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सिद्धांत (Theories)

सिद्धांत (Theories)-

  • 1. महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory)

  • 2. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonic Theory)


1. महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory)-

  • महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत सन् 1912 में जर्मन जलवायु वैज्ञानिक (Climatologist) या मौसम वैज्ञानिक (Meteorologist) अल्फ्रेड वेगनर (Alfred Wegener) ने दिया था।
  • अल्फ्रेड वेगनर पुराजलवायु परिस्थितियों (Palaeoclimatic Conditions) का अध्ययन कर रहे थे।
  • अपने अध्ययन के द्वारा अल्फ्रेड वेगनर ने यह प्रमाणित किया की पहले सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे। तथा उस विशाल भू-भाग को पैंजिया (Pangaea) कहा जाता है।
  • पैंजिया के चारों ओर एक विशाल महासागर स्थित था जिसे पैंथालासा (Panthalassa) कहते हैं।
  • कालांतर में पैंजिया दो भागों में विभाजित हो गया था। जैसे-
    • (I) अंगारालैण्ड (Angaraland) या लॉरेशिया (Laurentia)- पैंजिया के उत्तरी भाग को अंगारालैण्ड कहा जाता है।
    • (II) गोंडवानालैण्ड (Gondwanaland)- पैंजिया के दक्षिणी भाग को गोंडवानालैण्ड कहा जाता है।
  • अंगारालैण्ड तथा गोंडवानालैण्ड के बीच टेथिस सागर (Tethys Sea) स्थित था।
  • उत्तरी गोलार्द्ध के महाद्वीपों का निर्माण अंगारालैण्ड से हुआ है।
  • दक्षिणी गोलार्द्ध के महाद्वीपों का निर्माण गोंडवानालैण्ड से हुआ है।
  • अल्फ्रेड वेगनर महाद्वीपों के विस्थापन को वैज्ञानिक रूप से नहीं समझा पाया अतः बहुत से अन्य सिद्धांत इसे समझाने के लिए दिए गये।
  • पैंजिया कार्बोनिफेरस काल (Carboniferous Period) में था।
  • अंगारालैण्ड और गोंडवानालैण्ड जुरासिक काल (Jurassic Period) में बने थे। अर्थात् पैंजिया जुरासिक काल में टूटा था जिसके कारण अंगारालैण्ड तथा गौंडवानालैण्ड बने थे।


पृथ्वी का भूवैज्ञानिक इतिहास (Geological History of Earth)-

  • पृथ्वी की उत्पत्ति 4.6 अरब वर्ष (4.6 Billion Years ago) पहले हुई थी। ()
  • पृथ्वी के अब तक के भूवैज्ञानिक इतिहास को 4 बड़े इयॉन (Eon) में विभाजित किया गया है। जैसे-
    • (I) हेडियन इयॉन (Hadean Eon)- पृथ्वी के इतिहास में सबसे पूराना कालखण्ड है।
    • (II) आदय इयॉन (Archean Eon)
    • (III) प्रागजीव इयॉन (Proterozoic Eon)
    • (IV) दृश्यजीवी इयॉन (Phanerozoic Eon) या फैनेरोजोइक


प्री कैम्ब्रियन काल (Precambrian Period)-

  • प्री कैम्ब्रियन काल में तीन इयॉन शामिल है जैसे-
    • (I) हेडियन इयॉन (Hadean Eon)
    • (II) आदय इयॉन (Archean Eon)
    • (III) प्रागजीव इयॉन (Proterozoic Eon)
  • हेडियन इयॉन, प्रागजीव इयॉन तथा दृश्यजीवी इयॉन या तीनों कालखण्ड ही प्री कैम्ब्रियन काल कहलाता है।
  • 4.6 अरब वर्ष (4.6 Billion years) पूर्व से लेकर 57 करोड़ वर्ष (570 Million years) पूर्व तक के काल को प्री कैम्ब्रियन काल कहा जाता है। तथा प्री कैम्ब्रियन काल के बाद का पृथ्वी का भूवैज्ञानिक इतिहास दृश्यजीवी इयॉन में शामिल है।
  • प्री कैम्ब्रियन काल में ही अरावली पर्वत का निर्माण हुआ था।


