Type Here to Get Search Results !

गुप्त वंश

गुप्त वंश (319 AD - 550 AD)

(Gupta Dynasty)


गुप्त वंश (Gupta Dynasty)-

➠भारत में गुप्त वंश का शासन काल 319 ई. से लेकर 550 ई. तक रहा था।

➠भारत में गुप्त वंश का संस्थापक श्री गुप्त था लेकिन गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक चंद्रगुप्त प्रथम को माना जाता है।


गुप्त वंश के प्रमुख शासक-

1. श्री गुप्त (240 ई. - 280 ई.)

2. घटोत्कच गुप्त (280 ई. - 319 ई.)

3. चंद्रगुप्त प्रथम (319 ई. - 335 ई.)

4. समुद्रगुप्त (335 ई. - 375 ई.)

5. रामगुप्त

6. चंद्रगुप्त द्वितीय (375 ई. - 414 ई.)

7. कुमारगुप्त (414 ई. - 454 ई.)

8. स्कंदगुप्त (454 ई. - 467 ई.)


1. श्री गुप्त (240 ई. - 280 ई.)-

➠श्री गुप्त भारत में गुप्त वंश का संस्थापक था।

➠चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार श्री गुप्त ने पाटलिपुत्र (मगध) में एक मंदिर का निर्माण करवाया था।

➠गुप्त वंश के शासक श्री गुप्त की जानकारी प्रभावती गुप्त के पूना ताम्रपत्र से मिलती है।

➠पाटलिपुत्र को वर्तमान में पटना के नाम से जाना जाता है। अर्थात् पटना का प्राचीन नाम पाटलिपुत्र था।

➠मगध को वर्तमान में बिहार के नाम से जाना जाता है। अर्थात् बिहार का प्राचीन नाम मगध था।

➠श्री गुप्त ने महाराज की उपाधि धारण की थी।

➠महाराज गुप्त काल में सामतों की उपाधि थी।


2. घटोत्कच (280 ई. - 319 ई.)-

➠घटोत्कच श्री गुप्त के बाद गुप्त वंश का अगला शासक बना था।

➠गुप्त वंश के शासक घटोत्कच की जानकारी प्रभावती गुप्त के पूना ताम्रपत्र से मितली है।

➠प्रभावती गुप्त गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री थी।


3. चंद्रगुप्त प्रथम (319 ई. - 335 ई.)-

➠चंद्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक था।

➠चंद्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का पहला ऐसा शासक था जिसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी।

➠चंद्रगुप्त प्रथम ने 319 ई. में गुप्त संवत (कैलेंडर) शुरू किया था।

➠चंद्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवि राजकुमारी श्री कुमारी देवी से विवाह किया था।

➠चंद्रगुप्त प्रथम ने सिक्कोंं पर अपनी पत्नी श्री कुमारी देवी का नाम लिखवाया था।

➠चंद्रगुप्त प्रथम ने श्री सिक्के, राजा रानी प्रकार के सिक्के एवं विवाह प्रकार के सिक्के जारी किए थे।

➠चंद्रगुप्त प्रथम ने अपने पुत्र समुद्रगुप्त के लिए अपना सिंहासन त्याग दिया था।


4. समुद्रगुप्त (335 ई. - 375 ई.)-

➠समुद्रगुप्त गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त प्रथम का बेटा था।

➠समुद्रगुप्त गुप्त वंश का सबसे शक्तिशाली और महान शासक था।

➠समुद्रगुप्त के द्वारा निम्नलिखित उपाधियां धारण की गई थी।-

(I) लिच्छवि दौहित्र

(II) धरणिबंध

➠समुद्रगुप्त की जानकारी हरिषेण के द्वारा लिखी गई प्रयाग प्रशस्ति से मिलती है।

➠प्रयाग प्रशस्ति संस्कृत भाषा में लिखी गई है।

➠प्रयाग प्रशस्ति ब्राह्मी लिपि में लिखी गई है।

➠प्रयाग प्रशस्ति चंपू शैली में लिखी गई है।

➠चंपू शैली का अर्थ है गद्य एवं पद्य

➠हरिषेण समुद्रगुप्त का महासंधि-विग्रहक था।

➠पहले चरण में समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत के 9 शासकों को पराजित किया था।

➠समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत के 9 शासकों को पराजित करने के बाद 9 शासकों के प्रति या विरुद्ध प्रसभोद्धरण की नीति अपनाई थी।

➠प्रसभोद्धरण का अर्थ है किसी वंश को जड़ से खत्म करना।

➠दूसरे चरण में समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत के 12 शासकों को पराजित किया था।

➠समुद्रगुप्त ने इन 12 शासकों के प्रति या विरुद्ध ग्रहण मोक्षानुग्रह की नीति अपनाई थी।

➠ग्रहण मोक्षानुग्रह का अर्थ है की समुद्रगुप्त ने इन 12 शासकों से कर () लेने के बाद उन्हें अपना राज्य वापस दे दिया था।

➠तीसरे चरण में समुद्रगुप्त ने शक, कुषाण और सभी विदेशियों या विदेशी आक्रमणकारियों को पराजित किया था।

➠शक एवं कुषाण समुद्रगुप्त को उपहार देते थे एवं अपनी पुत्रियों का विवाह समुद्रगुप्त के परिवार से करवाते थे।

➠समुद्रगुप्त ने कामरूप को पराजित किया था।

➠कामरूप का वर्तमान नाम असम है अर्थात् भारत के असम राज्य का प्राचीन नाम कामरूप था।

➠समुद्रगुप्त ने राजस्थान, हरियाणा एवं मध्य प्रदेश के गणराज्यों को पराजित किया था।

➠समुद्रगुप्त ने 6 प्रकार के सिक्के चलाये थे जैसे-

(I) गरुड़ सिक्के

(II) अश्वमेध सिक्के

(III) वीणा वादन सिक्के

(IV) धनुर्धर सिक्के

(V) व्याघ्रनिहंता सिक्के

(VI) परशु सिक्के


(I) गरुड़ सिक्के-

➠गरुड़ सिक्के गुप्त वंश के शासक समुद्रगुप्त ने चलाये थे।

➠गरुड़ सिक्के पर गरुड़ पक्षी का चित्र बना हुआ है।

➠गरुड़ सिक्का सबसे प्रसिद्ध सिक्का था।

➠गुप्त शासकों का राजकीय धर्म भागवत धर्म था।

➠गुप्त वंश का प्रतीक गरुड़ था।


(II) अश्वमेध सिक्के-

➠अश्वमेध सिक्के गुप्त वंश के शासक समुद्रगुप्त के द्वारा चलाये गये थे।

➠समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करवाया था।

➠समुद्रगुप्त के द्वारा अश्वमेध यज्ञ के आयोजन की जानकारी प्रयाग प्रशस्ति में नहीं मिलती है।

