूप दे झाली ने मंडोर के पास जोधपुर में बहूजी रो तालाब का निर्माण करवाया था।


राव मालदेव के दरबारी विद्वान-

1. आशानन्द जी

2. ईसरदास जी


1. आशानन्द जी-

➠आशानन्द जी ने पाहेबा के युद्ध में भाग लिया था।

➠आशानन्द जी मारवाड़ के राव मालदेव के दरबारी विद्वान थे।

➠आशानन्द जी के द्वारा निम्नलिखित पुस्तके लिखी गई थी।

(I) उमादे भटियाणी रा कवित्त

(II) बाघा भारमली रा दूहा

(III) गोगाजी री पेड़ी


2. ईसरदास जी-

➠ईसरदास जी मारवाड़ के राव मालदेव के दरबारी विद्वान थे।

➠ईसरदास जी पश्चिमी राजस्थान में लोक देवता भी है।

➠ईसरदास जी के द्वारा निम्नलिखित पुस्तके लिखी गई थी।

(I) हाला झाला री कुंडलिया (हाला झाला री कुंडलिया को सूर सतसई के नाम से भी जाना जाता है।)

(II) देवीयाण

(III) हरिरस


राव मालदेव की उपाधियां-

1. हिन्दू बादशाह

2. हशमत वाला राजा


हशमत वाला राजा-

➠राव मालदेव एक शक्तिशाली राजा था।

➠अबुल फजल तथा निजामुद्दीन ने राव मालदेव की प्रशंसा करते हुए राव मालदेव को 'हशमत वाला राजा' कहा है।


8. राव चन्द्रसेन (1562- 1581 ई.)-

➠राव चन्द्रसेन जोधपुर के राजा राव मालदेव का बेटा था।

➠1574 ई. में अकबर ने बीकानेर के महाराजा रायसिंह को चन्द्रसेन पर आक्रमण करने के लिए भेजा था।

➠महाराजा रायसिंह ने सोजत के किले पर अधिकार कर लिया था लेकिन महाराजा रायसिंह सिवाणा के किले पर अधिकार नहीं कर पाया था।

➠1574 ई. में महाराजा रायसिंह के आक्रमण के समय सोजत का किला कल्ला राठौड़ के पास था।

➠1574 ई. में महाराजा रायसिंह के आक्रमण के सयम सिवाणा का किला पत्ता राठौड़ के पास था।

➠सोजत का किला राजस्थान के पाली में स्थित है।

➠सिवाणा का किला राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित है।

➠1576 ई. में मुगल सेनापित शाहबाज खाँ ने सिवाणा किले पर अधिकार कर लिया था।

➠1576 ई. में राव चन्द्रसेन को पोकरण का किला जैसलमेर के हरराज को बेचना पड़ गया था।

➠पोकरण का किला राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित है।

➠मालवा के रामपुरा क्षेत्र में राव चन्द्रसेन ने मुगल सेनापति जलाल खाँ को मार दिया था।

➠1581 ई. में सारन की पहाड़ियों में राव चन्द्रसेन की पाली जिले के सिंचियाई नामक गाँव में मृत्यु हो गई थी।

➠राव चन्द्रसेन ने अकबर की अधिनता स्वीकार नहीं की थी तथा राव चन्द्रसेन आजीवन संर्घष करता रहा था।


परगने-

➠राव चन्द्रसेन को जब मारवाड़ का राजा बनाया गया था तब राव चन्द्रसेन के बड़े भाईयों राम को गूंदोज परगना तथा उदयसिंह को फलौदी परगना दिया गया था। 

➠राव चन्द्रसेन को जब मारवाड़ का राजा बनाया गया था। तब राव चन्द्रसेन के छोटे भाई रायमल को सिवाणा परगना दिया गया था।

➠सिवाणा नामक स्थान राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित है।

➠गूंदोज नामक स्थान राजस्थान के पाली जिले में स्थित है।

➠फलौदी नामक स्थान राजस्थान के जोधपुर जिले में स्थित है।


नाडौल का युद्ध (पाली)-

➠नाडौल का युद्ध पाली के नाडौल नामक स्थान पर लड़ा गया था।

➠नाडौल का युद्ध राव चन्द्रसेन तथा राव चन्द्रसेन का छोटा भाई राम के मध्य लड़ा गया था।

➠नाडौल के युद्ध में राव चन्द्रसेन की जीत हुई तथा राव चन्द्रसेन ने राम को हरा दिया था।

➠राम नाडौल का युद्ध हारने के बाद राम सहायता के लिए अकबर के पास चला गया था।

➠1564 ई. में राम की सहायता के लिए अकबर ने अपने सेनापति हुसैन कुली खाँ (हुसैन कुली बेग) के नेतृत्व में राम के साथ सेना भेजी तथा जोधपुर पर आक्रमण कर जोधपुर पर अधिकार कर लिया था।

➠आक्रमण के समय राव चन्द्रसेन भाद्राजूण की ओर निकल गया था।

➠भाद्राजूण नामक स्थान राजस्थान के जालोर जिले में स्थित है।


लोहावट का युद्ध (जोधपुर)-

➠लोहावट का युद्ध जोधपुर के लोहावट नामक स्थान पर लड़ा गया था।

➠लोहावट का युद्ध राव चन्द्रसेन तथा राव चन्द्रसेन का छोटा भाई उदयसिंह के मध्य लड़ा गया था।