(IV) दृश्यजीवी इयॉन (Phanerozoic Eon)-

  • 57 करोड़ वर्ष पूर्व से अब तक का पृथ्वी का भूवैज्ञानिक इतिहास दृश्यजीवी इयॉन में आता है।
  • दृश्यजीवी इयॉन में कुछ महाकल्प (Era) है तथा इन महाकल्प में कुछ कल्प (Period) है।
  • दृश्यजीवी इयॉन में तीन महाकल्प है जैसे-
    • (अ) नवजीवन महाकल्प (Cenozoic Era)
    • (ब) मध्यजीव महाकल्प (Mesozoic Era)
    • (स) पुराजीव महाकल्प (Paleozoic Era)


(अ) नवजीवन महाकल्प (Cenozoic Era)-

  • नवजीवन महाकल्प में 2 कल्प शामिल है। जैसे-
  • (A) चतुर्थ कल्प (Quaternary Period)- भारत में मैदानी भाग का निर्माण चतुर्थ कल्प में ही हुआ है।
  • (B) तृतीय कल्प (Tertiary Period)- हिमालय का निर्माण तृतीय कल्प में ही हुआ है।, भारत में लिगनाइट कोयले का निर्माण तृतीय कल्प में हुआ है अर्थात् भारत में वर्तमान में लिगनाइट कोयले के भंडार तृतीय कल्प के ही है। (राजस्थान और गुजरात में पाया जाने वाला कोयला लिगनाइट कोयला है।


(ब) मध्यजीव महाकल्प (Mesozoic Era)-

  • मध्यजीव महाकल्प में 3 कल्प शामिल है। जैसे-
  • (A) क्रीटेशस कल्प (Cretaceous Period)- भारत में ढक्कन के पठार का निर्माण क्रीटेशस कल्प में ही हुआ था। (क्रीटेशस कल्प में भारत में बेसालट लावा या क्षारिय लावा का प्रवाह हुआ जिसके कारण ढक्कन के पठार का निर्माण हुआ है।
  • (B) जुरैसिक कल्प (Jurassic Period)
  • (C) ट्राइएसिक कल्प (Triassic Period)


(स) पुराजीव महाकल्प (Paleozoic Era)-

  • पुराजीव महाकल्प में 6 कल्प शामिल है। जैसे-
  • (A) पर्मियन कल्प (Permian Period)
  • (B) कार्बोनिफेरस कल्प (Carboniferous Period)- भारत में अच्छा कोयला जैसे- बीटूमिनश, इन्थ्रासाइट कोयला आदि का निर्माण कार्बोनिफेरस कल्प में ही हुआ है। अर्थात् बीटूमिनश, इन्थ्रासाइट कोयले के भंडार भारत में कार्बोनिफेरस कल्प के ही है।
  •  (C) डेवोनियन कल्प (Devonian Period)
  • (D) सिलुरियन कल्प (Silurian Period)
  • (E) ओर्डोविसियन कल्प (Ordovician Period)
  • (F) कैंब्रियन कल्प (Cambrian Period)


2. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory)-

  • प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत सन् 1960 के दशक में दिया गया था।
  • प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का प्रतिपादन हैरी हेस (Harry Hess) ने किया था परन्तु प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत की वैज्ञानिक व्याख्या का श्रेय मोर्गन (Morgan) को दिया जाता है।
  • मैकेंजी (Mackenzie), पार्कर (Parker) तथा होम्स (Holmes) प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के प्रमुख विचारक है।
  • प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत प्लेटों के निर्माण, विकास तथा प्लेटों की गति के कारण होने वाली भू-आकृतिक परिघटनाओं (Geomorphological Phenomena) को विज्ञानिक रूप से समझाता है। जैसे- भूकंप (Earthquake), ज्वालामुखी (Volcano), महाद्वीपों का विस्थापन (Drifting of Continents), वलित पर्वत निर्माण (Formation of Fold Mountains) आदि।


पृथ्वी की परतें (Layers of The Earth)-

  • पदार्थ की अवस्था के आधार पर पृथ्वी को 4 परतों में विभाजित किया गया है। जैसे-
    • 1. स्थलमंडल (Lithosphere)- 0 से 100 किलोमीटर तक (पृथ्वी की सबसे बाहरी परत)
    • 2. दुर्बलमण्डल (Asthenosphere)- 100 से 200 किलोमीटर तक
    • 3. मध्यमण्डल (Asthenosphere)- 200 से 2900 किलोमीटर तक
    • 4. तापमण्डल (Pyrosphere)- 2900 से 6371 किलोमीटर तक