➠समुद्रगुप्त के अश्वमेध यज्ञ के आयोजन की जानकारी अश्वमेध सिक्कों से मिलती है।


(III) वीणा वादन सिक्के-

➠वीणा वादन सिक्के गुप्त वंश के शासक समुद्रगुप्त के द्वारा चलाये गये थे।

➠वीणा वादन सिक्के संगीत प्रकार के सिक्के थे।

➠समुद्रगुप्त स्वयम् वीणा बजाया करता था।

➠प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को कविराज कहा गया है।


(IV) धनुर्धर सिक्के-

➠धनुर्धर सिक्के गुप्त वंश के शासक समुद्रगुप्त के द्वारा चलाये गये थे।

➠धनुर्धर सिक्के धनुर्धर संबंधित सिक्के है।


(V) व्याघ्रनिहंता सिक्के-

➠व्याघ्रनिहंता सिक्के गुप्त वंश के शासक समुद्रगुप्त के द्वारा चलाये गये थे।

➠व्याघ्रनिहंता सिक्के पर शेर के शिकार का अंकन किया गया था।


(VI) परशु सिक्के-

➠परशु सिक्के गुप्त वंश के शासक समुद्रगुप्त के द्वारा चलाये गये थे।

➠परशु सिक्के पर कुल्हाड़ी का अंकन किया गया है।


विशेष- गुप्त काल में काच नाम के व्यक्ति के सिक्के भी मिलते है।

➠काल संभवतः समुद्रगुप्त या समुद्रगुप्त के किसी महत्वाकांक्षी भाई का नाम था।


न्यूमिसमेटिक्स-

➠सिक्के के अध्ययन को न्यूमिसमेटिक्स कहा जाता है।

➠इतिहासकार स्मिथ ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा है।

➠बौद्ध साहित्य के अनुसार श्रीलंका के शासक मेघवर्मन ने समुद्रगुप्त से गया (बिहार) में एक मंदिर के निर्माण के लिए अनुमति मांगी थी।

➠समुद्रगुप्त ने श्रीलंका के शासक मेघवर्मन को गया में मंदिर के निर्माण की अनुमति दे दी थी।

➠मेघवर्मन ने गया में एक विहार का निर्माण करवाया अतः कहा जा सकता है की समुद्रगुप्त एक धर्मनिरपेक्ष शासक था।


5. रामगुप्त-

➠रामगुप्त समुद्रगुप्त का बेटा था।

➠रामगुप्त की पत्नी का नाम ध्रुवस्वामिनी या ध्रुव देवी था।

➠रामगुप्त की पत्नी ध्रुवस्वामिनी या ध्रुव देवी की जानकारी विशाखगत्त की देवीचन्द्रगुप्तम् पुस्तक से मिलती है।

➠शक शासक रुद्रसिंह तृतीय ने रामगुप्त या गुप्त वंश की राजधानी पाटलिपुत्र पर आक्रमण करने का प्रयास किया तथा युद्ध न करने के लिए रुद्रसिंह ने रामगुप्त से ध्रुवस्वामिनी या ध्रुव देवी की मांग की थी।

➠चंद्रगुप्त द्वितीय ने रुद्रसिंह तृतीय और रामगुप्त की हत्या कर दी तथा चंद्रगुप्त द्वितीय शासक बन गया था।

➠चंद्रगुप्त द्वितीय समुद्रगुप्त का छोटा बेटा एवं रामगुप्त का छोटा भाई था।

➠चंद्रगुप्त द्वितीय ने ध्रुवस्वामिनी या ध्रुव देवी से विवाह कर लिया था।

➠रामगुप्त की जानकारी राष्ट्रकूट शासकों के अभिलेखों से मिलती है।

➠मध्य प्रदेश के एरण तथा भीलसा से रामगुप्त के सिक्के मिलते है।

➠एरण भारत के मध्य प्रदेश राज्य के सागर जिले में स्थित गाँव का नाम है।

➠भिलसा को प्राचीन काल में विदिशा के नाम से जाना जाता था। अर्थात् विदिशा का वर्तमान नाम भिलसा है।

➠भिलसा भारत के मध्य प्रदेश राज्य में स्थित एक शहर का नाम है।


6. चन्द्रगुप्त द्वितीय (375 ई. - 414 ई.)-

➠चन्द्रगुप्त द्वितीय के पिता का नाम समुद्रगुप्त था।

➠चन्द्रगुप्त द्वितीय की पत्नीयां-

(I) ध्रुव देवी

(II) कुबेरनागा

➠चन्द्रगुप्त द्वितीय रामगुप्त का भाई था।

➠चन्द्रगुप्त द्वितीय भगवान विष्णु का भक्त था।

➠महरौली लौह स्तम्भ के अनुसार चन्द्रगुप्त ने बाहलिकों को पराजित किया था।

➠महरौली लौह स्तम्भ भारत की राजधानी दिल्ली के महरौली नामक गाँव में स्थित है।

➠चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक शासक रुद्रसेन द्वितीय के साथ किया था।

➠रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय का वाकाटक पर सीधा नियंत्रण था क्योंकि रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु के बाद वाकाटक का शासन प्रभावती गुप्त के पास था और प्रभावती गुप्त वाकाटक मे शासन चलाने के लिए कोई भी कार्य अपने पिता से पूछ कर करती थी।

➠चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में 9 विद्वान थे। जैसे-

(I) कालिदास जी

(II) वराह मिहिर

(III) धनवंतरी- धनवंतरी एक चिकित्सक था।

(IV) अमर सिंह

(V) वेताल भट्टी या वत्स भट्टी

(VI) शंकु

(VII) घटकर्पर

(VIII) क्षपणक

(IX) वररुचि

➠399 ई. में एक चीनी यात्री फाह्यान भारत आया था।

➠फाह्यान स्थल मार्ग से भारत आया था।

➠फाह्यान जहाज द्वारा ताम्रलिप्ति बंदरगाह से चीन वापस लौटा था।

➠ताम्रलिप्ति बंदरगाह बंगाल की खाड़ी में लाम्रलिप्ति नामक प्राचीन नगर में स्थित है।