➠लोहावट के युद्ध में राव चन्द्रसेन की जीत हुई तथा राव चन्द्रसेन ने उदयसिंह को हरा दिया था।


नागौर दरबार-

➠1570 ई. में मुगल बादशाह अकबर ने नागौर दरबार का आयोजन किया था।

➠1570 ई. में राव चन्द्रसेन ने अकबर के नागौर दरबार में भाग लिया था। लेकिन अकबर का झुकाव उदयसिंह की तरफ देखकर राव चन्द्रसेन अकबर से बिना मिले ही वापस चला गया था।

➠चन्द्रसेन के नागौर दरबार में अकबर से बिना मिले वापस जाने के कारण अकबर ने नागौर के भाद्राजूण पर आक्रमण कर दिया था।

➠अकबर के भाद्रजूण (नागौर) पर आक्रमण करने के कारण राव चन्द्रसेन सिवाणा (बाड़मेर) चला गया था।


नागौर दरबार का घोषित उद्देश्य-

➠अकबर ने नागौर दरबार के आयोजन से पहले यह घोषण की गयी थी की यह दरबार अकाल राहत कार्यों के लिए आयोजित किया जायेगा।

➠नागौर दरबार के दौरान अकबर ने अकाल राहत कार्यों के लिए नागौर में शुक्र तालाब का निर्माण करवाया था।


नागौर दरबार का वास्तविक उद्देश्य-

➠अकबर के द्वारा नागौर दरबार के आयोजन का वास्तविक उद्देश्य राजस्थान के राजाओं को अधिनता स्वीकार करवाना था।

➠राजस्थान के कुछ राजाओं ने नागौर दरबार में अकबर की अधिनता स्वीकार की थी जैसे-

1. कल्याणमल (बीकानेर का राजा)

2. हरराज (जैसलमेर का राजा)

3. उदयसिंह या मोटा राजा उदयसिंह (राव चन्द्रसेन का बड़ा भाई)


नागौर दरबार का महत्व/ प्रभाव/ परिणाम-

1. नागौर दरबार से अकबर ने बिना युद्ध लड़े ही अपनी कूटनीति से राजस्थान के राजाओं को अपनी अधीनता स्वीकार करवायी थी।

2. नागौर दरबार के बाद राजस्थान के राजा स्पष्ट रूप से दो भागों में विभाजित हो गये थे जैसे-

(अ) मुगल सहयोगी

(ब) मुगल विरोधी

3. नागौर दरबार के बाद राजस्थान में मुगल आश्रित राजाओं की श्रृंखला की शुरुआत हुई थी जैसे-

(अ) मानसिंह (आमेर का राजा)

(ब) रायसिंह (बीकानेर का राजा)

4. नागौर दरबार के बाद राजस्थान में शांति व्यवस्था स्थापित हुई थी जिससे कलात्मक गतिविधियों को बढ़ावा मिला था।


रायसिंह-

➠अकबर ने बीकानेर के राजकुमार रायसिंह को जोधपुर का प्रशासक बनाया था।

➠रायसिंह बीकानेर के राजा कल्याणमल का बेटा था।

➠1572 ई. से 1574 ई. तक रायसिंह जोधपुर का प्रशासक बना था।


राव चन्द्रसेन की उपाधियां-

1. मारवाड़ का प्रताप

2. प्रताप का अग्रगामी

3. मारवाड़ का भूला बिसरा राजा


विश्वेश्वरनाथ रेऊ-

➠विश्वेश्वरनाथ रेऊ ने राव चन्द्रसेन की तुलना महाराणा प्रताप से की है।

➠विश्वेश्वरनाथ रेऊ ने राव चन्द्रसेन को मारवाड़ का प्रताप कहा है।


राव चन्द्रसेन तथा महाराणा प्रताप में समानताएं-

➠राव चन्द्रसेन तथा महाराणा प्रताप दोनों ने अकबर की अधिनता स्वीकार नहीं की थी।

➠राव चन्द्रसेन तथा महाराणा प्रताप दोनों ने छापामार युद्ध प्रणाली का अनुसरण किया था।

➠राव चन्द्रसेन तथा महाराणा प्रताप दोनों को अपने भाईयों के विरोध का सामना करना पड़ा था। जैसे- राम तथा उदयसिंह ने राव चन्द्रसेन का विरोध किया तथा जगमाल ने महाराणा प्रताप का विरोध किया था।

➠राव चन्द्रसेन तथा महाराणा प्रताप दोनों के अधिकतर राज्य पर अकबर ने अधिकार कर लिया था लेकिन थोड़ी सी भूमि के बल पर दोनों ने अकबर का सामना किया था।

➠राव चन्द्रसेन तथा महाराणा प्रताप दोनों को अपने राज्य के बाहर शरण लेनी पड़ी थी जैसे- महाराणा प्रताप ने छप्पन के मैदान में शरण ली थी तथा राव चन्द्रसेन ने डूंगरपुर के राजा आसकरण के यहां शरण ली थी।