1. स्थलमंडल (Lithosphere)-

  • स्थलमंडल बहुत से भागों में विभाजित है या बटा हुआ है तथा स्थलमंडल के इन भागों को ही प्लेटे कहते हैं।

  • पृथ्वी पर (स्थलमंडल) कुल 7 प्रमुख या बड़ी प्लेटे (Major Plates) है तथा 20 लघु प्लेटे (Minor Plates) है।
  • स्थलमंडल पृथ्वी की सबसे बाहरी परत है।
  • पृथ्वी की सतह (0 km) से लेकर गहराई में 100 किलोमीटर तक पृथ्वी की स्थलमंडल परत स्थित है।


पृथ्वी (स्थलमंडल) की प्रमुख प्लेटे (Major Plates)-

  • पृथ्वी पर या स्थलमंडल में कुल 7 प्रमुख प्लेटे है। जैसे-

  • 1. उत्तरी अमेरिकी प्लेट (North American Plate)
  • 2. दक्षिण अमेरिकी प्लेट (South American Plate)
  • 3. अफ्रीकन प्लेट (African Plate)
  • 4. इण्डो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट (Indo-Australian Plate)
  • 5. यूरेशियन प्लेट (Eurasian Plate)
  • 6. अंटार्कटिक प्लेट (Antarctic Plate)
  • 7. प्रशांत प्लेट (Pacific Plate)


पृथ्वी (स्थलमंडल) की लघु प्लेटे (Minor Plates)-

  • पृथ्वी पर या स्थलमंडल में कुल 20 लघु प्लेटे है जिनमें से कुछ लघु प्लेटे निम्नलिखित है।-

  • 1. जॉन डी फ्यूका प्लेट (Jaun De Fuca Plate)
  • 2. कोकोस प्लेट (Cocos Plate)
  • 3. नाजका प्लेट (Nazca Plate)
  • 4. कैरीबियन प्लेट (Caribbean Plate)
  • 5. सोमाली प्लेट (Somali Plate)
  • 6. अरब प्लेट (Arabian Plate)
  • 7. बर्मा प्लेट (Burma Plate)
  • 8. सुंडा प्लेट (Sunda Plate)
  • 9. फिलिपींस प्लेट (Philippines Plate)


2. दुर्बलमण्डल (Asthenosphere)-

  • पृथ्वी की गहराई में 100 से लेकर 200 किलोमीटर तक पृथ्वी की दुर्बलमण्डल परत स्थित है।


3. मध्यमण्डल (Asthenosphere)-

  •  पृथ्वी की गहराई में 200 से लेकर 2900 किलोमीटर तक पृथ्वी की मध्यमण्डल परत स्थित है।


4. तापमण्डल (Pyrosphere)-

  • पृथ्वी की गहराई में 2900 से लेकर 6371 किलोमीटर तक पृथ्वी की तापमण्डल परत स्थित है।


प्लेटो के प्रकार (Types of Plates)-

  • (I) महाद्वीपीय प्लेट (Continental Plate)

  • (II) महासागरीय प्लेट (Oceanic Plate)


(I) महाद्वीपीय प्लेट (Continental Plate)-

  • महाद्वीपीय प्लेट मोटी (Thick) प्लेट होती है।

  • महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट (Granite) चट्टानों से बनी होती है।

  • महाद्वीपीय प्लेट हल्की (Light) होती है।


(II) महासागरीय प्लेट (Oceanic Plate)-

  • महासागरीय प्लेट पतली (Thin) होती है।

  • महासागरीय प्लेट बेसाल्ट (Basalt) चट्टानों से बनी होती है।

  • महासागरीय प्लेट भारी (Heavy) होती है।


प्लेटों में गति (Movement of Plates)-

  • दुर्बल मंडल (Asthenosphere) में रेडियोधर्मी पदार्थों (Radioactive Element) के विघटन के कारण ऊष्मीय ऊर्जा मुक्त होती है। जिसके कारण इस क्षेत्र की चट्टानें पिंघलकर मेगमा (Magma) का निर्माण करती है।
  • गर्म मेगमा स्थलमंडल की ओर बढ़ता है। जिसके कारण ऊष्मीय संवहन धाराओं (Thermal Convective Current) का निर्माण होता है।
  • इन धाराओं के कारण प्लेटों में गति होती है।

