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ऋग्वैदिक काल

ऋग्वैदिक काल (Rigvedic Period)

( 1500 BCE - 1000 BCE)


ऋग्वैदिक काल (Rigvedic Period)-

➠1500 ई.पू. से लेकर 1000 ई.पू. तक के काल या समय को ऋग्वैदिक काल कहा जाता है।

➠विंटरनित्ज ने ऋग्वैदिक काल के समय या ऋग्वैदिक काल का निर्धारण किया है।


ऋग्वैदिक काल में आर्यों की स्थिति-

1. ऋग्वैदिक काल में आर्यों की भौगोलिक स्थिति

2. ऋग्वैदिक काल में आर्यों की राजनीतिक स्थिति

3. ऋग्वैदिक काल में आर्यों की आर्थिक स्थिति

4. ऋग्वैदिक काल में आर्यों की सामाजिक स्थिति

5. ऋग्वैदिक काल में आर्यों की धार्मिक स्थिति


1. आर्यों की भौगोलिक स्थिति-

➠निम्नलिखित ने आर्यों की भौगोलिक स्थित विभिन्न क्षेत्रों को माना है।

(I) दयानन्द सरस्वती

(II) बाल गंगाधर तिलक

(III) डाॅ. पेंका एवं हर्ट

(IV) गंगाधर झा

(V) मैक्समूलर

(VI) एल.डी. कल्ला


(I) दयानन्द सरस्वती-

➠दयानन्द सरस्वती के अनुसार आर्य तिब्बत से आये थे।


(II) बाल गंगाधर तिलक-

➠बाल गंगाधर तिलक के अनुसार आर्य उत्तरी ध्रुव से आये थे।

➠बाल गंगाधर तिलक के द्वारा निम्नलिखित पुस्तके लिखी गई थी।-

(A) The Arctic Home of Aryans

(B) The Orion

(C) श्री भगवत गीता सार रहस्य (गीतारहस्य)