➠छप्पन का मैदान बांसवाड़ा जिले में माही नदी के द्वारा बनाया जाता है।


राव चन्द्रसेन तथा महाराणा प्रताप में असमानताएं-

➠महाराणा प्रताप का मुगल विरोध महाराणा प्रताप के राजतिलक के साथ ही शुरू हो गया था लेकिन राव चन्द्रसेन का मुगल विरोध नागौर दरबार के बाद से शुरू हुआ था।

➠महाराणा प्रताप का मुगल विरोध महाराणा प्रताप के मरने के बाद भी उसके बेटे अमरसिंंह ने जारी रखा था लेकिन राव चन्द्रसेन का मुगल विरोध राव चन्द्रसेन की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गया था।

➠महाराणा प्रताप ने अकबर का प्रत्यक्ष सामना किया था जैसे- हल्दीघाटी के युद्ध में, दिवेर के युद्ध में लेकिन राव चन्द्रसेन ने अकबर का प्रत्यक्ष सामना नहीं किया था।

➠महाराणा प्रताप ने चावंड (उदयपुर) को अपना स्थायी केन्द्र बनाया था लेकिन राव चन्द्रसेन ऐसा कोई केन्द्र स्थापित नहीं कर पाया था।

➠महाराणा प्रताप ने जनता में राष्ट्रवादी भावना का संचार किया था लेकिन राव चन्द्रसेन ऐसा नहीं कर पाया था।


इन सभी असमानताओं के बावजूद भी राव चन्द्रसेन को मारवाड़ का प्रताप कहा जा सकता है। क्योंकि-

1. राव चन्द्रसेन की भौगोलिक परिस्थितियां महाराणा प्रताप की तुलना में प्रतिकुल थी क्योंकि मेवाड़ एक पर्वतीय प्रदेश था जहां छापामार युद्ध प्रणाली से युद्ध लम्बे समय तक किया जा सकता था जबकि मारवाड़ एक मैदानी मरुस्थल था।

2. महाराणा प्रताप को भामाशाह तथा ताराचन्द जैसे दानवीर साथियों का सहारा मिला था लेकिन राव चन्द्रसेन को ऐसे सहयोग की कमी खलती रही थी।


9. उदयसिंह (1583- 1595 ई.)-

➠मारवाड़ के राजा उदयसिंह को मोटा राजा उदयसिंह के नाम से भी जाना जाता है।

➠उदयसिंह मारवाड़ के राजा राव मालदेव का बेटा था तथा राव चन्द्रसेन का भाई थी।

➠उदयसिंह मारवाड़ का पहला राजा था जिसने मुगलों की अधीनता स्वीकार की थी।


मानीबाई-

➠मानीबाई मारवाड़ के राजा मोटा राजा उदयसिंह की बेटी थी।

➠उदयसिंह अपनी राजकुमारी मानीबाई का विवाह मुगल बादशाह जहाँगीर के साथ किया था।

➠उदयसिंह की बेटी मानीबाई को जोधाबाई के नाम से भी जाना जाता है।

➠मानीबाई की उपाधि जगत गोसाई थी।

➠मानीबाई का बेटा खुर्रम (शाहजहाँ) था।


कल्ला रायमलोत-

➠कल्याण सिंह मोटा राजा उदयसिंह के भाई रायमल का बेटा था।

➠रायमल के बेटे कल्याण सिंंह को ही कल्ला रायमलोत के नाम से जाना जाता है।

➠कल्ला रायमलोत सिवाणा (बाड़मेर) का सामंत था।


विशेष- सामेला- बारात का सामने जाकर स्वागत करना ही सामेला कहलाता है।


सिवाणा का दुसरा साका (1589 ई.)-

➠1589 ई. में अकबर ने सिवाणा (बाड़मेर) पर आक्रमण किया था। इस समय सिवाणा का दुसरा साका हुआ था।

➠1589 ई. में अकबर के सिवाणा आक्रमण के समय सिवाणा (बाड़मेर) का राजा कल्ला रायमलोत था।

➠सिवाणा के दुसरे साके के दौरान भान कंवर के नेतृत्व में जौहर किया गया था तथा कल्ला रायमलोत के नेतृत्व में केसरिया किया गया था।

➠भान कंवर की सगाई कल्ला रायमलोत के साथ की गई थी।


पृथ्वीराज राठौड़-

➠पृथ्वीराज राठौड़ बीकानेर के राजा कल्याणमल का बेटा था तथा रायसिंह का भाई था।

➠पृथ्वीराज राठौड़ बीकानेर का राजा था।

➠पृथ्वीराज राठौड़ ने कल्ला रायमलोत के मरसिये लिखे थे।

➠किसी राजा के मरने के बाद उस राजा की वीरता पर लिखे जाने वाले दोहों को मरसिये कहा जाता था।

➠कल्ला रायमलोत ने पृथ्वीराज राठौड़ से अपने मरसिये अपने जीते जी ही लिखवाये थे।


10. महाराजा गजसिंह (1615- 1638 ई.)-

➠महाराजा गजसिंह के बड़े बेटे का नाम अमरसिंह था।

➠महाराजा गजसिंह के छोटे बेटे का नाम जसवंतसिंह था।

➠जहाँगीर ने महाराजा गजसिंह को दलथम्भन की उपाधि दी थी।

➠महाराजा गजसिंह ने अनारा बेगम के कहने पर महाराजा गजसिंह ने अपने छोटे बेटे जसवंतसिंह को जोधपुर का राजा बनाया तथा बड़े बेटे अमरसिंह राठौड़ को नागौर का राजा बनाया था।