➠ताम्रलिप्ति नामक नगर को वर्तमान में तामलुक के नाम से जाना जाता है। अर्थात् तामलुक का प्राचीन नाम ही ताम्रलिप्ति है।

➠तामलुक वर्तमान में भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के मिदनापुर जिले में स्थित है। अर्थात् ताम्रलिप्ति बंदरगाह वर्तमान में भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के मिदनापुर जिले में स्थित है।

➠फाह्यान के द्वारा चन्द्रगुप्त द्वितीय के नाम का उल्लेख नहीं किया गया है।

➠फाह्यान ने चन्द्रगुप्त द्वितीय की प्रशंसा की है।

➠फाह्यान बौद्ध धर्म की जानकारी या बौद्ध धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए चीन से भारत आया था।

➠फाह्यान की पुस्तक का नाम फो-क्वो-की है।


चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपाधियां-

(I) विक्रमादित्य

(II) परम भागवत या परमेश्वर

(III) शकारि


(I) विक्रमादित्य-

➠चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी।

विशेष- हेमू या हेमचन्द्र दिल्ली का शासक था। हेमू या हेमचन्द्र ही अंतिम हिंदू शासक था जिसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी। अर्थात् हेमू या हेमचन्द्र दिल्ली के सिंहासन पर हेमचन्द्र विक्रमादित्य के नाम से बैठा था।


(II) परम भागवत या परमेश्वर-

➠चन्द्रगुप्त द्वितीय ने परम भागवत या परमेश्वर की उपाधि धारण की थी।

➠चन्द्रगुप्त द्वितीय भगवान विष्णु का भक्त था इसीलिए चन्द्रगुप्त द्वितीय ने परम भागवत या परमेश्वर की उपाधि धारण की थी।


(III) शकारि-

➠चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकारि की उपाधि धारण की थी।

➠चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शक वंश के अंतिम शासक रुद्रसिंह तृतीय की हत्या कर शकारि की उपाधि धारण की थी।


7. कुमारगुप्त (414 ई. - 454 ई.)-

➠कुमारगुप्त गुप्त वंश का शासक था।

➠कुमारगुप्त भगवान कार्तिकेय का अनुयायी थी।

➠भगवान कार्तिकेय को स्कंद भी कहा जाता है।

➠भगवान कार्तिकेय भगवान शिव के बड़े पुत्र है।

➠कुमारगुप्त में मयूर शैली के सिक्के चलाये थे। जिसका प्रमुख कारण कुमारगुप्त भगवान कार्तिकेय का अनुयायी था और भगवान कार्तिकेय का वाहन मयूर था।

➠चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार शक्रादित्य ने नालंदा विश्वविद्यालय का निर्माण करवाया था। अर्थात् चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार कुमारगुप्त ने ही नालंदा विश्वविद्यालय का निर्माण करवाया था।

➠चीनी यात्री ह्वेनसांग ने गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त को ही शक्रादित्य कहा गया है।

➠कुमारगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करवाया था।

➠कुमारगुप्त के द्वारा करवाये गये अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को पुष्यमित्रों ने पकड़ लिया था।

➠पुष्यमित्र मध्य एशिया की बर्बर जनजाति थी।

➠स्कंद गुप्त ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ने वाले पुष्यमित्रों को पराजित किया था।

➠स्कंद गुप्त गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त का बेटा था।

➠स्कंद गुप्त के द्वारा पुष्यमित्रों को पराजित करने की जानकारी स्कंदगुप्त के भीतरी अभिलेखों से प्राप्त होती है।

➠भीतरी एक गाँव का नाम है।

➠भीतरी नामक गाँव भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के गाजीपुर जिले में स्थित है।

➠गुप्त वंश के शासकों में सर्वाधिक सोने के सिक्के कुमारगुप्त ने चलाये थे।

➠भरतपुर के पास बयाना से सिक्कों को ढेर मिलता है।

➠बयाना भारत के राजस्थान राज्य के भरतपुर जिले में स्थित एक नगर का नाम है।

➠गुप्त वंश के शासकों में सर्वाधिक अभिलेख भी कुमारगुप्त के मिलते है।

➠सर्वाधिक सोने के सिक्के चलाने वाला वंश गुप्त वंश है।


8. स्कंदगुप्त (454 ई. - 467 ई.)-

➠स्कंदगुप्त गुप्त वंश का शासक था।

➠स्कंदगुप्त गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त के पुत्र था।

➠स्कंदगुप्त एक योद्धा था।

➠स्कंदगुप्त के शासक काल के दौरान हूणों ने भारत पर आक्रमण किया था। अर्थात् स्कंदगुप्त के शासक काल में हूणों ने गुप्त वंश पर आक्रमण किया था।

➠स्कंदगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार स्कंदगुप्त ने हूणों को पराजित किया था।

➠स्कंदगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार स्कंदगुप्त के समय स्कंदगुप्त के गवर्नर पर्णदत्त गुप्त के पुत्र चक्रपालित ने सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण करवाया था।

➠चक्रपालित ने सुदर्शन झील के पास विष्णु मंदिर का निर्माण भी करवाया था।

सुदर्शन झील की अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें।


गुप्तकालीन साहित्य-

➠गुप्तकालीन साहित्य को दो भागों में विभाजित किया गया है। अर्थात् गुप्त काल में लिखे गये साहित्यों को दो भागों में विभाजित किया गया है जैसे-

(अ) धार्मिक साहित्य

(ब) गैर-धार्मिक साहित्य


(अ) धार्मिक साहित्य-

➠गुप्त काल में निम्नलिखित धार्मिक साहित्य लिखे गये थे। जैसे-

(I) रामायण- अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

(II) महाभारत- अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें


(ब) गैर-धार्मिक साहित्य-

➠निम्नलिखित के द्वारा गुप्त काल में गैर-धार्मिक साहित्य लिखे  गये थे। जैसे-

1. कालिदास

2. महाकवि भास

3. चारुदत्तम्

4. चंद्रगोमिन

5. वात्स्यायन

6. विष्णु शर्मा

7. वत्स भट्टी या बेताल भट्टी

8. महाकवि माघ या माघ

9. कामंदक

10. क्षेमेन्द्र

11. शूद्रक


(1) कालिदास

➠कालिदास गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में दरबारी विद्वान था।