  •  प्लेटों की गति के कारण प्लेट किनारों पर विभिन्न भू-आकृतिक परिघटनाएं (Geomorphological Phenomena) घटती है। अतः प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अंतर्गत मुख्यतः प्लेट किनारों का अध्ययन किया जाता है।

  • प्लेटों की गति के आधार पर प्लेट किनारे तीन प्रकार के होते हैं। जैसे-
    • 1. अभिसारी प्लेट किनारे (Converging Plate Boundaries)
    • 2. अपसारी प्लेट किनारे (Diverging Plate Boundaries)
    • 3. संरक्षित प्लेट किनारे (Conservative Plate Boundaries / Transform Plate Boundaries)


1. अभिसारी प्लेट किनारे (Converging Plate Boundaries)-

  • अभिसारी प्लेट किनारों पर दो प्लेटे एक दूसरे की ओर गति करती है तथा दोनों प्लेटों में से भारी प्लेट हल्की प्लेट के नीचे धंस जाती है।
  • जिस क्षेत्र में प्लेट धंसती है उसे बेनीऑफ़ ज़ोन (Benioff Zone) कहते हैं।
  • प्लेट का धंसने (Subduction) वाला भाग पिंघलकर नष्ट हो जाता है। अतः इन्हें विनाशात्मक प्लेट किनारे कहते हैं।
  • अभिसारी प्लेट किनारों पर उच्च तीव्रता के भूकंप (Earthquake), विस्फोटक ज्वालामुखी उद्भव (Explosive Volcanic Eruption) तथा वलित पर्वतों (Fold Mountains) का निर्माण होता है।
  • प्लेट की प्रकृति के आधार पर अभिसारी प्लेट किनारे तीन प्रकार के होते हैं। जैसे-
    • (I) महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसारी प्लेट किनारे (Continental-Continental Converging Plate Boundaries)
    • (II) महाद्वीपीय-महासागरीय अभिसारी प्लेट किनारे (Continental-Oceanic Converging Plate Boundaries)
    • (III) महासागरीय-महासागरीय अभिसारी प्लेट किनारे (Oceanic-Oceanic Converging Plate Boundaries)


(I) महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसारी प्लेट किनारे (Continental-Continental Converging Plate Boundaries)-

  • महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसारी प्लेट किनारों पर दो महाद्वीपीय प्लेटों का अभिसरण (Convergence) होता है। जिसके कारण उच्च तीव्रता के भूकंप आते हैं। तथा वलित पर्वतों का निर्माण होता है।
  • इन प्लेट किनारों पर ज्वालामुखी अद्भव तभी होता है जब प्लेटों के बीच जल स्थित होता है।
  • इन प्लेट किनारों के उदाहरण-
    • (अ)  इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट (Indo-Australian) तथा यूरेशियन प्लेट (Eurasian Plate) के अभिसरण से हिमालय पर्वत (Himalayan Mountain) का निर्माण हुआ है। (इन दोनों प्लेटों के बीच पानी नहीं है।)
    • (ब) अफ्रीकीन प्लेट (African Plate) तथा यूरेशियन प्लेट के अभिसरण से आल्प्स पर्वत (Alps Mountain) का निर्माण हुआ है तथा ज्वालामुखी चोटियों का निर्माण होता है जैसे- एटना (Etna), विसुवियस (Vesuvius), स्ट्राम्बोली- इटली (Stromboli-Italy) (इन दोनों प्लेटों के बीच पानी है।)


(II) महाद्वीपीय-महासागरीय अभिसारी प्लेट किनारे (Continental-Oceanic Converging Plate Boundaries)-

  • महाद्वीपीय-महासागरीय अभिसारी प्लेट किनारों पर महाद्वीपीय तथा महासागरीय प्लेटों का अभिसरण होता है।
  • प्लेटों के अभिसरण के कारण उच्च तीव्रता के भूकंप आते हैं तथा विस्फोटक ज्वालामुखी अद्भव होते हैं।
  • इन प्लेट किनारों पर वलित पर्वत एवं महासागरीय गर्त का निर्माण होता है।
  • इन प्लेट किनारों के उदाहरण-
    • (अ) नाज़का प्लेट (Nazca Plate) तथा दक्षिणी अमेरिकी प्लेट (South American Plate) से एंडीज पर्वत (Andes Mountain) का निर्माण हुआ है तथा कोटोपैक्सी (Cotopaxi), चिंबोराजो (Chimborazo), अकोनकागुआ (Aconcagua) जैसी ज्वालामुखी चोटियों का भी निर्माण हुआ है।
    • (ब) प्रशांत महासागरीय प्लेट (Pacific Ocean Plate) तथा उत्तरी अमेरिकी प्लेट (North American Plate) से रॉकी पर्वत (Rocky Mountain) का निर्माण हुआ है तथा हुड (Hood), रेनियर (Rainier) शास्ता (Shasta) जैसी ज्वालामुखी चोटियों का निर्माण हुआ है।