अमरसिंह राठौड़-

➠अमरसिंह राठौड़ नागौर का राजा था।

➠अमरसिंह राठौड़ महाराजा गजसिंह का बड़ा बेटा था।

➠शाहजहाँ के दरबार में अमरसिंह ने सलावत खाँ मीर बख्शी को मार दिया था।

➠अमरसिंह राठौड़ को कटार का धणी कहा जाता है।

➠अर्जुन सिंह गौड़ ने अमरसिंह राठौड़ की हत्या कर दी थी।

➠अर्जुन सिंह गौड़ अमरसिंह का साला था।

➠अमरसिंह राठौड़ की छतरी नागौर में स्थित है।

➠अमरसिंह राठौड़ की छतरी 16 खम्भों की छतरी है।

➠आगरा के किले के बुखारा दरवाजा को अमरसिंह दरवाजा कहा जाता है।

➠शाहजहाँ ने बुखारा दरवाजे को बंद करवा दिया था।

➠1809 ई. में अंग्रेज अधिकारी जाॅर्ज स्टील (George Steel) ने बुखारा दरबाजे को खुलवाया था।


मतीरे री राड़ (1644 ई.)-

➠मतीरे री राड़ नागौर को राजा अमरसिंह तथा बीकानेर के राजा कर्णसिंह के मध्य हुई थी।

➠मतीरे री राड़ 1644 ई. में नागौर के जाखणिया गाँव तथा बीकानेर के सीलवा गाँव की सीमा पर हुई थी।

➠इस युद्ध (मतीरे री राड़) में बीकानेर के राजा कर्णसिंह की जीत हुई थी।

➠काशी छंगाणी (काशी छगाणी) की पुस्तक छत्रपति रासौ में मतीरे री राड़ की जानकारी मिलती है।


मतीरे री राड़ का कारण-

➠बीकानेर के सीलवा नामक गाँव में एक खेत में मतीरे की बेल लगी हुई थी लेकिन उस मतीरे की बेल पर मतीरा नागौर के जाखणिया नामक गाँव में लगा हुआ था।


11. महाराजा जसवंतसिंह या महाराजा जसवंतसिंह- I (1638- 1678 ई.)-

➠जसवंतसिंह प्रथम ने मुगल उत्तराधिकारी संघर्ष में भाग लिया था।

➠1662 ई. में मुगल सेनापति शाइस्ता खान की सहायता के लिए औरंगजेब ने महाराजा जसवंतसिंह प्रथम को दक्षिण भारत भेज दिया था।

➠शाइस्ता खान औरंगजेब का मामा था।

➠1673 ई. में औरंगजेब ने महाराजा जसवंतसिंह प्रथम को काबुल (अफगानिस्तान) भेज दिया था।

➠1678 ई. में जमरूढ़ का थाना नामक स्थान पर महाराजा जसवंतसिंह प्रथम की मृत्यु हो गई थी।

➠जमरूढ़ का थाना नामक स्थान अफगानिस्तान के काबुल में स्थित है।

➠महाराजा जसवंतसिंह की मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा था की "आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया"

➠कुफ्र का अर्थ धर्म विरोधी है।


धरमत का युद्ध (1658 ई.)-

➠धरमत का युद्ध 15 अप्रैल 1658 ई. में लड़ा गया था।

➠धरमत का युद्ध मध्यप्रदेश के धरमत नामक स्थान पर लड़ा गया था।

➠धरमत का युद्ध दारा तथा औरंगजेब के मध्य लड़ा गया था।

➠दारा, औरंगजेब तथा मुराद तीनों भाई थे तथा मुगल बादशाह शाहजहाँ के बेटे थे।

➠धरमत के युद्ध में दारा के सेनापति महाराजा जसवंतसिंह प्रथम तथा कासिम खाँ थे।

➠धरमत के युद्ध में औरंगजेब का साथ उसके भाई मुराद ने दिया था।

➠धरमत का युद्ध मुगल उत्तराधिकारी संघर्ष के लिए लड़ा गया था।

➠धरमत के युद्ध में औरंगजेब की जीत हुई थी।

➠धरमत के युद्ध में युद्ध से पहले ही दारा का सेनापति कासिम खाँ औरंगजेब के साथ मिल गया था।

➠धरमत के युद्ध में घायल होने के कारण महाराजा जसवंतसिंह प्रथम वापस जोधपुर चला गया था।

➠धरमत के युद्ध के समय महाराजा जसवंतसिंह प्रथम की हाड़ी रानी जसवंत दे ने किले के दरबाजे बंद करवा दिया थे। अर्थात् महाराजा जसवंतसिंह प्रथम को किले में प्रवेश नहीं करने दिया था।


सामूगढ़ का युद्ध-

➠सामूगढ़ के युद्ध में जीतने के बाद औरंगजेब मुगल बादशाह बना था।

➠औरंगजेब के मुगल बादशाह बनते ही आमेर का राजा मिर्जा राजा जयसिंह औरंगजेब के पक्ष में आ गया था अर्थात् मिर्जा राजा जयसिंह ने औरंगजेब के साथ संधि कर ली थी।