➠कालिदास के दो काव्य है। जैसे-

(I) रधुवंश काव्य

(II) कुमारसंभवम् काव्य


(I) रधुवंश काव्य-

➠रधुवंश काव्य कालिदास का काव्य है।

➠रधुवंश काव्य में भगवान राम के वंश की कहानी का उल्लेख मिलता है।


(II) कुमारसंभवम् काव्य-

➠कुमारसंभवम् काव्य कालिदास का काव्य है।

➠कुमारसंभवम् काव्य में भगवान शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय की कहानी का उल्लेख मिलता है।

➠कुमारसंभवम् काव्य में देवता और दानवों के संघर्ष या युद्ध की कहानी का उल्लेख मिलता है।


कालिदास के दो अर्द्ध काव्य है जैसे-

(I) मेघदूत अर्द्ध काव्य

(II) ऋतुसंहार अर्द्ध काव्य


(I) मेघदूत अर्द्ध काव्य-

➠मेघदूत अर्द्ध काव्य कालिदास का अर्द्ध काव्य है।

➠मेघदूत अर्द्ध काव्य में एक पती की कहानी या एक पती की विरह वेदना का उल्लेख किया गया है।


(II) ऋतुसंहार अर्द्ध काव्य-

➠ऋतुसंहार अर्द्ध काव्य कालिदास का अर्द्ध काव्य है।

➠ऋतुसंहार अर्द्ध काव्य में एक पत्नी की कहानी या एक पत्नी की विरह वेदना का उल्लेख किया गया है।


➠कालिदास के तीन नाटक है जैसे-

(I) मालविकाग्निमित्रम्

(II) विक्रमोर्वशीयम्

(III) अभिज्ञान शाकुन्तलम्


(I) मालविकाग्निमित्रम्-

➠मालविकाग्निमित्रम् कालिदास के द्वारा लिखा गया नाटक है।

➠मालविकाग्निमित्रम् संस्कृत भाषा में लिखा गया नाटक है।

➠मालविकाग्निमित्रम् नाटक में पुष्यमित्र शुंग के पुत्र अग्निमित्र तथा मालविका की कहानी उल्लेख है।


(II) विक्रमोर्वशीयम्-

➠विक्रमोर्वशीयम् कालिदास के द्वारा लिखा गया नाटक है।

➠विक्रमोर्वशीयम् नाटक में राजकुमार पुरुरवा तथा अप्सरा उर्वशी की कहानी या विरह वेदना का उल्लेख है।


(III) अभिज्ञान शाकुन्तलम्-

➠अभिज्ञान शाकुन्तलम् कालिदास के द्वारा लिखा गया नाटक है।

➠अभिज्ञान शाकुन्तलम् संस्कृत भाषा में लिखा गया नाटक है।

➠कालिदास की अंतिम व सर्वश्रेष्ठ रचना अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक है।

➠अभिज्ञान शाकुन्तलम् में राजा दुष्यंत तथा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र भरत की कहानी का उल्लेख किया गया है।


2. महाकवि भास-

➠गुप्त काल में महाकवि भास के द्वारा निम्नलिखित नाटक लिखे गये थे।

(I) स्वप्नवासवदत्तम्

(II) प्रतिज्ञा यौगन्धरायण

(III) चारुदत्तम्


(I) स्वप्नवासवदत्तम्-

➠स्वप्नवासवदत्तम् नामक नाटक महाकवि भास के द्वारा लिखा गया था।

➠स्वप्नवासवदत्तम् नाटक गुप्त काल में लिखा गया था।

➠स्वप्नवासवदत्तम् नामक नाटक संस्कृत भाषा में लिखा गया है।

➠स्वप्नवासवदत्तम् नामक पुस्तक में अंवति के शासक प्रद्यौत की पुत्री वासवदत्ता एवं वत्स के शासक उदयन की कहानी का उल्लेख किया गया है।

➠स्वप्नवासवदत्तम् नाटक को भारत का प्रथम नाटक माना जाता है।


(II) प्रतिज्ञा यौगन्धरायण-

➠प्रतिज्ञा यौगन्धरायण नामक नाटक महाकवि भास के द्वारा लिखा गया है।

➠प्रतिज्ञा यौगन्धरायण नाटक गुप्त काल में लिखा गया था।

➠प्रतिज्ञा यौगन्धरायण नाटक संस्कृत भाषा में लिखा गया है।

➠प्रतिज्ञा यौगन्धरायण नाटक स्वप्नवासवदत्तम् नामक नाटक की पिछली कड़ी है।


(III) चारुदत्तम्-

➠चारुदत्तम् नामक नाटक महाकवि भास के द्वारा लिखा गया है।

➠चारुदत्तम् नाटक गुप्त काल में लिखा गया था।

➠चारुदत्तम् नाटक संस्कृत भाषा में लिखा गया था।

➠चारुदत्तम् नाटक काल्पनिक घटना पर आधारित है।


3. अमरसिंह-

➠अमरसिंह गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में दरबारी विद्वान था।

➠अमरसिंह ने गुप्त काल में अमरकोष नामक पुस्तक की रचना की थी।

➠अमरसिंह ने अमरकोष नामक पुस्तक संस्कृत भाषा में लिखी थी।

➠अमरसिंह की अमरकोष नामक पुस्तक का विषय व्याकरण है।


4. चंद्रगोमिन-

➠चंद्रगोमिन के द्वारा चंद्रगोमिन व्याकरण (चांद्र व्याकरण) नामक पुस्तक की रचना की गई थी।

➠चंद्रगोमिन ने चंद्रगोमिन व्याकरण या चांद्र व्याकरण नामक पुस्तक गुप्त काल में लिखी थी।

➠चंद्रगोमिन की चंद्रगोमिन व्याकरण (चांद्र व्याकरण) पुस्तक का विषय व्याकरण है।


5. वात्स्यायन-

➠वात्स्यायन के द्वारा कामसूत्र नामक पुस्तक की रचना की गई थी।

➠वात्स्यायन ने कामसूत्र नामक पुस्तक गुप्त काल में लिखी थी।

➠वात्स्यायन ने कामसूत्र में धर्म, अर्थ और काम की व्याख्या की है।

➠वात्स्यायन के द्वारा कामसूत्र नामक पुस्तक संस्कृत भाषा में लिखी गई थी।


6. विष्णु शर्मा-

➠विष्णु शर्मा के द्वारा पंचतंत्र नामक पुस्तक की रचना की गई थी।

➠विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र नामक पुस्तक गुप्त काल में लिखी थी।