(III) डाॅ. पेंका एवं हर्ट-

➠डाॅ. पेंका एवं हर्ट के अनुसार आर्य जर्मनी से आये थे।


(IV) गंगाधर झा-

➠गंगाधर झा के अनुसार आर्य मध्य भारत से आये थे।


(V) मैक्समूलर-

➠मैक्समूलर के अनुसार आर्य मध्य एशिया से आये थे।

➠सर्वाधिक मान्यमत यह है की आर्य मध्य एशिया से आये थे।


(VI) एल.डी. कल्ला-

➠एल.डी. कल्ला के अनुसार आर्य कश्मीर से आये थे।


बोगाजकोई अभिलेख-

➠बोगाजकोई अभिलेख मध्य एशिया के बोगजकोई नामक स्थान से प्राप्त हुआ है।

➠बोगाजकोई नामक स्थान एशिया माइनर (तुर्की) में स्थित है।

➠बोगाजकोई अभिलेख लगभग 1400 ई.पू. का अभिलेख है।

➠बोगाजकोई अभिलेख में चार वैदिक देवताओं के नाम मिलते है जैसे-

(A) इन्द्र

(B) वरुण

(C) मित्र

(D) नासत्य


➠आर्य आरम्भ में सप्त सैंधव प्रदेश में बस गये थे।

➠सिंधु नदी आर्यों के लिए सबसे महत्वपूर्ण नदी थी।

➠सरस्वती नदी आर्यों की सबसे पवित्र नदी थी।

➠ऋग्वेद के नदी सूक्त में सरस्वती नदी को नदीतमा कहा गया है।

➠ऋग्वेद में सिंधु नदी की 5 सहायक नदियों का उल्लेख किया गया है। जैसे-

(I) बिपाशा नदी या बिपाश नदी

(II) सतुद्री नदी

(III) वितस्ता नदी

(IV) पुरूष्णी नदी

(V) अस्किनी नदी


(I) बिपाशा नदी या बिपाश नदी-

➠बिपाशा नदी सिंधु नदी की सहायक नदी है।

➠ऋग्वेद में व्यास नदी का प्राचीन नाम बिपाशा लिखा गया है।

➠बिपाशा नदी का आधुनिक नाम या वर्तमान नाम व्यास नदी है। 


(II) सतुद्री नदी-

➠सतुद्री नदी सिंधु नदी की सहायक नदी है।

➠ऋग्वेद में सतलज नदी का प्राचीन नाम सतुद्री नदी लिखा गया है।

➠सतुद्री नदी का आधुनिक नाम या वर्तमान नाम सतलज नदी है।


(III) वितस्ता नदी-

➠वितस्ता नदी सिंधु नदी की सहायक नदी है।

➠ऋग्वेद में झेलम नदी का प्राचीन नाम वितस्ता नदी लिखा गया है।

➠वितस्ता नदी का आधुनिक नाम या वर्तमान नाम झेलम नदी है।


(IV) पुरूष्णी नदी-

➠पुरूष्णी नदी सिंधु नदी की सहायक नदी है।

➠ऋग्वेद में रावी नदी का प्राचीन नाम पुरूष्णी नदी लिखा गया है।

➠पुरूष्णी नदी का आधुनिक नाम या वर्तमान नाम रावी नदी है।


(V) अस्किनी नदी-

➠अस्किनी नदी सिंधु नदी की सहायक नदी है।

➠ऋग्वेद में चिनाब नदी का प्राचीन नाम अस्किनी नदी लिखा गया है।

➠अस्किनी नदी का आधुनिक नाम या वर्तमान नाम चिनाब नदी है।


➠ऋग्वेद में अफगानिस्तान की नदियों का भी उल्लेख किया गया है। जैसे-

(I) गोमल नदी या गुम्ल नदी

(II) क्रुमू नदी या कुरुम नदी

(III) कुभा नदी

(IV) सुवास्तु नदी (सवास्तु नदी)


(I) गोमल नदी या गुम्ल नदी-

➠गोमल नदी अफगानिस्तान में सिंधु नदी की सहायक नदी है।

➠ऋग्वेद में गोमती नदी का प्राचीन नाम गोमल नदी लिखा गया है।

➠गोमल नदी का आधुनिक नाम या वर्तमान नाम गोमती नदी है।


(II) क्रुमू नदी या कुरुम नदी-

➠क्रुमू नदी अफगानिस्तान में सिंधु नदी की सहायक नदी है।

➠ऋग्वेद में कुर्रम नदी का प्राचीन नाम क्रुमू नदी लिखा गया है।

➠क्रुमू नदी का आधुनिक नाम या वर्तमान नाम कुर्रम नदी है।


(III) कुभा नदी-

➠कुभा नदी अफगानिस्तान में सिंधु नदी की सहायक नदी है।

➠ऋग्वेद में काबुल नदी का प्राचीन नाम कुभा नदी लिखा गया है।

➠कुभा नदी का आधुनिक नाम या वर्तमान नाम काबुल नदी है।


(IV) सुवास्तु नदी (सवास्तु नदी)-

➠सुवास्तु नदी अफगानिस्तान में सिंधु नदी की सहायक नदी है।

➠ऋग्वेद में स्वात नदी का प्राचीन नाम सुवास्तु नदी लिखा गया है।

➠सुवास्तु नदी का आधुनिक नाम या वर्तमान नाम स्वात नदी है।


➠ऋग्वेद में गंगा नदी तथा सरयू नदी का उल्लेख एक बार किया गया है।

➠ऋग्वेद में यमुना नदी का उल्लेख तीन बार किया गया है।

➠ऋग्वेद में हिमालय पर्वत तथा हिमालय पर्वत की एक चोटी मुजवंत का उल्लेख किया गया है। अर्थात् ऋग्वेद में मुजवंत पर्वतमाला का उल्लेख किया गया है।