(III) महासागरीय-महासागरीय अभिसारी प्लेट किनारे (Oceanic-Oceanic Converging Plate Boundaries)-

  • महासागरीय-महासागरीय अभिसारी प्लेट किनारों पर दो महासागरीय प्लेटों का अभिसरण होता है।
  • यहाँ उच्च तीव्रता के भूकंप आते हैं तथा विस्फोटक ज्वालामुखी उद्भव होते हैं।
  • इन प्लेट किनारों से गहरी महासागरीय गर्तों एवं द्वीपीय चाप का निर्माण होता है।
  • इन प्लेट किनारों का उदाहरण-

    • (अ) फिलीपींस प्लेट (Philippine Plate) तथा प्रशांत महासागरीय प्लेट (Pacific Ocean Plate) में विश्व की सबसे गहरी गर्त 'मरियाना गर्त' (Mariana Trench) का निर्माण होता है।
    • मरियाना गर्त का सबसे गहरा बिंदु चैलेंजर डीप (Challenger Deep) है।


2. अपसारी प्लेट किनारे (Diverging Plate Boundaries)-

  • अपसारी प्लेट किनारों पर दो प्लेटे विपरित दिशा में गति करती है।
  • प्लेटों के अपसरण के कारण मध्यम तीव्रता के भूकंप तथा कम विस्फोटक ज्वालामुखी उद्भव होते हैं।
  • ज्वालामुखी उद्भव से निकलने वाले लावा के जमने से नयी क्रस्ट (Crust) का निर्माण होता है। अतः इन्हें (क्रस्ट) रचनात्मक (Constructive) प्लेट किनारे कहते हैं।
  • महाद्वीपीय क्षेत्र में इन (रचनात्मक) प्लेट किनारों पर भ्रंश घाटी (Rift Valley) का निर्माण होता है। जैसे- पूर्वी अफ्रीकन भ्रंश घाटी (East African Rift Valley)
  • पूर्वी अफ्रीकन भ्रंश घाटी का निर्माण नूबियन प्लेट (Nubian Plate) और सोमाली प्लेट (Somali Plate) के अलग होने के कारण हो रहा है।
  • नूबियन प्लेट और सोमाली प्लेट अफ्रीकन प्लेट के ही दो भाग है।
  • महासागरीय क्षेत्र में अपसारी प्लेट किनारों पर कटक (Ridge) का निर्माण होता है। जैसे- मध्य अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge)
  • विश्व की सबसे लम्बी कटक (Ridge)- मध्य अटलांटिक कटक है।
  • मध्य अटलांटिक कटक की लम्बाई 14000 किलोमीटर है।
  • अटलांटिक महासागर अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर 'S' के आकार का महासागर है। तथा मध्य अटलांटिक कटक भी अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर 'S' के आकार की  है।
  • मध्य अटलांटिक कटक अटलांटिक महासागर में स्थित है।


3. संरक्षित प्लेट किनारे (Conservative Plate Boundaries / Transform Plate Boundaries)-

  • संरक्षित प्लेट किनारों पर दो प्लेट समानान्तर गति करती है। प्लेटों की गति के कारण कम तीव्रता के भूकंप आते हैं।
  • संरक्षित प्लेट किनारों पर सामान्यतः ज्वालामुखी अद्भव नहीं होता है।
  • संरक्षित प्लेट किनारों पर रूपांतरण भ्रंश (Transform Fault) का निर्माण होता है। जैसे- कैलिफोर्निया में सैन एंड्रियास भ्रंश (San Andreas Fault, California, USA)
  • सैन एंड्रियास भ्रंश  प्रशांत प्लेट तथा उत्तरी अमेरिकी प्लेट के बीच सर्पण सीमा है।

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