➠मिर्जा राजा जयसिंह के कहने पर महाराजा जसवंतसिंह प्रथम भी औरंगजेब के पक्ष में आ गया था।


खजुआ का युद्ध (1659 ई.)- 

➠खजुआ का युद्ध 5 जनवरी 1659 ई. में लड़ा गया था।

➠खजुआ नामक स्थान उत्तर प्रदेश राज्य के इलाहाबाद के निकट स्थित है।

➠खजुआ का युद्ध औरंगजेब तथा शाह शुजा के मध्य लड़ा गया था।

➠खजुआ के युद्ध में औरंगजेब की जीत हुई थी।

➠खजुआ के युद्ध में औरंगजेब का सेनापति महाराजा जसवंतसिंह प्रथम था।

➠खजुआ के युद्ध के दौरान महाराजा जसवंतसिंह प्रथम शाह शुजा के साथ मिल गया था तथा महाराजा जसवंतसिंह प्रथम ने औरंगजेब का सेनिक शिविर लूट लिया था।

➠शाह शुजा औरंगजेब का भाई तथा मुगल बादशाह शाहजहाँ का बेटा था।


पृथ्वी सिंह-

➠पृथ्वी सिंह महाराजा जसवंतसिंह प्रथम को बेटा था।

➠पृथ्वी सिंह ने शेर के साथ मुकाबला (युद्ध) किया था।

➠औरंगजेब ने पृथ्वी सिंह को जहरीले कपड़े देकर मरवा दिया था।


अजीत सिंह तथा दलथम्भन-

➠अजीत सिंह तथा दलथम्भन दोनों महाराजा जसवंतसिंह प्रथम के बेटे थे।

➠औरंगजेब ने अजीत सिंह तथा दलथम्भन  को दिल्ली में रूपसिंह राठौड़ की हवेली में नजरबंद कर दिया था।

➠रूपसिंह राठौड़ की हवेली किशनगढ़ के राजा रूपसिंह की हवेली थी।

➠बीमारी के कारण महाराजा जसवंतसिंह प्रथम के बेटे दलथम्भन के मृत्यु दिल्ली में रूपसिंह राठौड़ की हवेली में हो गयी थी।

➠महाराजा जसवंतसिंह प्रथम का बेटा अजीत सिंह मारवाड़ का राजा बना था।


महाराजा जसवंतसिंह प्रथम की सांस्कृतिक उपलब्धियां-

➠महाराजा जसवंतसिंह प्रथम ने महाराष्ट्र में जसवंतपुरा नामक नगर की स्थापना की थी।

➠महाराजा जसवंतसिंह प्रथम ने जोधपुर में अनार के बगीचे लगवाये थे।

➠महाराजा जसवंतसिंह प्रथम की रानी जसवंत दे ने राईका बाग महल का निर्माण करवाया था।

➠राईका बाग का महल राजस्थान के जोधपुर जिले के राईका बाग नामक स्थान पर स्थित है।

➠महाराजा जसवंतसिंह प्रथम की रानी अतिरंग दे ने जोधपुर में शेखावत जी रो तालाब का निर्माण करवाया था।


महाराजा जसवंतसिंह प्रथम की पुस्तके-

1. आनन्द विलास

2. भाषा भूषण

3. प्रबोध चन्द्रोदय

4. अपरोक्ष सिद्धान्तसार


महाराजा जसवंतसिंह प्रथम के दरबार में दरबारी विद्वान-

1. नरहरिदास

2. नवीन

3. मुहणौत नैणसी


1. नरहरिदास-

➠महाराजा जसवंतसिंह प्रथम के दरबारी विद्वान नरहरिदास ने अवतार चरित्र नामक पुस्तक लिखी थी।


2. नवीन-

➠महाराजा जसवंतसिंह प्रथम के दरबारी विद्वान नवीन ने नेहनिधान नामक पुस्तक लिखी थी।


3. मुहणौत नैणसी-

➠मुहणौत नैणसी महाराजा जसवंतसिंह प्रथम का दीवान था।

➠हिसाब में गलती का आरोप लगने के कारण महाराजा जसवंतसिंह प्रथम ने मुहणौत नैणसी तथा उसके भाई सुन्दरदास को जेल में बद कर दिया था।

➠मुहणौत नैणसी ने अपने भाई सुन्दरदास के साथ जेल में आत्महत्या कर ली थी।

➠मुंशी देवी प्रसाद ने मुहणौत नैणसी को राजपूताने का अबुल फजल कहा था।

➠मुहणौत नैणसी के द्वारा लिखी गई पुस्तके निम्नलिखित है-

(I) नैणसी री ख्यात

(II) मारवाड़ रा परगना री विगत

➠मारवाड़ के राजा जसवंतसिंह प्रथम की अनुस्थित में मारवाड़ राज्य का शासन मुहणौत नैणसी के द्वारा चलाया जाता था।


