व्यापार नीति

व्यापार नीति

(Trade Policy)


व्यापार नीती (Trade Policy)-

➠अन्य देशों के साथ किये गये लेनदेन को व्यापार नीति के माध्यम से नियमित किया जाता है।


भुगतान संतुलन (Balance of Payment- BOP)-

➠भुगतान संतुलन एक व्यवस्थित रिकाॅर्ड है जिसमें किसी देश के अन्य देशों के साथ किये जाने वाले लेनदेन को अंकित किया जाता है।

➠भुगतान संतुलन का रिकाॅर्ड भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के द्वारा रखा जाता है।

➠भुगतान संतुलन का रिकाॅर्ड एक निश्चित समय सीमा के लिए ही रखा जाता है।

➠भुगतान संतुलन का रिकाॅर्ड एक वित्तीय वर्ष के लिए रखा जाता है।


भुगतान संतुलन की संरचना (Structure of Balance of Payment)-

➠भुगतान संतुलन को दो भागों में विभाजित किया गया है जैसे-

1. चालू खाता (Current Account)

2. पूंजी खाता (Capital Account)


1. चालू खाता (Current Account)-

➠चालू खाते को दो भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(I) दृश्य (Visible)

(II) अदृश्य (Invisible)


(I) दृश्य (Visible)-

➠दृश्य में वस्तुओं के आयात निर्यात को रखा गया है।


(II) अदृश्य (Invisible)-

➠अदृश्य में निम्नलिखित को रखा गया है।

➠सेवा (Services)

➠लाभ या लाभांश (Profit/ Dividend)

➠धन प्रेषण (Remittance)

➠उपहार या दान (Gift/ Donation)


2. पूंजी खाता (Capital Account)-

➠पूंजी खाते को तीन भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(I) निवेश (Investment)

(II) ऋण (Debt)

(III) विदेशी मुद्रा अनिवासी या विदेशी मुद्रा गैर निवासी (Foreign Currency Non Resident- FCNR)


(I) निवेश (Investment)-

➠निवेश को दो भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(A) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment- FDI)

(B) विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (Foreign Portfolio Investment- FPI)


(A) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment- FDI)-

➠प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को दो भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(अ) ग्रीनफील्ड (Greenfield)

(ब) ब्राउनफील्ड (Brownfield)


(B) विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (Foreign Portfolio Investment- FPI)-

➠विदेशी पोर्टफोलियो निवेश को दो भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(अ) योग्य विदेशी निवेश (Qualified Foreign Investment- QFI)

(ब) विदेशी संस्थागत निवेश (Foreign Institutional Investment- FII)


भारत में वस्तुओं का आयात अधिक किया जाता है। तथा निर्यात कम किया जाता है। इसीलिए दृश्य खाते पर घाटे की स्थिति देखी जाती है। जिसे व्यापार घाटा कहा जाता है। अर्थात् दृश्य खाते के घाटे को ही व्यापार घाटा कहा जाता है।


➠अदृश्य खाते पर आधिक्य या अधिशेष (Surplus) की स्थिति रहती है। परन्तु चालू खाते पर घाटे की स्थिति रहती है। जिसे चालू खाते का घाटा कहा जाता है।

➠भारत में पूंजी खाते पर आधिक्य या अधिशेष (Surplus) की स्थिति होती है।

➠पूंजी खाते के आधिक्य या अधिशेष (Surplus) से चालू खाते के घाटे को संतुलित किया जाता है। तथा घाटे तो संतुलित करने के बाद शेष बची विदेशी मुद्रा बाजार में रहती है।


➠यदि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को लगता है की विदेशी मुद्रा की आपूर्ति अत्यधिक है तब RBI के द्वारा विदेशी मुद्रा को खरीद कर विदेशी मुद्रा भण्डरा को बढ़ाया जाता है।

➠यदि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को लगता है की विदेशी मुद्रा की आपूर्ति अत्यधिक कम है तब RBI के द्वारा विदेशी मुद्रा भण्डार में से विदेशी मुद्रा को निकाल कर बाजार में बेचा जाता है। जिससे की आपूर्ति को बढ़ाया जा सके।


भुगतान संतुलन का संकट-

➠जब आयातों के चुकाने के लिए प्रयाप्त विदेशी मुद्रा उपलब्ध नहीं होती है तब ऐसी स्थिति को भुगतान संतुलन का संकट कहा जाता है।