2. ऋग्वैदिक काल में आर्यों की राजनीतिक स्थिति-

➠ऋग्वैदिक काल में राजा का पद वंशानुगत नहीं होता था।

➠ऋग्वैदिक काल में राजा को जनस्य गोप या गोप या गोप्ता कहा जाता था।

➠ऋग्वैदिक काल के बाद में गोप का पद वंशानुगत हो गया था।

➠ऋग्वैदिक काल में राजा के पास स्थायी सेना नहीं होती थी।

➠ऋग्वैदिक काल में अधिकतर लड़ाईया जानवरों या पशुओं के लिए लड़ी जाती थी।

➠ऋग्वैदिक काल में राजा की सहायता के लिए कुछ संस्थाएं होती थी जैसे-

(I) विदथ

(II) सभा

(III) समिति


(I) विदथ-

➠विदथ भारत की सबसे प्राचीन संस्था मानी जाती है।

➠विदथ आर्यों की सबसे प्राचीन संस्था थी। अर्थात् विदथ ऋग्वैदिक काल की सबसे प्राचीन संस्था थी।

➠विदथ संस्था धन या लूट के समान का बटवारा करती थी।

➠ऋग्वेद में विदथ का उल्लेख सबसे ज्यादा बार (122 बार) हुआ है।

➠विदथ संस्था में स्त्री तथा पुरुष दोनों शामित होते थे।


(II) सभा-

➠सभा संस्था में वरिष्ठ एवं कुलीन लोगों शामिल थे। अर्थात् ऋग्वैदिक काल में सभा वरिष्ठ एवं कुलीन लोगों का एक समूह था।

➠ऋग्वेद में सभा संस्था का उल्लेख 8 बार किया गया है।


(III) समिति-

➠समिति ऋग्वैदिक काल की एक संस्था थी।

➠समिति संस्था जनप्रतिनिधियों का समूह था।

➠ऋग्वेद में समिति संस्था का उल्लेख 9 बार किया गया है।

➠ऋग्वैदिक काल में समिति संस्था के प्रमुख या प्रधान को ईशान कहा जाता था।


ऋग्वैदिक काल में राजा की सहायता के लिए 12 मंत्री होते थे इन मंत्रियों को रत्निन कहा जाता था। जिसमें कुछ प्रमुख रत्निन निम्नलिखित है।-

(I) पुरोहित

(II) युवराज

(III) सैनानी

(IV) ब्राजपति या व्रजापति

(V) सुत

(VI) पालागल

(VII) भागदूध


(I) पुरोहित-

➠ऋग्वैदिक काल में राजा के प्रमुख परामर्शदाता को पुरोहित कहा जाता था।


(II) युवराज-

➠ऋग्वैदिक काल में राजा के बेटे को युवराज कहा जाता था। अर्थात् युवराज राजा के पद का उत्तराधिकारी होता था।


(III) सैनानी-

➠ऋग्वैदिक काल में सेना के प्रमुख को सैनानी कहा जाता था।


(IV) ब्राजपति या व्रजापति-

➠ऋग्वैदिक काल में गोचर भूमि के प्रमुख को ब्राजपति या व्रजापति कहा जाता था।


(V) सुत-

➠ऋग्वैदिक काल में रथ सेना के प्रमुख को सुत कहा जाता था। अर्थात् राजा के सारथी को सुत कहा जाता था।


(VI) पालागल-

➠ऋग्वैदिक काल में राजा के मित्र या दूत को पालागल कहा जाता था।


(VII) भागदूध-

➠ऋग्वैदिक काल में राजस्व अधिकारी को भागदूध कहा जाता था।


बलि-

➠ऋग्वैदिक काल में राजा को दिये जाने वाले स्वैच्छिक कर को बलि कहा जाता था।


प्रश्नविनाक-

➠ऋग्वैदिक काल में न्यायधीश को प्रश्नविनाक कहा जाता था। अर्थात् ऋग्वैदिक काल में समस्या हल करने वाले को प्रश्नविनाक कहा जाता था।


स्पश-

➠ऋग्वैदिक काल में गुप्तचर को स्पश कहा जाता था।

 

ऋग्वैदिक काल की राजनीतिक इकाइयां-

➠ऋग्वैदिक काल में क्रमशः निम्नलिखित राजनीतिक इकाइयां होती थी।-

(I) जन

(II) विश

(III) ग्राम

(IV) कुल


(I) जन-

➠ऋग्वैदिक काल में सबसे बड़ी राजनीतिक इकाई जन होती थी।

➠ऋग्वैदिक काल में जन के प्रमुख को गोप (राजन) कहा जाता था।

➠ऋग्वैदिक काल में अनेक विश को मिलाकर जन बनता था।


(II) विश-

➠ऋग्वैदिक काल में जन के बाद दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक इकाई विश होती थी।