(I) नैणसी री ख्यात-

➠नैणसी री ख्यात नामक पुस्तक मुहणौत नैणसी के द्वारा लिखी गई थी।

➠नैणसी री ख्यात राजस्थान की पहली ख्यात है।


(II) मारवाड़ रा परगना री विगत-

➠मारवाड़ रा परगना री विगत नामक पुस्तक मुहणौत नैणसी के द्वारा लिखी गई थी।

➠मारवाड़ रा परगना री विगत को मारवाड़ का गजट भी कहा जाता है।

➠मारवाड़ रा परगना री विगत नामक पुस्तक में जनगणना की जानकारी मिलती है।


इन्द्र सिंह राठौड़-

➠इन्द्र सिंह राठौड़ नागौर का राजा था।

➠अमर सिंह राठौड़ इन्द्र सिंह राठौड़ का दादा था।

➠औरंगजेब ने 36 लाख रुपये लेकर इन्द्र सिंह राठौड़ को जोधपुर सौंप दिया था लेकिन जोधपुर की जनता ने इन्द्र सिंह राठौड़ को राजा स्वीकार नहीं किया था।


12. महाराजा अजीत सिंह (1679- 1724 ई.)-

➠मुकुंद दास खींची तथा गौरा धाय के साथ मिलकर दुर्गादास राठौड़ महाराजा अजीत सिंह को लेकर मारवाड़ आये थे।

➠महाराजा अजीत सिंह को कालिन्द्री नामक गाँव में जयदेव पुरोहित के घर रखा गया था।

➠कालिन्द्री नामक गाँव राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित है।

➠औरंगजेब ने नकली अजीत सिंह का नाम बदलकर मुहम्मदीराज रख दिया था।

➠औरंगजेब ने नकली अजीत सिंह को अपनी बेटी जेबुन्निसा को सौंप दिया था।

➠मेवाड़ महाराणा राजसिंह ने अजीत सिंह को समर्थन दिया था।

➠1708 ई. में देबारी समझौते के बाद महाराजा अजीत सिंह मारवाड़ का राजा बना था।

➠महाराजा अजीत सिंह के बड़े बेटे अभय सिंह के कहने पर छोटे बेटे बख्त सिंह ने अपने पिता महाराजा अजीत सिंह की हत्या कर दी थी।

➠महाराजा अजीत सिंह के अंतिम संस्कार में कई पशु पक्षी जलकर मर गये थे।


इन्द्र कंवर-

➠इन्द्र कंवर मारवाड़ के महाराजा अजीत सिंह की बेटी थी।

➠महाराजा अजीत सिंह ने अपनी राजकुमारी इन्द्र कंवर का विवाह मुगल बादशाह फर्रुखसियर के साथ किया था।

➠इन्द्र कंवर अंतिम हिन्दू राजकुमारी थी जिसका विवाह किसी मुगल बादशाह के साथ किया गया था। अर्थात् इन्द्र कंवर के विवाह के बाद किसी भी हिन्दू राजकुमारी का विवाह मुगल बादशाह के साथ नहीं किया गया था।


गौर धाय-

➠महाराजा अजीत सिंह का पालन पोषण गौरा धाय ने किया था।

➠गौरा धाय को मारवाड़ की पन्ना धाय कहा जाता है।

➠गौरा धाय का नाम मारवाड़ के राष्ट्रगान धूंसो में लिया जाता था।

➠गौरा धाय की छतरी जोधपुर में स्थित है।

➠राजस्थान सरकार के द्वारा गौरा धाय के नाम से एक योजना भी शुरू की जा चुकी है। जिसे गौरा धाय ग्रुप फोस्टर केयर योजना कहा जाता है।


गौरा धाय ग्रुप फोस्टर केयर योजना 2021

➠गौरा धाय ग्रुप फोस्टर केयर योजना की शुरुआत 23 अप्रैल 2021 को की गई थी।

➠गौरा धाय ग्रुप फोस्टर योजना मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के द्वारा शुरू की गई है।

➠गौरा धाय ग्रुप फोस्टर योजना राजस्थान में अनाथ एवं उपेक्षित बच्चों की देखरेख, संरक्षण एवं पुनर्वास के लिए शुरू की गई है।

➠गौरा धाय ग्रुप फोस्टर योजना राजस्थान में जिला स्तर पर शुरू की गई है।

➠गौरा धाय ग्रुप फोस्टर योजना का संचालन राजस्थान के सभी जिला मुख्यालयों पर एनजीओ तथा सिविल सोसायटी के सहयोग से किया जायेगा।


देबारी का युद्ध (1680 ई.)-

➠देबारी नामक स्थान राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित है।

➠देबारी के युद्ध में औरंगजेब ने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह तथा मारवाड़ के दुर्गादास राठौड़ की संयुक्त सेना को हराया था।


अकबर-

➠अकबर मुगल बादशाह औरंगजेब का बेटा था।

➠दुर्गादास राठौड़ तथा महाराणा राजसिंह ने औरंगजेब के बेटे अकबर को औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह के लिए उकसाया था।

➠1 जनवरी 1681 ई. को औरंगजेब के बेटे अकबर ने नाडौल (पाली) में खुद को मुगल बादशाह घोषित कर लिया था।

➠औरंंगजेब की चालाकी के कारण दुर्गादास राठौड़ तथा अकबर को दक्षिण भारत में शंभाजी के पास जाना पड़ा था।