➠विष्णु शर्मा की पंचतंत्र नामक पुस्तक का विषय कूटनीति या राजनीति है।

➠विष्णु शर्मा के द्वारा पंचतंत्र नामक पुस्तक संस्कृत भाषा में लिखी गई थी।


7. वत्स भट्टी या बेताल भट्टी-

➠वत्स भट्टी को ही बेताल भट्टी कहा जाता है।

➠वत्स भट्टी ने रावण वध नामक पुस्तक की रचना की थी।

➠वत्स भट्टी ने रावण वध पुस्तक गुप्त काल में लिखी थी।

➠वत्स भट्टी के द्वारा रावण वध नामक पुस्तक संस्कृत भाषा में लिखी गई थी।


8. महाकवि माघ या माघ-

➠महाकवि माघ संस्कृत के प्रसिद्ध कवि थे।

➠महाकवि माघ भीनमाल के थे।

➠महाकवि माघ के द्वारा शिशुपालवधम् नामक पुस्तक की रचना की गई थी।

➠महाकवि माघ ने शिशुपालवधम् पुस्तक गुप्त काल में लिखी थी।

➠महाकवि माघ की पुस्तक शिशुपालवधम् संस्कृत भाषा में लिखी गई थी।


9. कामंदक-

➠कामंदक के द्वारा नीतिसार नामक पुस्तक की रचना की गई थी।

➠कामंदक ने नीतिसार पुस्तक गुप्त काल में लिखी थी।

➠कामंदक की पुस्तक नीतिसार संस्कृत भाषा में लिखी गई थी।


10. क्षेमेन्द्र या महाकवि क्षेमेन्द्र-

➠क्षेमेन्द्र के द्वारा बृहत्कथा मंजरी नामक पुस्तक की रचना की गई थी।

➠क्षेमेन्द्र ने बृहत्कथा मंजरी पुस्तक गुप्त काल में लिखी थी।

➠क्षेमेन्द्र की पुस्तक बृहत्कथा मंजरी संस्कृत भाषा में लिखी गई थी।


11. शूद्रक-

➠शूद्रक के द्वारा मृच्छकटिकम् नामक पुस्तक की रचना की गई थी।

➠शूद्रक ने मृच्छकटिकम् पुस्तक गुप्त काल में लिखी थी।

➠शूद्रक की पुस्तक मृच्छकटिकम् संस्कृत भाषा में लिखी गई थी।

➠मृच्छकटिकम् का अर्थ है मिट्टी की गाड़ी या खिलौना होता है।

➠शूद्रक की पुस्तक मृच्छकटिकम् का नायक ब्राह्मण था।

➠मृच्छकटिकम् का नायक ब्राह्मण व्यापार करता था।

➠मृच्छकटिकम् प्रथम पुस्तक है जिसमें आम आदमी को नायक बताया  गया है।

➠मृच्छकटिकम् पुस्तक की घटनाएं आपद्धर्म की अवधारणा के उदाहरण है।


गुप्त काल के साहित्य की विशेषताएं-

➠गुप्त काल के साहित्य के अनुसार शूद्र और महिलाएं प्राकृत भाषा बोलते थे अन्य सभी पात्र संस्कृत बोलते थे।

➠गुप्त काल की पुस्तकों में सुखद अंत दर्शाया गया है।

➠गुप्त काल के साहित्य में नैतिक मूल्यों पर अधिक बल दिया गया है।


गुप्तकालीन चित्रकला-

➠अजंता और बाघ की गुफाओं से गुप्त काल के चित्र मिलते है।

➠अजंता और बाघ की गुफाओं से फ्रेस्को एवं टेम्पेरा चित्र मिलते है।

➠अजंता और बाघ की गुफाओं में बने फ्रेस्को एवं टेम्पेरा चित्रों में प्राकृतिक रंगों का अत्यधिक सुंदरता से मिश्रण एवं प्रयोग किया गया है।

अजंता की गुफाओं की अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें।


बाघ की गुफाएं (मध्य प्रदेश)-

➠बाघ की गुफाएं भारत के मध्य प्रदेश राज्य के धार जिले में स्थित है।

➠बाघ की गुफाओं की खोज डेंजर फील्ड ने की थी।

➠बाघ की गुफाओं की खोज 1818 ई. में की गई थी।

➠बाघ में 9 गुफाएं है।

➠बाघ की गुफाओं में बौद्ध धर्म, जैन धर्म एवं हिंदू धर्म से संबंधित चित्र मिलते है।

➠बाघ की गुफा संख्या 4 को रंगमहल कहा जाता है।


गुप्तकालीन मूर्तिकला-

➠गुप्त काल की मूर्तियां धातु, सेलखड़ी और टेराकोटा द्वारा निर्मित थी।

➠सुल्तानगंज से भगवान बुद्ध की विशाल धातु की मूर्ति प्राप्त हुई है।

➠सुल्तानगंज भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है।

➠सुल्तानगंज से मिली भगवान बुद्ध की विशाल धातु की मूर्ति 8 फीट ऊच्ची है।

➠गुप्त काल में हरिहर, त्रिदेव, मकरवाहिनी गंगा, कूर्म वाहिनी यमुना एवं अर्द्धनारीश्वर की मूर्तियों का निर्माण हुआ था।

➠गुप्तकालीन मूर्तियां मौर्योत्तरकालीन मूर्तियों जितनी सुंदर नहीं है किन्तु गुप्तकालनी मूर्तियों में नग्नता का अभाव है।

➠मथुरा (उत्तर प्रदेश), साँची (मध्य प्रदेश), सारनाथ (उत्तर प्रदेश) एवं अजंता (महाराष्ट्र) से गुप्तकालीन मूर्तियां मिलती है।

➠गुप्तकालीन मंदिरों से दशावतार व अप्सराओं की मूर्तियां मिलती है।


गुप्तकालीन मंदिर स्थापत्य कला-

➠गुप्त काल में उत्तर भारत में मंदिरों का निर्माण आरम्भ हुआ था।

➠भारत में आरम्भिक मंदिर चबूतरेनुमा होते थे।

➠कालांतर में चबूतरे पर गर्भगृह का निर्माण होना आरम्भ हुआ था।

➠गुप्त काल में मंदिरों के गर्भगृह के ऊपर शिखर बना होता था।

➠गुप्त काल में मंदिरों के गर्भगृह के ऊपर बना शिखर क्रमशः ऊपर की ओर छोटा होता जाता था।