➠भारत में भुगतान संतुलन का संकट वर्ष 1991 में आया था।

➠पाकिस्तान तथा श्रीलंका वर्तमान में भुगतान संतुलन के सकंट से गुजरे रहे है।


भारत के द्वारा अन्य देशों से निम्नलिखित का मुख्य आयात किया जाता है।-

1. कच्चा तेल

2. सोना

3. कोयला

4. कीमती पत्थर और मोती

5. रासायनिक उत्पाद


भारत के प्रमुख आयातक देश (सबसे बड़े आयातक देश)-

1. अमेरिका (United States of America USA)- पहला स्थान

2. संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates- UAE)- दूसरा स्थान

3. चीन- तीसरा स्थान

4. बांगलादेश- चौथा स्थान

5. नीदरलैंड- पांचवा स्थान


भारत के द्वारा अन्य देशों को निम्नलिखित का मुख्य निर्यात किया जाता है।

1. पेट्रोलियम उत्पाद

2. आभूषण

3. लोहा और स्टील

4. जेनेरिक दवाइया


भारत के प्रमुख निर्यातक देश या गंतव्य स्त्रोत (सबसे बड़े निर्यातक देश)-

1. चीन- पहला स्थान

2. संयुक्त अरब अमीरात- दूसरा स्थान

3. सऊदी अरब- तीसरा स्थान

4. अमेरिका


अमेरिका-

➠वर्तमान में भारत में आयात तथा निर्यात दोनों का संयुक्त रूप से सबसे बड़ा देश अमेरिका है। अर्थात् वर्तमान में भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार अमेरिका है।


भारत के व्यापार घाटे के प्रमुख कारण या प्रमुख घटक-

1. भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है।

2. भारत अपनी लगभग 80 से 85% ईंधन की आवश्यकताओं को आयात के माध्यम से पुरा करता है।

3. भारत के द्वारा बड़ी मात्रा में सोना आयात किया जाता है।

4. भारत के निर्यात बाजारों में विविधता की कमी है।

5. भारत के निर्यात उत्पादों में विविधता की कमी है।

6. भारत बड़े मुक्त व्यापार समझौतों का भाग नहीं है जैसे- क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (Regional Comprehensive Economic Partnership- RCEP)

7. भारतीय उत्पाद महंगे है इसीलिए भारतीय उत्पाद अन्य देशों के उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते है।

8. भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता कमजोर है।

9. मेड इन इंडिया ब्रांड अधिक प्रचलित नहीं है।

10. सरकार के द्वारा निर्यातों पर लगाये जाने वाले कर (Tax) तथा विदेशों में आयातो पर लगाये जाने वाले कर (Tax)

11. भारत की निर्यात नीति में स्थिरता की कमी है।


(I) निवेश-

➠निवेश दो प्रकार का है। जैसे-

(A) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment- FDI)

(B) विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (Foreign Portfolio Investment- FPI)


(A) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment- FDI)-

➠प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक वास्तविक व्यवसाय गतिविधियों में निवेश करते है।

➠प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों के पास कंपनी में 10% से अधिक की हिस्सेदारी होती है।

➠प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक कंपनी के प्रबंधन एवं निर्णय में भी भूमिका निभाते है।

➠प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक अपेक्षाकृत स्थायी होते है।

➠प्रत्यक्ष विदेशी निवेश दो प्रकार का होता है। जैसे-

(अ) ग्रीनफील्ड निवेश (Greenfield Investment)

(ब) ब्राउनफील्ड निवेश (Brownfield Investment)


(अ) ग्रीनफील्ड निवेश (Greenfield Investment)-

➠ग्रीनफील्ड निवेश एकदम नया निवेश होता है। जैसे- सैमसंग का निवेश


(ब) ब्राउनफील्ड निवेश (Brownfield Investment)-

➠ब्राउनफील्ड निवेश पहले से चली आ रही कंपनी में निवेश होता है। जैसे- वोडाफोन, फ्लिपकार्ट में वाॅलमार्ट का निवेश आदि।


प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से संबंधित मार्ग-

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भारत में दो प्रकार से लाया जा सकता है। जैसे-

(I) स्वचालित मार्ग (Automatic Route)

(II) सरकारी मार्ग (Government Route)


(I) स्वचालित मार्ग-

➠प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के स्वचालित मार्ग में निवेश करने से पहले भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) या सरकार की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है।

➠भारत में गृह मंत्रालय से सुरक्षा मंजूरी नहीं मिलने पर स्वचालित मार्ग के माध्यम से गैर महत्वपूर्ण क्षेत्रों में 100% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति है।

➠भारत में लगभग 90% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश स्वचालित मार्ग से ही होता है।