➠शंभाजी छत्रपति शिवाजी का बेटा था।


बुलन्द अख्तर तथा सफीयतुनिस्सा-

➠बुलन्द अख्तर अकबर को बेटा था तथा सफीयतुनिस्सा अकबर की बेटी थी।

➠बुलन्द अख्तर तथा सफीयतुनिस्सा दोनों का पालन पोषण दुर्गादास राठौड़ ने किया था।

➠ईश्वरदास नागर के कहने पर दुर्गादास राठौड़ ने बुलन्द अख्तर तथा सफीयतुनिस्सा दोनों को अकबर के पिता औरंगजेब को सौंप दिया था।

➠मुगल बादशाह औरंगजेब बुलन्द अख्तर तथा सफीयतुनिस्सा का दादा था।


महाराजा अजीत सिंह के द्वारा लिखी गई पुस्तके-

1. गुण सागर

2. दुर्गा पाठ भाषा

3. निर्वाण रा दूहा


दुर्गादास राठौड़-

➠दुर्गादास राठौड़ का जन्म राजस्थान के जोधपुर जिले के सालवा नामक स्थान पर हुआ था।

➠दुर्गादास राठौड़ के पिता का नाम आसकरण था।

➠दुर्गादास राठौड़ की माता का नाम नेत कंवर था।

➠दुर्गादास राठौड़ को जोधपुर की लूणेवा जागीर दी गई थी।

➠महाराजा अजीत सिंह को राजा बनाने के लिए दुर्गादास ने मुगलों के खिलाफ 1678 ई. से 1708 ई. तक लगातार 30 वर्षों तक संघर्ष किया था। इसे मारवाड़ के राठौड़ों का 30 वर्षीय संघर्ष कहा जाता है।

➠महाराजा अजीत सिंह ने दुर्गादास राठौड़ को देशनिकाला दे दिया था। अर्थात् महाराजा अजीत सिंह ने दुर्गादास राठौड़ को मारवाड़ से बाहर निकाल दिया था।

➠मारवाड़ से बाहर निकालने के बाद दुर्गादास राठौड़ मेवाड़ चला गया था।

➠मेवाड़ में दुर्गादास राठौड़ को विजयपुर जागीर दी गई थी।

➠बाद में दुर्गादास राठौड़ को रामपुरा परगने का हाकिम बना दिया गया था।

➠जिस व्यक्ति को परगना दिया जाता है उस व्यक्ति को उस क्षेत्र या परगने का हाकिम कहा जाता है।

➠रामपुरा नामक स्थान मध्य प्रदेश के मालवा में स्थित है।

➠1718 ई. में मध्य प्रदेश के उज्जैन में दुर्गादास राठौड़ की मृत्यु हो गई थी।

➠दुर्गादास राठौड़ की छतरी क्षिप्रा नदी के किनारे उज्जैन (मध्य प्रदेश) में स्थित है।

➠दुर्गादास राठौड़ की उपाधियां-

1. राठौड़ों का यूलीसेस (कर्नल जेम्स टाॅड के अनुसार)

2. राजपूताने का गौरी बाल्डी

3. मारवाड़ का अणबिन्धिया मोती


1. राठौड़ों का यूलीसेस-

➠कर्नल जेम्स टाॅड ने दुर्गादास राठौड़ को राठौड़ों का यूलीसेस कहा है।


2. राजपूताने का गौरी बाल्डी-

➠दुर्गादास राठौड़ को राजपूताने का गौरी बाल्डी कहा जाता है।


3. मारवाड़ का अणबिन्धिया मोती-

➠दुर्गादास राठौड़ को मारवाड़ का अणबिन्धिया मोती कहा जाता है।


जोधपुर का इतिहास द्वितीय संस्करण-

➠इतिहासकार गौरी शंकर हीराचन्द औझा ने अपनी पुस्तक जोधपुर का इतिहास का द्वितीय संस्करण दुर्गादास राठौड़ को समर्पित किया है।


खालसा-

➠राज्य के सबसे बड़े भूमि क्षेत्र को खालसा कहा जाता था।

➠खालसा राजा के पास होता था।


परगना-

➠राज्य में खालसा को कई भागों में बाटा जाता था जिसे परगना कहा जाता था। अर्थात् खालसा के बाद जो बड़ा भूमि क्षेत्र होता था उसे परगना कहा जाता था।

➠जिसके व्यक्ति के पास परगना होता था उस व्यक्ति को हाकिम कहा जाता था।


जागीर-

➠परगने से भी छोटे भूमि क्षेत्र को जागीर कहा जाता था।

➠जिस व्यक्ति के पास जागीर होती थी उसे जागीरदार कहा जाता था।


13. महाराजा अभय सिंह (1724- 1749 ई.)-


अहमदाबाद का युद्ध-

➠अहमदाबाद गुजराज राज्य में स्थित जगह का नाम है।

➠अहमदाबाद का युद्ध मारवाड़ के महाराजा अभय सिंह तथा गुजरात के गवर्नर सर बुलन्द खाँ के बीच हुआ था।

➠अहमदाबाद के युद्ध में महाराजा अभय सिंह ने सर बुलन्द खाँ को हराया था।


खेजड़ली घटना (जोधपुर)-

➠महाराजा अभय सिंह के शासन काल में हाकिम गिरधारी दास ने जोधपुर के खेजड़ली में पेड़ कटवाने के आदेश दिये थे।