➠गुप्त काल में मंदिरों के गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ या परिक्रमा पथ होता था।

➠गुप्त काल में मंदिरों के चारों या चबूतरे के चारों ओर सीढ़ियां होती थी।

➠गुप्त काल में मंदिरों का निर्माण पंचायतन शैली में भी हुआ था।


गुप्त काल में बने प्रमुख मंदिर-

(I) दशावतार मंदिर (देवगढ़, उत्तर प्रदेश)

(II) विष्णु मंदिर (भीतरी गाँव, उत्तर प्रदेश)

(III) शिव मंदिर (भूमरा, मध्य प्रदेश)

(IV) पार्वती मंदिर (नचना कुठार, मध्य प्रदेश)

(V) लक्ष्मण मंदिर (सिरपुर, छत्तीसगढ़)

(VI) विष्णु मंदिर (तिगवा, मध्य प्रदेश)

(VII) भीम की चौकी या भीम चंवरी (मुकुंदरा, राजस्थान)


(I) दशावतार मंदिर (देवगढ़, उत्तर प्रदेश)-

➠देवगढ़ के दशावतार मंदिर का निर्माण गुप्त काल में हुआ था।

➠गुप्तकालीन मंदिर स्थापत्य कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण देवगढ़ का दशावतार मंदिर है।

➠देवगढ़ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के ललितपुर जिले में स्थित है।

➠दशावतार मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के ललितपुर जिले के दवगढ़ नामक स्थान पर स्थित है।


(II) विष्णु मंदिर (भीतरी गाँव, उत्तर प्रदेश)-

➠भीतरी गाँव के विष्णु मंदिर का निर्माण गुप्त काल में हुआ था।

➠भीतरी गाँव भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के कानपुर जिले में स्थित है।

➠भीतरी गाँव का विष्णु मंदिर ईंटों से निर्मित मंदिर है।


(III) शिव मंदिर (भूमरा, मध्य प्रदेश)-

➠भूमरा के शिव मंदिर का निर्माण गुप्त काल में हुआ था।

➠भूमरा भारत के मध्य प्रदेश राज्य के सतना जिले में स्थित है।


(IV) पार्वती मंदिर (नचना कुठार, मध्य प्रदेश)-

➠नचना कुठार के पार्वती मंदिर का निर्माण गुप्त काल में हुआ था।

➠नचना कुठार का पार्वती मंदिर भारत के मध्य प्रदेश राज्य के पन्ना जिले के नचना कुठार नामक स्थान पर स्थित है।


(V) लक्ष्मण मंदिर (सिरपुर, छत्तीसगढ़)-

➠सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर का निर्माण गुप्त काल में हुआ था।

➠सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के महासमुन्द जिले की महासमुन्द तहसील के सिरपुर गाँव में स्थित है।


(VII) विष्णु मंदिर (तिगवा, मध्य प्रदेश)-

➠तिगवा के विष्णु मंदिर का निर्माण गुप्त काल में हुआ था।

➠तिगवा का विष्णु मंदिर भारत के मध्य प्रदेश राज्य के जबलपुर जिले के तिगवा गाँव में स्थित है।


(VIII) भीम की चौकी या भीम चंवरी (मुकुंदरा, राजस्थान)-

➠भीम की चौकी को भीम चंवरी भी कहा जाता है।

➠मुकुंदरा में स्थित भीम की चौकी या भीम की चंवरी का निर्माण गुप्त काल में हुआ था।

➠भीम की चौकी भारत के राजस्थान राज्य के कोटा जिले के मुकुंदरा में स्थित है।


गुप्तकालीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी-

➠विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के दृष्टिकोण से गुप्तकाल भारतीय इतिहास का स्वर्ण काल माना जाता है।

➠महरौली से प्राप्त लौह स्तम्भ गुप्तकालीन रसायन विद्या या धातु विद्या का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है।

➠महरौली भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित है।

➠महरौली का लौह स्तम्भ दिल्ली में कुतुब मीनार से पास स्थित है।

➠दिल्ली के महरौली से प्राप्त लौह स्तम्भ का निर्माण गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त द्वितीय ने करवाया था।


गुप्तकालीन विज्ञान एवं प्रद्यौगिकी के प्रमुख विद्वान-

1. आर्यभट्ट

2. वराह मिहिर

3. ब्रह्मगुप्त

4. भास्कराचार्य प्रथम

5. वाग्भट्ट

6. पालकाप्य


1. आर्यभट्ट-

➠आर्यभट्ट का जन्म कुसुमपुर में हुआ था।

➠बिहार की राजधानी पाटना को पाटलिपुत्र से पहले कुसुमपुर के नाम से जाना जाता था।

➠पटना का प्राचीन नाम ही कुमुमपुर है।

➠आर्यभट्ट ने गणित एवं खगोल विज्ञान को अगल अलग किया था।

➠सर्वप्रथम आर्यभट्ट ने बताया की सौरमंडल का केंद्र सूर्य है तथा पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है।

➠आर्यभट्ट ने बताया की चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है।

➠आर्यभट्ट ने सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण के कारणों को बताया था।

➠आर्यभट्ट ने बताया की पृथ्वी गोल तथा अपने अक्ष पर घूमती है।

➠आर्यभट्ट ने बताया की चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश से चमकता है।

➠आर्यभट्ट ने पाई (π) का मान दिया था।

➠आर्यभट्ट ने त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालने का सुत्र दिया था।

➠आर्यभट्ट ने पृथ्वी की त्रिज्या बताई थी जो वर्तमान में भी सटीक है।

➠आर्यभट्ट ऐसा प्रथम व्यक्ति है जिसने अपने नाम पर पुस्तक लिखी है।


आर्यभट्ट की पुस्तकें-

(I) आर्यभट्टीयम्

(II) सूर्य सिद्धांत या आर्य सिद्धांत- सूर्य सिद्धांत या आर्य सिद्धांत नामक पुस्तक में त्रिकोणमिति मिलती है।