➠ऋग्वैदिक काल में विश के प्रमुख को विशपति कहा जाता था।

➠ऋग्वैदिक काल में अनेक ग्राम को मिलाकर विश बनता था।


(III) ग्राम-

➠ऋग्वैदिक काल में विश के बाद तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक इकाई ग्राम थी।

➠ऋग्वैदिक काल में ग्राम के प्रमुख को ग्रामणी कहा जाता था।

➠ऋग्वैदिक काल में अनेक कुल (परिवार) को मिलाकर ग्राम बनता था।


(IV) कुल-

➠ऋग्वैदिक काल में सबसे छोटी राजनीतिक इकाई कुल थी।

➠ऋग्वैदिक काल में कुल (परिवार) के प्रमुख को कुलप या गृहपति कहा जाता था।


3. ऋग्वैदिक काल में आर्यों की आर्थिक स्थिति-

➠ऋग्वैदिक काल में आर्य यायावर जीवन व्यतीत करते थे।

➠यायावर धुमने वाले लोगों का कहा जाता है। अर्थात् जो धुम धुम कर जीवन व्यतीत करते हो उन्हें यायावर कहा जाता है।

➠ऋग्वैदिक काल में घोड़ा एवं गाय आर्यों के प्रिय पशु थे।

➠ऋग्वैदिक काल में आर्य पशुपाल भी कहते थे।

➠ऋग्वेद में कृषि शब्द का उल्लेख मात्र 24 बार मिलता है। जिसमें से 21 शब्द क्षेपक है। अर्थात् ऋग्वेद में कृषि शब्द 21 बार बाद में लिखे गये है।

➠ऋग्वैदिक काल में आर्यों में मुद्रा प्रणाली नहीं थी।

➠ऋग्वैदिक काल में आर्यों में वस्तु विनिमय होता था।

➠ऋग्वैदिक काल में आर्य व्यापर में निस्क नामक सोने के जवाहरात (सिक्का या मोहर) का प्रयोग किया करते थे।


4. ऋग्वैदिक काल में आर्यों की सामाजिक स्थिति-

➠ऋग्वैदिक काल में आर्यों में पितृसत्तात्मक संयुक्त परिवार प्रणाली थी।

➠ऋग्वैदिक काल में आर्यों में वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित थी।

➠ऋग्वेद के 10वें मंडल के पुरुष सूक्त में वर्ण व्यवस्था का वर्णन किया गया है।

➠ऋग्वैदिक काल में आर्यों में जाति व्यवस्था तथा सामाजिक असमानता नहीं थी।

➠ऋग्वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति अच्छी थी। अर्थात् ऋग्वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा का अधिकार था।

➠घोषा, सिकता, अपाला, लोपामुद्रा आदि ऋग्वैदिक काल में विदुषी महिलाएं थी।

➠ऋग्वैदिक काल में विशफला एक योद्धा महिला थी।

➠ऋग्वैदिक काल में दहेज का कोई प्रावधान नहीं था।

➠ऋग्वैदिक काल में शादी के समय जो उपहार दुल्हन को दिया जाता था उसे वहतु कहा जाता था।

➠ऋग्वैदिक काल में बाल विवाह का कोई उदाहरण नहीं मिलता है।

➠ऋग्वैदिक काल में विधवा पुनर्विवाह होता था।

➠ऋग्वैदिक काल में नियोग प्रथा का प्रचलन था।

नियोग प्रथा- ऋग्वैदिक काल में पति के द्वारा संतान उत्पन्न न होने या पति की अकाल मृत्यु हो जाने पर पत्नी अपने देवर या अन्य व्यक्ति से गर्भाधान करा सकती है इस प्रथा को ही नियोग प्रथा कहते है।

➠नियोग प्रथा केवल संतान प्राप्ति के लिए ही थी।

➠ऋग्वैदिक काल में जो महिलाएं शिक्षा के लिए कभी विवाह नहीं करती थी उन महिलाओं को अमाजू कहा जाता था।