➠खेजड़ली के इन पेड़ों को बचाने के लिए 12 सितम्बर 1730 ई. को अमृतादेवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोग शहीद हो गये थे।

➠खेजड़ली घटना विक्रम संवत 1787 भाद्रपद शुक्ला दशमी के दिन जोधपुर के खेजड़ली नामक स्थान पर हुई थी।

➠खेजड़ली घटना में शहीद हुई 363 लोगों में 294 पुरुष तथा 69 महिलाएं थी।

➠इस घटना को खेजड़ली घटना या खेजड़ली आंदोलन कहा जाता है।

➠पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अमृता देवी बिश्नोई के नाम पर अमृता देवी बिश्नोई पुरस्कार भी दिया जाता है।

➠खेजड़ली घटना की याद में जोधपुर के खेजड़ली नामक स्थान पर प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ला दशमी के दिन वृक्ष मेला आयोजित किया जाता है।

➠खेजड़ली का वृक्ष मेला विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला है।


महाराजा अभय सिंह के दरबारी विद्वान-

1. करणीदास

2. वीरभाण


1. करणीदास-

➠करणीदास महाराजा अभय सिंह का दरबारी विद्वान था।

➠करणीदास के द्वारा सूरज प्रकास नामक पुस्तक लिखी गई थी।

➠सूरज प्रकास नामक पुस्तक को बिडद सिणगार के नाम से भी जाना जाता है।

➠सूरज प्रकास नामक पुस्तक से महाराजा अभय सिंह के अहमदाबाद (गुजरात) युद्ध की जानकारी मिलती है।


2. वीरभाण-

➠वीरभाण महाराजा अभय सिंह का दरबारी विद्वान था।

➠वीरभाण ने राजरूपक नामक पुस्तक लिखी थी।

➠राजरूपक नामक पुस्तक से महाराजा अभय सिंह के अहमदाबाद (गुजरात) युद्ध की जानकारी मिलती है।


14. महाराजा मानसिंह (1803- 1843 ई.)-

➠महाराजा मानसिंह जब जालौर में था तब गोरख संप्रदाय के पायस देवनाथ ने महाराजा मानसिंह के राजा बनने की भविष्यवाणी की थी।

➠महाराजा मानसिंह ने राजा बनने के बाद गोरख संप्रदाय के पायस देवनाथ को अपना गुरु बनाया था।

➠महाराजा मानसिंह ने जोधपुर में नाथ संप्रदाय की प्रधान पीठ 'महामंदिर' का निर्माण करवाया था।

➠महाराजा मानसिंह ने 'नाथ चरित्र' नामक पुस्तक लिखी थी।

➠महाराजा मानसिंह को सन्न्यासी राजा कहा जाता था।

➠महाराजा मानसिंह ने जोधपुर के मेहरानगढ़ में 'मान पुस्तक प्रकास' नामक पुस्तकालय की स्थापना करवायी थी।

➠'मान पुस्तक प्रकाश' पुस्तकालय को वर्तमान में मानसिंह पुस्तक प्रकास केन्द्र कहा जाता है।

➠अमीर खाँ के कुकृत्यों से परेशान होकर महाराजा मानसिंह ने 6 जनवरी 1818 को अंग्रेजों के साथ संधि कर ली थी।

➠1827 ई. में महाराजा मानसिंह ने नागपुर के राजा आपा साहिब भौंसले को अंग्रेजों के खिलाफ शरण दी थी।

➠1832 ई. में महाराजा मानसिंह ने लार्ड विलियम बैंटिक के अजमेर दरबार में भाग नहीं लिया था अर्थात् विलियम बैंटिक के अजमेर दरबार का बहिष्कार किया था।


गिंगोली का युद्ध या परबतसर का युद्ध (नागौर)-

मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की राजकुमारी कृष्णाकुमारी से विवाह को लेकर आमेर के राजा जगतसिंह के साथ 13 मार्च 1807 ई. को गिंगोली का युद्ध हुआ था।

➠गिंगोली के युद्ध में महाराजा मानसिंह की हार हुई थी। तथा जयपुर का राजा जगतसिंह जीत गया था।


महाराजा मानसिंह का दरबारी विद्वान-

1. कविराज बांकीदास जी


1. कविराज बांकीदास जी-

➠कविराज बांकीदास जी महाराजा मानसिंह का दरबारी विद्वान था।

➠कविराज बांकीदास के द्वारा निम्नलिखित पुस्तके लिखी गई थी।

(I) बांकीदास री ख्यात

(II) मान जसो मंडन

(III) दातार बावनी

(IV) क्रुकवि बत्तीसी

(V) आयो अंग्रेज मुल्क रै ऊपर


(V) आयो अंग्रेज मुल्क रै ऊपर-

➠आयो अंग्रेज मुल्क रै ऊपर नामक पुस्तक कविराज बांकीदास जी के द्वारा लिखी गई थी।

➠आयो अंग्रेज मुल्क रै ऊपर गीत के माध्यम से कविराज बांकीदास जी ने अंग्रेजों का साथ देने वाले राजाओं की आलोचना की थी।


विशेष- गुलाबराय-

➠जोधपुर के महाराजा विजयसिंह की प्रेमिका गुलाबराय को जोधपुर की नूरजहाँ कहा जाता है।

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