(III) दशगीतिका सूत्र


2. वराह मिहिर-

➠वराह मिहिर ने फलित ज्योतिष पर बल दिया था।

➠वराह मिहिर ने कुंडली बनाना आरम्भ किया था।


वराह मिहिर की पुस्तकें-

(I) पंच सिद्धांतिका

(II) वृहत संहिता

(III) बृहज्जातकम् या वृहत जातक (वृहत्जातक)

(IV) लघुजातक


3. ब्रह्मगुप्त-

➠ब्रह्मगुप्त भीनमाल का था।

➠भीनमाल भारत के राजस्थान राज्य के जालौर जिले में स्थित एक जगह का नाम है।

➠ब्रह्मगुप्त गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री था।


ब्रह्मगुप्त की पुस्तकें-

(I) ब्रह्मस्फुट सिद्धांत

(II) खण्डकाद्यक- खण्डकाद्यक ज्योतिष पर आधारित पुस्तक है।


4. भास्कराचार्य प्रथम-

➠भास्कराचार्य प्रथम ने आर्यभट्ट की पुस्तकों पर कार्य किया तथा आर्यभट्ट के सिद्धांतों को सही माना है।


भास्कराचार्य प्रथम की पुस्तकें-

(I) वृहत भास्कर्य

(II) लघु भास्कर्य


भास्कराचार्य द्वितीय-

➠भास्कराचार्य द्वितीय 12वीं शाताब्दी में था।

➠भास्कराचार्य गणितज्ञ था।


भास्कराचार्य द्वितीय की पुस्तक-

(I) सिद्धांत शिरोमणि-

➠सिद्धांत शिरोमणि पुस्तक के चार संस्करण है जैसे-

(A) बीजगणित

(B) गणिताध्ययन

(C) गोलाध्ययन

(D) लीलावती

➠लीलावती भास्कराचार्य द्वितीय की पुत्री थी इसीलिए भास्कराचार्य द्वितीय ने लीलावती के नाम पर पुस्तक लिखी थी।

➠भास्कराचार्य द्वितीय की पुत्री लीलावती स्वयम् एक गणितज्ञ थी।

➠फैजी ने लीलावती पुस्तक का फारसी भाषा में अनुवाद किया था।


5. वाग्भट्ट-

➠वाग्भट्ट के द्वारा निम्नलिखित पुस्तक लिखी गई थी।

(I) अष्टांगहृदयम्- अष्टांगहृदयम् पुस्तक आयुर्वेद पर आधारित है।


6. पालकाप्य-

➠पालकाप्य के द्वारा निम्नलिखित पुस्तक लिखी गई थी।

(I) हस्ति आयुर्वेद- हस्ति आयुर्वेद पुस्तक में हाथियों की चिकित्या के बारे में जानकारी मिलती है।


नवनीतकम-

➠नवनीतकम नामक पुस्तक गुप्त काल में लिखी गई थी।

➠नवनीतकम नामक पुस्तक आयुर्वेद पर आधारित है।


गुप्तकालीन राजनीतिक प्रशासन-

➠गुप्त काल में सम्राट सभी शक्तियों का केंद्र होता था।

➠गुप्त काल में राजतंत्रात्मक एवं वंशानुगत शासन व्यवस्था थी।

➠गुप्त काल में सामंती व्यवस्था या सामंतवाद विकसित हो चुका था।

➠गुप्त काल के महत्वपूर्ण मंत्री जैसे-

1. महादंड नायक

2. दंडपाशिक

3. महाअक्षपटलिक

4. करणिक

5. महासंधिविग्रहक

6. ध्रुवाधिकरण या ध्रुवधि करणिक

7. विनय स्थिति स्थापक (विनयस्थितस्थापक)


1. महादंड नायक-

➠गुप्त काल में भारत में न्यायाधीश को महादंड नायक कहा जाता था।


2. दंडपाशिक-

➠गुप्त काल में भारत में मुख्य पुलिस अधिकारी को दंडपाशिक कहा जाता था।


3. महाअक्षपटलिक-

➠गुप्त काल में भारत में आय तथा व्यय मंत्री को महाअक्षपटलिक कहा जाता था।


4. करणिक-

➠गुप्त काल में भारत में बाबू या क्लर्क (Clerk) को करणिक कहा जाता था।


5. महासंधिविग्रहक-

➠गुप्त काल में भारत में युद्ध एवं शांति के मंत्री को महासंधिविग्रहक कहा जाता था।


6. ध्रुवाधिकरण या ध्रुवधि करणिक-

➠गुप्त काल में भारत में राज्य के कर वसूली विभाग के अधिकारी या राजस्व अधिकारी को ध्रुवाधिकरण या ध्रुवधि करणिक कहा जाता था।


7. विनय स्थिति स्थापक (विनयस्थितिस्थापक)-

➠गुप्त काल में भारत में धार्मिक एवं नैतिक मामलों के प्रमख या प्रधान को विनय स्थिति स्थापक (विनयस्थितिस्थापक) कहा जाता था।


गुप्तकालीन प्रांतीय प्रशासन-

➠गुप्त काल में प्रांतीय प्रशासन की सबसे बड़ी इकाई राष्ट्र होता था।

➠गुप्त काल में प्रांतीय प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होती थी।

➠गुप्तकालीन प्रांतीय प्रशासन क्रमशः जैसे-

1. राष्ट्र- देश

2. भूक्ति- राज्य

3. विषय- संभाग

4. विथी- जिला

5. पेठ- तहसील

6. ग्राम- गाँव


1. राष्ट्र-

➠गुप्त काल में प्रांतीय प्रशासन की सबसे बड़ी इकाई राष्ट्र होती था।

➠गुप्त काल में राष्ट्र का अर्थ देश है अर्थात् भारत में गुप्त काल में देश को राष्ट्र कहा जाता था।


2. भूक्ति-

➠गुप्त काल में राष्ट्र के बाद प्रांतीय प्रशासन की दूसरी सबसे बड़ी इकाई भूक्ति होती थी।

➠गुप्त काल में भूक्ति का अर्थ राज्य है अर्थात् भारत में गुप्त काल में राज्य को भूक्ति कहा जाता था।


3. विषय-

➠गुप्त काल में भूक्ति के बाद प्रांतीय प्रशासन की तीसरी सबसे बड़ी इकाई विषय होती थी।

➠गुप्त काल में विषय का अर्थ संभाग है अर्थात् भारत में गुप्त काल में संभाग को विषय कहा जाता था।