➠स्वचालित मार्ग को बोम्बे मार्ग (Bombay Route) भी कहा जाता है।

➠स्वचालित मार्ग से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए RBI को सूचना देनी होती है।


(II) सरकारी मार्ग-

➠सरकारी मार्ग से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने से पहले सरकार की अनुमति की आवश्यकता होती है।

➠सरकारी मार्ग से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रावधान संवेदनशील क्षेत्रों में निवेश के लिये रखा गया है।

➠संवेदनशील क्षेत्र जैसे- रक्षा, मीडिया, उपग्रह, निजी सुरक्षा एजेंसियां, दूरसंचार आदि।

➠सरकारी मार्ग को दिल्ली मार्ग (Delhi Route) भी कहा जाता है।


भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के मुख्य स्त्रोत-

1. सिंगापुर- (पहला स्थान) सिंगापुर से सबसे अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्राप्त हुआ है।

2. अमेरिका- दूसरा स्थान

3. माॅरीशस- तीसरा स्थान

4. नीदरलैंड- चौथा स्थान

5. केमैन द्वीप- पांचवा स्थान

➠वर्ष 2021-22 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 83.57 अरब अमेरिकी डाॅलर ($ 83.5 Billion) प्राप्त हुआ है।


भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से होने वाले लाभ-

1. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से भारत में बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर सर्जित होते है।

2. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से उत्पादन में वृद्धि होती है। जिससे भारत की GDP बढ़ती है।

3. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से भारत में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भारत लायी जाती है जिससे भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता है।

4. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से विदेशी निवेशक अपने साथ उच्च तकनीक, प्रबंधन की विधियां तथा विपणन (Marketing) के तरीके भी साथ लाते है।

5. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से घरेलू उत्पादों की गुणवत्ता भी बढ़ती है।

6. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से सरकार को कर (Tax) के रूप में आय प्राप्त होती है।

7. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से भारतीय अर्थव्यवस्था का जुड़ाव वैश्विक अर्थव्यवस्था से होता है।

8. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में आयात प्रतिस्थापन की नीति को अपनाया जा सकता है। (आयात प्रतिस्थापन = आयातों का घरेलू उत्पादन करना)

9. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से निर्यातों को बढ़ाया जा सकता है।

10. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीयता बढ़ जाती है।


भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) होने से होने वाली आशंकाएं-

1. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से विदेशी कंपनियां सरकारी नीतियों को प्रभावित कर सकती है। सरकारी नीतियां प्रभावित होने से देश की सम्प्रभुता प्रभावित होगी।

2. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से छोटे घरेलू व्यवसायी या व्यापारी विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते है।

3. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से पाश्चात्य संस्कृति (विदेशी संस्कृति) को बढ़ावा मिलता है।

4. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से विदेशी निवेशक लाभ तथा लाभांश के रूप में विदेशी मुद्रा भारत से बाहर ले जाते है। जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार कम होता है।

5. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में विदेशी कंपनियों के द्वारा सामान्यतः उपभोग की जाने वाली वस्तु तथा सेवाओं में निवेश किया जाता है। तथा आधारभूत ढांचे में कम निवेश किया जाता है।


भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में आने वाली बाधाएं-

1. भारत की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीति में स्थिरता नहीं है। अर्थात् राजनैतिक विचारधारा के आधार पर नीति परिवर्तित हो जाती है।

2. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए भारत का आधारभूत ढांचा कमजोर है।

3. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों के लिए भारत में सरकारी नियमों में जटिलता (कठीन) है।

4. भारत में भ्रष्टाचार तथा लालफीताशाही व्यवस्था के कारण विदेशी निवेशक भारत में निवेश नहीं कर पाते है। (लालफीताशाही= सरकारी काम में देरी होना)

5. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होने से विदेशी निवेश के विरुद्ध स्थानीय लोगों के द्वारा विरोध किया जाता है।

6. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने के लिए विदेशी निवेशकों को भारत में भूमी अधिग्रहण के लिए समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

7. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने के लिए निवेश संबंधित विवादों का समाधान नहीं हो पाता है।

8. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए भारत में श्रम कानूनों की जटिलता नहीं है। अर्थात् भारत में श्रम कानून कमजोर है।


भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकृषित करने के लिए किये गये प्रयास-

1. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए आधारभूत ढांचे को सशक्त किया जा रहा है।

2. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए वर्तमान में भारत में 4D की अवधारणा है। जैसे- (Democracy, Demand, Demography, Deregulation)

3. भारत में विदेशी निवेश के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के नियमों को सरल बनाया जा रहा है।