➠ऋग्वैदिक काल में महिलाओं के साथ समान व्यवहार होता था।

➠ऋग्वैदिक काल में अंतर्राष्ट्रीय विवाह भी होते थे।

➠ऋग्वेद में दास या दासता का उल्लेख किया गया है।

➠ऋग्वैदिका काल में आर्य बुद्धिमान और यौद्धा थे।


5. ऋग्वैदिक काल में आर्यों की धार्मिक स्थिति-

(I) बहुदेववाद

(II) एकाधिदेववाद

(III) एकेश्वरवाद

(IV) निर्गुण भक्ति


(I) बहुदेववाद-

➠ऋग्वैदिक काल में बहुदेववाद को मानते थे।


(II) एकाधिदेववाद (Henotheism)-

➠ऋग्वैदिक काल में एकाधिदेववाद को मानते थे।

➠एकाधिदेववाद की अवधारणा जर्मन दार्शनिक मैक्समुलर के द्वारा दी गई थी।

➠मैक्समुलर के अनुसार ऋग्वैदिक काल में आर्य देश, काल परिस्थिति के सापेक्ष एक देवता को प्रमुख मानते थे तथा अन्य देवताओं को गौण (छोटा) मानते थे। अर्थात् आर्य एक दिन एक ही ईश्वर को सबसे प्रमुख मानते थे एवं अन्य देवताओं का उस दिन कम महत्वपूर्ण मानते थे।


(III) एकेश्वरवाद (Monotheism)-

➠ऋग्वैदिक काल में आर्यों के अनुसार एक ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करो।


(IV) निर्गुण भक्ति-

➠ऋग्वैदिक काल में आर्यों में निर्गुर्ण भक्ति की अवधारणा थी।


ऋग्वैदिक काल के प्रमुख देवता जैसे-

(A) धोष/ दौ/ धौ देवता

(B) इंद्र देवता

(C) अग्नि देवता

(D) वरुण देवता

(E) पूषन देवता


(A) धोष/ दौ/ धौ देवता-

➠ऋग्वैदिक काल में सबसे प्राचीन भगवान या देवता धोष था।


(B) इंद्र देवता-

➠ऋग्वैदिक काल का सबसे महत्वपूर्ण देवता इंद्र था।

➠इंद्र को युद्ध एवं वर्षा का देवता माना गया है।


(C) अग्नि देवता-

➠ऋग्वैदिक काल का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण देवता अग्नि था।

➠अग्नि देवता को मध्यस्थ या दूत के रूप में माना जाता है।


(D) वरुण देवता-

➠ऋग्वैदिक काल का तीसरा सबसे महत्वपूर्ण देवता वरुण था।

➠ऋाग्वैदिक काल में भगवान वरुण को ऋत का नियामक (नियंत्रण करने वाला) माना गया है।

➠इस जगत की भौतिक , नैतिक एवं कर्मकांडीय प्रणाली को ऋग्वैद में ऋत कहा गया है।

➠आर्यों के अनुसार भगवान वरुण 1000 सोने के स्तम्भों वाले महल में रहता है।


(E) पूषन-

➠ऋग्वैदिक काल में पशुओं का देवता पूषन था।


➠ऋग्वैदिक काल में अनुष्ठान और यज्ञ बहुत सरल थे।

➠ऋग्वैदिक काल में परिवार का मुखिया यज्ञ कर सकता था।

➠ऋग्वैदिक काल में पुरुष देवताओं की पूजा ज्यादा होती थी।

➠ऋग्वैदिक काल में देवता तीन प्रकार के थे जैसे-

(I) आकाश का देवता

(II) वायुमंडलीय देवता

(III) पृथ्वी के देवता


(I) आकाश का देवता-

➠ऋग्वैदिक काल में सूर्य, वरुण, मित्रा तथा घोष आकाश के देवता थे।


(II) वायुमंडलीय देवता-

➠ऋग्वैदिक काल में इंद्र, वायु तथा मारुति वायुमंडलीय देवता थे।


(III) पृथ्वी के देवता-

➠ऋग्वैदिक काल में सोम, पथ्वी तथा अग्नि पथ्वी के देवता थे।

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