4. विथी-

➠गुप्त काल में विषय के बाद प्रांतीय प्रशासन की चौथी सबसे बड़ी इकाई विथी होती थी।

➠गुप्त काल में विथी का अर्थ जिला है अर्थात् भारत में गुप्त काल में जिले को विथी कहा जाता था।


5. पेठ-

➠गुप्त काल में विथी के बाद प्रांतीय प्रशासन की पाँचवी सबसे बड़ी इकाई पेठ होती थी।

➠गुप्त काल में पेठ का अर्थ तहसील है अर्थात् भारत में गुप्त काल में तहसील को पेठ कहा जाता था।


6. ग्राम-

➠गुप्त काल में पेठ के बाद प्रांतीय प्रशासन की छठी सबसे बड़ी इकाई ग्राम होती थी।

➠गुप्त काल में प्रांतीय प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी।

➠गुप्त काल में ग्राम का अर्थ गाँव है अर्थात् भारत में गुप्त काल में गाँव को ग्राम कहा जाता था।


गुप्तकालीन सामाजित स्थिति-

➠गुप्त काल में भारत में समाज चार वर्णों में विभाजित था।

➠गुप्त काल में भारत में पित्तृसत्तात्मक संयुक्त परिवार थे।

➠गुप्त काल में भारत जातिवाद अपने चरम पर था।

➠गुप्त काल में भारत में जाति व्यवस्था जन्म आधारित थी।

➠गुप्त काल में भारत में शूद्रों को वार्ता का अधिकार था।

➠वार्ता का अधिकार जैसे- कृषि करने का अधिकार, पशुपालन करने का अधिकार तथा व्यापार का अधिकार

➠गुप्त काल में भारत में अस्पृश्यता और सामाजिक असमानता व्याप्त थी।

➠गुप्त काल में भारत में वर्णसंकर जातियां गाँव के बाहर रहती थी।

➠गुप्त काल में भारत में आपद धर्म की अवधारणा व्यापत थी या मौजूद थी।

➠आपद धर्म का अर्थ है की आपात स्थिति में अन्य वर्णों के काम किए जा सकते है जैसे- इंदौर ताम्रपत्र के अनुसार क्षत्रिय घोडों का व्यापार करते थे, मृच्छकटिकम् का नायक चारुदत्त ब्राह्मण था लेकिन व्यापार किया करता था, चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार सिंध, कच्छ व मालवा में शूद्रों का शासन था।

➠गुप्त काल में भारत में कलिवज्य (कलिवज्ये) की अवधारणा विकसित हुई थी।

➠कलिवज्य की अवधारणा जैसे- गुप्त काल में भारतीय धर्म में समुद्र यात्रा की अनुमति नहीं थी।

➠गुप्त काल में भारत में अधिकारी सेवाओं के बदले भूमि और वेतन प्राप्त करते थे जिसके कारण एक नई जाति या वर्ग विकसित हुआ जिसे कायस्थ कहा गया था।

➠कायस्थ शब्द का पहली बार उल्लेख याज्ञवल्क्य स्मृति में किया गया है।

➠गुप्त काल में भारत में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं थी।

➠गुप्त काल में भारत में विधवा विवाह को बुरा माना जाता था।

➠गुप्त काल में भारत में नियोग प्रथा मौजूद नहीं थी।

➠गुप्त काल में भारत में सत्ती प्रथा प्रारम्भ हो चुकी थी।

➠गुप्त काल में भारत में संभवतः महिलाओं को शिक्षा का अधिकार या शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था।

➠गुप्त काल में भारत में पर्दा प्रथा जैसी बुराइयां उपस्थित थी।

➠गुप्त काल में भारत में दास प्रथा का प्रचलन था।

➠गुप्त काल में भारत में बाल विवाह का प्रचलन था।

➠गुप्त काल में भारत में वेश्यावृति का प्रचलन था।

➠गुप्त काल में भारत में वृद्ध वेश्याओं को कुट्टिनी (कुट्टनी) कहा जाता था। अर्थात् वेश्याओं को कामशास्त्र की शिक्षा देने वाली वेश्याओं को कुट्टिनी (कुट्टनी) कहा जाता था।

➠गुप्त काल में वह महिला जो व्यक्तिगत रूप से वेश्यावृत्ति करती थी उन महिलाओं को रूपा जीवा कहा जाता था।


एरण अभिलेख (मध्य प्रदेश)- 510 ई.

➠एरण अभिलेख भारत के मध्य प्रदेश राज्य में स्थित है।

➠एरण अभिलेख गुप्त वंश के शासक भानुगुप्त का है अर्थात् एरण अभिलेख गुप्त वंश के शासक भानुगुप्त से संबंधित है।

➠एरण अभिलेख 510 ई. का है।

➠भारत में सत्ती प्रथा का पहला उल्लेख एरण अभिलेख से मिलता है।

➠गुप्त वंश के शासक भानुगुप्त के सेनापति गोपराज की पत्नी के सत्ती होने का उल्लेख एरण अभिलेख में मिलता है।


गुप्तकालीन आर्थिक स्थिति-

➠गुप्त काल में भारत में आर्थिक स्थिति में गिरावट आई क्योंकि रोमन साम्राज्य का पतन हो गया था।

➠गुप्त काल में भारत में घरेलू एवं विदेशी व्यापार होता था।

➠गुप्त काल में भारत का चीन व पूर्वी देशों से साथ व्यापार होता था।

➠गुप्त काल में श्रीलंका व्यापार में भारत तथा अन्य देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता था।

➠चीन व पूर्वी देशों से गुप्त काल की भारतीय मुद्रा नहीं मिलती है।

➠भारत से गुप्त काल की एक भी विदेशी मुद्रा प्राप्त नहीं होती है अर्थात् गुप्त काल में व्यापार वस्तु विनियम द्वारा होता था।

➠गुप्त शासकों ने सर्वाधिक सोने के सिक्के चलाये या जारी किये थे।

➠गुप्त काल में सोने के सिक्कों का प्रयोग उपहार देने एवं धन संचय हेतु किया जाता था।

➠भारत से गुप्तकालीन चाँदी व ताँबे के सिक्के कम मात्रा में मिलते है।

➠फाह्यान के अनुसार गुप्त काल में घरेलू व्यवसाय संतोषजनक स्थिति में था।

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Top Post Ad

Below Post Ad