4. भारत के द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ा दिया गया है जैसे- बीमा क्षेत्र में 74 प्रतिशत, रक्षा क्षेत्र में 100 प्रतिशत, खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में 100 प्रतिशत आदि।

5. भारत के द्वारा लगभग 90 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को स्वचालित मार्ग में रखा गया है।

6. भ्रष्टाचार और लालफीताशाही व्यवस्था को दूर करने के लिए प्रधानमंत्री कार्ययाल में विशिष्ट प्रकोष्ठ (सेल) का गठन किया गया है।

7. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकृषित करने के लिए विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (Foreign Exchange Regulation Act- FERA) को विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (Foreign Exchange Management Act- FEMA) से बदल दिया गया है।

8. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकृषित करने के लिए भारत में व्यापार करने की सुगमता को बढ़ाया गया है।

9. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकृषित करने के लिए भारत में श्रम कानूनों में सुधार लाया गया है।

10. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकृषित करने के लिए मेक इन इंडिया कार्यक्रम चलाया गया है।


(B) विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (Foreign Portfolio Investment- FPI)-

➠विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) को दो भागों में विभाजित किया गया है। जैसे-

(अ) योग्य विदेशी निवेश (Qualified Foreign Investment- QFI)

(ब) विदेशी संस्थागत निवेश (Foreign Institutional Investment- FII)

➠विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक वित्तीय परिसंपत्तियों में निवेश करते है। जैसे- शेयर, बाॅड आदि।

➠विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का कुल निवेश 10% से कम होता है।

➠कंपनी के प्रबंधन तथा निर्णय लेने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के द्वारा सीमित भूमिका निभाई जाती है।

➠विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक वास्तविक व्यवसायीक गतिविधि संचालित नहीं करने है। अर्थात् विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक वास्तविक निवेशक नहीं होते है।

➠विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की प्रकृति अस्थायी होती है इसीलिए विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) को हाॅट मनी (Hot Money) भी कहा जाता है।

➠विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भी विदेशी मुद्रा के महत्वपूर्ण स्त्रोत होते है।

➠विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की सहायता से पूंजी बाजार को विकसित किया जा सकता है।


प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की आशंकाएं विदेशी पोर्टफोलियो (FPI) में नहीं होती है। जैसे-

1. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों से सरकारी नीतियां प्रभावित नहीं होती है। सरकारी नीतियां प्रभावित नहीं होने से देश की सम्प्रभुता भी प्रभावित नहीं होगी

2. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश होने से छोटे घरेलू व्यवसायी या व्यापारी विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा  कर सकते है।

3. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश होने से पाश्चात्य संस्कृति (विदेशी संस्कृति) का कोई प्रभाव नहीं होता है।

4. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के द्वारा लाभ तथा लाभांश के रूप में विदेशी मुद्रा को अधिक मात्रा में भारत से बाहर नहीं ले जाया जाता है। जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार में अधित परिवर्तन नहीं होता है।

5. विदेशी पोर्टफोलियों निवेशकों के द्वारा सामान्यतः उपभोग की जाने वाली वस्तु तथा सेवाओं में निवेश न करके ये निवेशक शेयर तथा बाॅड के माध्यम से निवेश करते है।


प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) वाले वाभ विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) में नहीं है। जैसे-

1. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश होने से भारत में रोजगार के अवसर सर्जित नहीं होते है।

2. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश होने से उत्पादन में भी वृद्धि नहीं होती है। अर्थात् भारत की GDP में इनका योगदान नहीं होता है।

3. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश होने से भारत में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भारत नहीं लायी जाती है जिससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार  में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

4. भारत में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश होने से विदेशी निवेशक अपने साथ उच्च तकनीक, प्रबंधन की विधियां तथा विपणन (Marketing) के तरीके भी साथ नहीं लाते है।

5. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश से प्रतिस्पर्धा  नहीं बढ़ती है। अर्थात् प्रतिस्पर्धा नहीं बढ़ने से घरेलू उत्पादों की गुणवत्ता में भी कोई परिवर्तन नहीं होता है।

6. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश होने से सरकार को कर (Tax) के रूप में आय अधिक मात्रा में प्राप्त  नहीं होती है।

7. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश होने से भारतीय अर्थव्यवस्था का जुड़ाव वैश्विक अर्थव्यवस्था से नहीं होता है।

8. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में आयात प्रतिस्थापन की नीति को नहीं अपनाया जा सकता है। (आयात प्रतिस्थापन = आयातों का घरेलू उत्पादन करना)

9. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश होने से निर्यातों को भी नहीं बढ़ाया जा सकता है।

10. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश होने से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीयता में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

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